शून्य से नीचे तापमान वाली जगह पर अकेले फंस जाने के बाद आइसलैंड के मछुआरे के जिंदा बचने की कहानी मानव शरीर की क्षमताओं के रहस्य से पर्दा उठाती है। हेइमी दक्षिणी आइसलैंड के वेस्टमैन द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है, जो पफिन परिंदों से आबाद है। इस द्वीप के दक्षिणी छोर पर है स्ट्रोहॉफी। अटलांटिक महासागर से लगती हुई इस जगह पर यूरोप में सबसे तेज हवाएं चलती हैं।
जमा देने वाली ठंड में जिंदा बचने वाले शख्स की कहानी, कर देगी हैरान
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ठंड में डिहाइड्रेशन
ऐसी मुश्किल घड़ी में बर्फीला पानी पीना अजीब लग सकता है। ठंडे मौसम में डिहाइड्रेशन एक बड़ी समस्या है। ठंड में हवा शुष्क हो जाती है। हवा में नमी नहीं होने से सांस छोड़ने पर फेफड़ों की नमी घटती जाती है। ठंड में प्यास कम लगती है, जिससे कई लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते। अगर आप गर्म रहने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं और तेज सांस ले रहे हैं, तो डिहाइड्रेशन के शिकार हो सकते हैं।
पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर माइक टिप्टन का कहना है कि ठंड में डिहाइड्रेशन से जुड़ी कई समस्याएं आम हैं। फ्रायॉर्सन के गीले कपड़े उनको बेहाल कर रहे थे। शरीर का तापमान अगर 35 डिग्री सेंटीग्रेड (95 फारेनहाइट) से नीचे गिर जाए तो हाइपोथर्मिया का जोखिम बढ़ जाता है। लगातार चलते हुए वह अपने शरीर का तापमान बढ़ाए हुए थे, लेकिन पानी पीने के लिए रुकने की वजह से मांसपेशियां शिथिल पड़ गईं और गर्मी बननी बंद हो गई। जिंदा रहने के लिए उनको लगातार चलते रहना था।
टिप्टन कहते हैं, "ठंड में फंसा हुआ आदमी ठंडा हो यह जरूरी नहीं। यदि आप लगातार चलते रहें और आप अच्छे से ढंके हुए हों तो गर्म रहने के लिए पर्याप्त ऊष्मा पैदा करेंगे। अगर आप जोरदार कसरत करते हैं तो ठंड में शॉर्ट्स और टी-शर्ट में भी रह सकते हैं।" ऊंची जगहों पर शारीरिक श्रम या कसरत करने में दिक्कत हो सकती है। टिप्टन का कहना है कि एवरेस्ट पर चढ़ने वाले लोग हो सकता है कि 10 सेकेंड में एक ही कदम उठा पाएं। उनके लिए शरीर में गर्मी पैदा करना बहुत मुश्किल है।
ठंड में पर्वतारोहियों की मौत के ढेरों रिकॉर्ड्स हैं। 1974 के एक दर्दनाक वाकये में लेनिन चोटी पर बर्फीली आंधी में फंसे पर्वतारोहियों के आखिरी क्षण बेस कैंप में प्रसारित हुए थे। एल्विरा शातयेवा के नेतृत्व में महिला पर्वतारोहियों का दल पहली बार ताजिकिस्तान की चोटी को फतेह करने की कोशिश कर रहा था। जैसे-जैसे वे ठंडी पड़ने लगीं, वे अपनी कमजोरियों के बारे में बातें करने लगीं। आखिरी संदेश में शातयेवा को यह कहते सुना गया, "एक और मर गई। मुझमें इतनी ताकत नहीं है कि ट्रांसमीटर के बटन को पकड़े रहूं।"
ठंड में दिमाग कितना चलता है?
इस बात के सबूत हैं कि अत्यधिक गर्मी में दिमाग काम नहीं करता, मगर यह उतना स्पष्ट नहीं है कि जोरदार ठंड में दिमाग पर क्या असर होता है। 2-3 डिग्री सेंटीग्रेड ठंडे पानी में 3 मिनट तक रहने से अल्पकालिक याददाश्त कमजोर पड़ती है, लेकिन मुस्तैदी बढ़ जाती है। एक अन्य शोध में पाया गया कि हाइपोथर्मिया के बहुत करीब (35.5 डिग्री सेंटीग्रेड) आने पर भी चेतना में कोई कमी नहीं आई। ऐसा लगता है कि हमारा दिमाग गर्मी के मुकाबले ठंड से निपटने में ज्यादा सक्षम है। प्राण पर संकट हो तो शरीर कम महत्वपूर्ण अंगों की कीमत पर अधिक महत्वपूर्ण अंगों को सक्रिय रखता है। इनमें सबसे अहम अंग है हमारा दिमाग।
शातयेवा और उनकी साथी पर्वतारोहियों की चेतना घटने से पहले ही उनके दूसरे अंगों ने शायद काम करना बंद कर दिया था। शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए हमारा शरीर हाथों और पैरों में रक्त प्रवाह सीमित (vasoconstriction) कर देता है, लेकिन ऐसा करने से ये अंग ठंडे पड़ने लगते हैं। हमारे शरीर के उत्तक माइनस 0।5 डिग्री सेंटीग्रेड पर जमने लगते हैं। उत्तकों के तरल पदार्थ जमने पर कोशिकाओं की दीवार टूटकर नेक्रोसिस या कोशिका मृत्यु की तरफ बढ़ जाती है। इसे फ्रॉस्टबाइट कहते हैं।
ठंड में लोग कपड़े क्यों उतारते हैं?
हाइपोथर्मिया से मौत के करीब आने पर दिमाग में कुछ अजीब चीजें होती हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में, अत्यधिक ठंड से पीड़ित लोग मौत से कुछ क्षण पहले गर्मी महसूस करते हैं। हाइपोथर्मिया के शिकार कुछ लोग बहुत कम कपड़ों में या बिल्कुल नग्न अवस्था में मिले हैं। इस अवधारणा को "पैराडॉक्सिकल अनड्रेसिंग" कहा जाता है। हो सकता है कि मौत से ठीक पहले वसा की परत के नीचे बहने वाला गर्म खून त्वचा तक बहने लगे। इससे गर्मी का अहसास होगा। वास्तव में, पीड़ित व्यक्ति अचानक शरीर की बहुत सी गर्मी खो देता है। कपड़े उतारने से मौत जल्दी आ जाती है।
ऐसे ज्यादातर मामले (67% पुरुष, 78% महिलाएं) शराब का सेवन करने से जुड़े होते हैं। हाइपोथर्मिया से मौत के कुछ अन्य असामान्य मामलों में, पीड़ित शख्स आलमारी के पीछे या बिस्तर के नीचे छिपे हुए मिले हैं। इसे "हाइड एंड डाई" सिंड्रोम कहा जाता है। ऐसा लगता है कि आखिरी क्षणों में पीड़ित व्यक्ति भम में पड़ जाते हैं। करीब एक चौथाई लोग छिपने से पहले कपड़े भी उतार लेते हैं। ठंड से जमकर मरे हुए लोग जो बिना कपड़ों के मिले हैं उनमें अक्सर वे होते हैं जो गर्म कपड़ों के बिना, कभी-कभी शराब के नशे में, रात में पैदल घर लौट रहे होते हैं।