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दिमागी बुखार हो जाए तो 'रामबाण' साबित होगा ये नुस्खा, दवाइयों से ज्यादा असरदार, ऐसे करेगा फायदा
Wed, 13 Mar 2019 12:08 PM IST
खुशबू गोयल
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 13 Mar 2019 12:08 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
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दिमागी बुखार से भारत में कई लोगों की जान चली जाती है, लेकिन अब एक ऐसा नुस्खा मिल गया है जो 'रामबाण' साबित होगा। यह दवाइयों से ज्यादा असरदार होगा और काफी फायदेमंद भी।
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दिमागी मलेरिया से हर साल भारत, नाइजीरिया, कांगो, मुजब्बीन और युगांडा में लाखों लोगों की जान जा रही है। बड़ी संख्या में बच्चे इसका शिकार बन रहे हैं। इसलिए लोगों को बचाने के लिए पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के फार्मा विभाग के प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने 40 साल की रिसर्च के बाद इस बीमारी के इलाज का नया तरीका खोज निकाला है। इस रिसर्च पर काम करने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने प्रो. भूप एवं प्रो. ओपी कटारे को 45 लाख का प्रोजेक्ट दिया।
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बता दें कि वर्ष 2017 में 87 देशों में इस बीमारी की चपेट में 22 करोड़ लोग आए थे। इनमें से 4.50 लाख लोगों की मौत हो गई थी। जिन लोगों की मौतें हुईं, उनमें 99.7 फीसदी लोग दिमागी मलेरिया से ग्रसित थे। वर्ष 2014 में भारत में 30 हजार से अधिक लोगों की इस बीमारी से मौत हुई थी। इनमें झारखंड, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ एवं नॉर्थ ईस्ट के लोग शामिल थे। इसके इलाज के लिए करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।
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क्या है दिमागी मलेरिया
मलेरिया रोग मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह बीमारी लीवर जैसे अंगों को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन जब शरीर में दवाओं की उपलब्धता पूरी नहीं होती तो यह दिमाग तक पहुंच जाता है। उसके बाद ठंड लगने लगती है और तेज बुखार हो जाता है। बीपी बढ़ जाता है और फिर शख्स बेहोशी की हालत में पहुंचकर कोमा में चला जाता है। इस अवस्था के बाद पांच से सात दिन के अंदर मरीज की मौत हो जाती है।
मलेरिया रोग मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह बीमारी लीवर जैसे अंगों को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन जब शरीर में दवाओं की उपलब्धता पूरी नहीं होती तो यह दिमाग तक पहुंच जाता है। उसके बाद ठंड लगने लगती है और तेज बुखार हो जाता है। बीपी बढ़ जाता है और फिर शख्स बेहोशी की हालत में पहुंचकर कोमा में चला जाता है। इस अवस्था के बाद पांच से सात दिन के अंदर मरीज की मौत हो जाती है।
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अब मष्तिष्क तक आसानी से पहुंच जाएगी दवा
दिमागी मलेरिया के इलाज में सबसे बड़ी अड़चन यह होती है कि खून के जरिए दिमाग तक दवा नहीं पहुंच पाती। इसी वजह से एंटी मलेरिया ड्रग को दिमाग स्वीकार नहीं करता। इसी को ध्यान में रखते हुए 1979 में प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने रिसर्च शुरू की थी। उन्होंने नैनो फार्मूले से इस पर काम करना शुरू किया था और नेजल टू ब्रेन विधि खोज निकाली। प्रो. भूप ने वह चीजें भी खोज निकालीं, जो दिमाग को पसंद होती हैं। उन्होंने ग्लेक्टोस, फिगोस, फास्फोलिपिड्स, शुगर आदि में दवाओं को मिलाकर तरल मिश्रण बनाया और उसके बाद नाक से मष्तिष्क तक दवा पहुंचाई। 99 फीसदी तक एनिमल स्टडी सफल रही है। अब फार्मा कंपनियां ह्यूमन स्टडी करेंगी।
दिमागी मलेरिया के इलाज में सबसे बड़ी अड़चन यह होती है कि खून के जरिए दिमाग तक दवा नहीं पहुंच पाती। इसी वजह से एंटी मलेरिया ड्रग को दिमाग स्वीकार नहीं करता। इसी को ध्यान में रखते हुए 1979 में प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने रिसर्च शुरू की थी। उन्होंने नैनो फार्मूले से इस पर काम करना शुरू किया था और नेजल टू ब्रेन विधि खोज निकाली। प्रो. भूप ने वह चीजें भी खोज निकालीं, जो दिमाग को पसंद होती हैं। उन्होंने ग्लेक्टोस, फिगोस, फास्फोलिपिड्स, शुगर आदि में दवाओं को मिलाकर तरल मिश्रण बनाया और उसके बाद नाक से मष्तिष्क तक दवा पहुंचाई। 99 फीसदी तक एनिमल स्टडी सफल रही है। अब फार्मा कंपनियां ह्यूमन स्टडी करेंगी।