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इस नाटक ने फिर ताजा कर दी भारत पाक बंटवारे की यादें, चंडीगढ़ में हुआ मर्मिक मंचन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 11 Sep 2018 09:44 AM IST
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नाटक का मंचन करते हुए कलाकार
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जैसा यह शेर है ठीक वैसा ही नाटक की थीम। नाटक का नाम है जिस लाहौर नहीं देख्या... ओह जम्मेया ही नहीं। लेखक सैय्यद असगर वजाहत के लिखे इस नाटक का मंचन चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी और मसखरा थियेटर ग्रुप द्वारा चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में किया गया। निर्देशक विजय कुमार मचल ने अपने निर्देशन से नाटक को एकदम बांधे रखा। इस नाटक की कहानी एक ऐसी वृद्धा की है जो बंटवारे के दौरान पाकिस्तान में रह जाती है।
नाटक का मंचन करते हुए कलाकार
बंटवारे के साथ ही नाटक शुरू होता है। भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान लोग इधर से उधर शिफ्ट हो रहे हैं। इस नाटक की कहानी एक शुरू होती है लखनऊ से। लखनऊ का एक पाकिस्तानी परिवार लाहौर में शिफ्ट हो रहा है। इस परिवार को लाहौर में एक हवेली अलॉट कर दी जाती है। हवेली में जैसे ही मुस्लिम परिवार पहुंचता है तो वहां एक वृद्ध पहले से ही रह रही है। वास्तव में यह हवेली वृद्धा के परिवार में उसके बेटे रतन जौहरी ने बनवाई थी।
असगर वजाहत
अब मुस्लिम परिवार चाहता है कि वृद्धा हिंदुस्तान चली जाए। पहले तो मुस्लिम परिवार उसको डराता है, धमकाता है और सोचता है कि वृद्धा खुद ब खुद हिंदुस्तान चली जाएगी। लेकिन वृद्धा हिम्मत नहीं हारती है और वहीं रहती है। ऐसे में परिवार का लड़का जावेद कहता है कि अब इस मामले को वह देख लेगा। वह एक पहलवान गुंडे याकूब खां से बात करता है कि वृद्धा को घर से निकलवाना है। याकूब को एक अच्छा मौका मिल जाता है कि वह वृद्धा को निकालकर नीचे वालों को भी निकालकर घर में कब्जा कर ले।
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असगर वजाहत
नीचे की मंजिल में मुस्लिम परिवार और ऊपर हिंदू वृद्धा रहती है। याकूब पहले तो एक शायर नासिर काजिमी से मिलता है और बताता है कि वृद्धा हिंदू है और कहीं ऐसा न हो कि वह यहीं मंदिर बनवा ले और यहीं पूजा शुरू कर दे। शायर कहता है कि इंसान है रहने दो। इसके बाद वह मौलवी के पास जाता है तो मौलवी कहता है कि उसका घर तो उसको रहने दो। आखिरकार वह परिवार को धमकाना शुरू कर देता है।
एक दिन वृद्धा परेशान होकर रात के वक्त जाने को तैयार होती है और रात को उसको नासिर काजिमी मिलता है वह उससे कहता है कि अम्मा लाहौर छोड़कर मत जाओ, आपको लखनऊ नहीं मिलेगा जैसा हमको अंबाला नहीं मिला।
एक दिन वृद्धा परेशान होकर रात के वक्त जाने को तैयार होती है और रात को उसको नासिर काजिमी मिलता है वह उससे कहता है कि अम्मा लाहौर छोड़कर मत जाओ, आपको लखनऊ नहीं मिलेगा जैसा हमको अंबाला नहीं मिला।
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असगर वजाहत
धीरे-धीरे मुस्लिम परिवार की नफरत वृद्धा के प्रति प्यार में बदलने लगती है लेकिन याकूब को यह बर्दाश्त नहीं होता है। एक दिन वृद्धा को हार्ट अटैक आ जाता है और उसका निधन हो जाता है। अब मुसीबत यह होती है कि क्या करें? सभी कहते हैं कि वह हिंदू थी और हिंदू धर्म के अनुसार उसका दाह संस्कार किया जाना चाहिए। कई लोग इसका विरोध करते हैं, लोग यह भी कहते हैं कि अब तो यहां शमशान घाट भी नहीं हैं। लेकिन मौलवी अंत में वृद्धा की अर्थी को लोगों के साथ लेकर जाता है और हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार उसका अंतिम संस्कार करता है।
याकूब को यह बर्दाश्त नहीं होता और वह मौलवी की हत्या कर देता है। इस नाटक में रेखा रानी, तरुण सिक्का, विशाल कपूर, पुलकिता, मनिका, शशि, रजत, लवदीप, कमल, अबीर, गौरव, चिराग, लक्की, विभोर, अभिषेक, राज और हिमांशु ने अभिनय किया है।
याकूब को यह बर्दाश्त नहीं होता और वह मौलवी की हत्या कर देता है। इस नाटक में रेखा रानी, तरुण सिक्का, विशाल कपूर, पुलकिता, मनिका, शशि, रजत, लवदीप, कमल, अबीर, गौरव, चिराग, लक्की, विभोर, अभिषेक, राज और हिमांशु ने अभिनय किया है।