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वारदात स्थल पर मिला जूता या चप्पल पहुंचाएगा अपराधी तक, रिसर्च से आसान होगी पुलिस की राह 

सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 18 Feb 2021 03:09 PM IST
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Scientist of Panjab university conducted research on footprint
पीयू के वैज्ञानिकों ने फुटप्रिंट पर रिसर्च की। - फोटो : अमर उजाला
चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय की एक रिसर्च ने पुलिस की राह आसान कर दी है। अब पदचिह्न (फुटप्रिंट) के जरिए वैज्ञानिक बता देंगे कि अपराधी मोटा है या पतला। यही नहीं घटना स्थल पर अगर पदचिह्न की जगह जूता या चप्पल बरामद होता है तब भी अपराधी तक पहुंचना पुलिस के लिए आसान हो जाएगा। इससे भी वैज्ञानिक अपराधी के शरीर का आकार कैसा है, इसका पता लगा लेंगे, जिसके बाद पुलिस उसी दिशा में जांच शुरू कर देगी। अमेरिकन एकेडमी ऑफ फोरेंसिक साइंस ने इस रिसर्च को उच्च दर्जे का माना है।
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रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक। - फोटो : अमर उजाला
पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू) के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केवल कृष्ण और डॉ. रिचा मुखड़ा गुप्ता ने पदचिह्नों पर रिसर्च किया। इसमें उन्होंने पाया कि दुनिया भर में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जिनमें अपराधी पकड़े ही नहीं गए हैं। यहां तक कि उनका सुराग आज तक नहीं लगा है। यानी घटना स्थल पर पुलिस को अपराधी का कोई साक्ष्य नहीं मिला। इससे पुलिस की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही और अपराधी पकड़ से दूर हैं। ऐसे अपराधियों को पकड़ने के लिए पीयू की टीम ने पदचिह्नों पर शोध किया। इस दौरान पंजाब के 461 लोगों के पदचिह्नों पर शोध किया गया। इनमें 231 महिलाएं और 230 पुरुष शामिल रहे। हर तरह के व्यक्ति को इस शोध में शामिल किया गया। इनमें पतले, कम मोटे और अधिक मोटे हर आकार के लोग शामिल रहे। शोध के जरिए पांच साल में पीयू को यह सफलता हाथ लगी है।
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चंडीगढ़ में फुटप्रिंट पर की गई शोध। - फोटो : अमर उजाला
लोगों को पतले, मोटे समेत तीन भागों में बांटा
डब्ल्यूएचओ ने बॉडी मास्क इंडेक्स (बीएमआई) के आधार पर भारत के लोगों को तीन भागों में श्रेणीवार विभाजित कर रखा है, जिसमें सामान्य व्यक्ति का बीएमआई 18.5 से 22.9, मोटापे की ओर बढ़ रहे व्यक्ति का बीएमआई 23 से 27.5 जबकि मोटे व्यक्ति का बीएमआई 27 से ऊपर रखा गया। बीएमआई व्यक्ति की लंबाई व वजन के अनुसार निकाली जाती है। इसे आसान भाषा में समझा जा सकता है कि सामान्य व्यक्ति के पैर का भार हल्का होगा जबकि मोटे व्यक्ति के पैर का भार अधिक होगा। घटना स्थल पर मिले पदचिह्न को लेकर वैज्ञानिक बता देंगे कि उक्त तीनों श्रेणियों में से यह किस श्रेणी के व्यक्ति का पदचिह्न है। इसके बाद पुलिस संदिग्धों से उसका मिलान कर आरोपी तक पहुंच जाएगी। 
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पीयू के वैज्ञानिकों ने की फुटप्रिंट पर रिसर्च। - फोटो : अमर उजाला
ये हैं वैज्ञानिकों के तर्क
  • मारपीट की घटना हो या फिर हत्या केस। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों में छीनाझपटी होती है। ऐसी स्थिति में अमूमन जूता या चप्पल उतर ही जाता है और अपराधी जल्दबाजी में भाग जाता है। मनोविज्ञानी भी कहते हैं कि वारदात के बाद अपराधी को भागने की जल्दी होती है। ऐसे में वारदात स्थल पर मिले पदचिह्नों या जूते-चप्पल से अपराधियों को आसानी से पकड़ा जा सकेगा। 
  • दुष्कर्म के केस में अक्सर देखा गया है कि वारदात से पहले अपराधी जूता उतार देता है और वारदात के बाद जल्दबाजी में नंगे पांव भाग निकलता है। घटना स्थल पर पुलिस को जूता या चप्पल मिल गया तो इस रिसर्च के जरिए उस तक पहुंचा जा सकेगा। 
  • यदि अपराधी का पदचिह्न फर्श पर नहीं मिला और जूता मिल गया तो भी जूते के सोल पर अंकित पदचिह्नों के जरिए अपराधी तक आसानी से पहुंचा जा सकेगा। 
  • कई बार अपराधी वारदात स्थल पर जाते समय शोर न हो, इसके लिए पहले अपने जूते उतार देता है और वारदात के बाद सीधे भाग जाता है। ऐसी स्थिति में भी पुलिस जूते को बरामद कर लेती है। इसके जरिए भी अपराधी को पकड़ा जा सकेगा।
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प्रो. कृष्ण कुमार। - फोटो : अमर उजाला
भारत में यह रिसर्च अधिक कामयाब
वैज्ञानिकों का कहना है कि विदेशों में लोग जूते अधिक पहनते हैं लेकिन भारत में चप्पल का प्रयोग अधिक होता है। ऐसे में पदचिह्नों वाला यह रिसर्च देश में अधिक कारगर होगा। यानी अपराधी की पहचान करने में आसानी होगी। जरूरी नहीं कि घटना स्थल पर फिंगरप्रिंट ही मिलें। अपराधी को पदचिह्नों के जरिए पहचाना जा सकेगा। भारत में पदचिह्नों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों की भारी कमी है। दो से चार ही वैज्ञानिक हैं जो इस पर काम कर रहे हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के इस शोध को अमेरिका ने सराहा है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने जो शोध सेंसर तकनीक के जरिए किए हैं, यहां के वैज्ञानिकों ने इंकपेपर के जरिए किए हैं।

पदचिह्न विज्ञान ने तरक्की की है। नया रिसर्च सामने आया है जो अपराधियों को पकड़ने में सहायक होगा। बीएमआई के जरिए हम बता देंगे कि अपराधी कैसा है और पुलिस उसी दिशा में जांच करके अपराधी तक पहुंच सकेगी।  -डॉ. केवल कृष्ण, एंथ्रोपोलॉजी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़

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