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Harish Rana Dead: घर बेचा, दर-दर भटके पर आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़ी; सैंडविच बेचकर चलता रहा हरीश राणा का इलाज
अमर उजाला नेटवर्क, गाजियाबाद
Published by: Sharukh Khan
Updated Wed, 25 Mar 2026 01:25 PM IST
सार
हरीश राणा की दर्दनाक कहानी का अंत हो गया। गाजियाबाद निवासी हरीश के पिता ने इलाज कराने के लिए अपना घर बेच दिया, दर-दर भटके पर भी आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़ी। सैंडविच बेचकर उसका इलाज चलता रहा। 13 साल तक बेटे की सांसों से परिवार की दुनिया बंधी रही।
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हरीश राणा
- फोटो : अमर उजाला
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हरीश राणा की कहानी दर्द और संघर्ष की ऐसी दास्तान है, जिसमें पिता अशोक राणा का त्याग, मां निर्मला की प्रार्थना और बेटे की मौन पीड़ा एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल बीमारी नहीं, बल्कि उस जिद की भी कहानी है, जिसमें परिवार ने आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़ी। इसके लिए उन्हें अपनी सारी जमा पूंजी खर्च करने के साथ घर ही क्यों न बेचना पड़ा हो।
वर्ष 2013 में हुए हादसे के बाद हरीश कोमा में चले गए और उसी दिन से परिवार का जीवन एक अंतहीन संघर्ष में बदल गया। डॉक्टरों के पास उम्मीद थी तो माता-पिता के पास विश्वास।
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बेटे हरीश के साथ माता-पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
यही विश्वास उन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई से लेकर दिल्ली के बड़े अस्पतालों एम्स, लोक नायक, राम मनोहर लोहिया, अपोलो और फोर्टिस तक बार-बार ले जाता रहा। हर बार नई उम्मीद जागती, लेकिन धीरे-धीरे टूट जाती। इसके बावजूद पिता के मन में बेटे के ठीक होने की आस कभी खत्म नहीं हुई।
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हरीश के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तीन मंजिला घर बेच दिया
बेटे के ठीक होने की उम्मीद में अशोक राणा ने दिल्ली में अपना तीन मंजिला घर तक बेच दिया। इसके बाद परिवार राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में रहने लगा। जीवनयापन के लिए उन्होंने सैंडविच बेचना शुरू किया। एक समय अपने घर के मालिक रहे अशोक राणा अब सड़क किनारे खड़े होकर रोजी कमा रहे थे, लेकिन उनकी एक ही इच्छा थी कि बेटा एक दिन फिर से आंखें खोले और खड़ा हो सके।
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बेटे हरीश के साथ पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इलाज ने तोड़ी आर्थिक कमर
समय के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई। अशोक राणा की पेंशन मात्र साढ़े तीन हजार रुपये है, जो पर्याप्त नहीं थी। छोटे बेटे आशीष की नौकरी से कुछ सहारा मिला, लेकिन खर्च इतने अधिक थे कि हर दिन नई चिंता सामने खड़ी हो जाती।
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बेटे हरीश के साथ मां
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरीश के इलाज पर हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक खर्च होता था, जबकि एक नर्स का वेतन ही 27 हजार रुपये था। इन सबके बीच सबसे भारी था वह मानसिक दर्द, जिसे माता-पिता हर दिन सह रहे थे।
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