देश का पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। उस समय मतदान के लिए आठ आने की मेज और दो आने की कुर्सियों का इस्तेमाल किया गया था। चांदनी चौक इलाके में मतदान शिविर लगाने में एक रुपया खर्च हुआ था। पहले आम चुनाव में पोलिंग एजेंट रहे हाजी मियां फैयाजुद्दीन का कहना है कि तब से अब तक कीमतें ही नहीं, सोच भी पूरी तरह बदल गई है।
1952 का पहला मतदान था बहुत खास, सिर्फ 1 रुपये में लगा था पोलिंग बूथ, शाम को ही आ गए थे नतीजे
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कई गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़कर सामाजिक कार्यों को बढ़ावा देने वाले 81 वर्षीय हाजी मियां फैयाजुद्दीन ने बताया कि पहले आम चुनाव में वे चांदनी चौक के लाल दरवाजा क्षेत्र के चितला गेट प्राथमिक विद्यालय में बने पोलिंग स्टेशन में सबसे युवा एजेंट थे। मतदान शिविर बनाने के लिए आठ आने की मेज, दो-दो आने की दो-तीन कुर्सियां और किराए पर टैंट लिया गया था। उस वक्त चांदनी चौक इलाके की आबादी 80 हजार और पूरी दिल्ली की करीब 6 लाख थी। हाजी फैयाजुद्दीन ने बताया कि उस वक्त प्रत्याशियों का हौसला बढ़ाने के लिए समर्थक ही चुनाव प्रचार पर खर्च करते थे।
वर्तमान में चुनाव के दौरान पार्टियां और प्रत्याशी विज्ञापनों, जन रैलियों, पद यात्राओं और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों पर भारी खर्च करती हैैं। यही कारण है कि आज शहर में मतदान के समय लोगों में ज्यादा उत्साह नहीं दिखता। चांदनी चौक में मतदान के लिए गत्ते के टिकट का इस्तेमाल हुआ। इसका आकार पुराने रेलवे टिकट जैसा था, लेकिन उसका रंग रेलवे टिकट से अलग था। उस वक्त मतदान बॉक्स पर प्रत्याशी के लिए निर्धारित रंग का पर्चा और संबंधित पार्टी का चुनाव चिन्ह होता था। कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हल और दो बैलों की जोड़ी, जनसंघ (अब भाजपा) का चुनाव चिन्ह दीपक था।
सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह इमली का पेड़ था। उस वक्त निर्दलीय उम्मीदवार न के बराबर होते थे। केवल चार-पांच प्रत्याशी होते थे। मतदान केद्र पर मतदाताओं को एक टिकट दिया जाता था, जिसे वह अपने पसंदीदा प्रत्याशी के मतदान बॉक्स में डालते थे। हाजी मियां ने बताया कि सबसे खास बात यह है कि पहला मतदान शाम तक चला और दो-तीन घंटों बाद ही नतीजे घोषित कर दिए गए। मतदान बॉक्स में टिकट के जरिये डाले गए वोटों की गिनती मतदान खत्म होते ही शुरू हो गई थी।
महिलाएं करती थीं मतदान की शुरुआत
उस वक्त मतदान के लिए महिलाएं घरों का कामकाज छोड़कर सुबह-सुबह भारी संख्या में केंद्रों पर पहुंच जाती थीं। महिलाओं के घर लौटने पर दोपहर से शाम तक पुरुष मतदान करते थे। उस दौर में चुनाव का माहौल भी उत्साहवर्धक और भाईचारे वाला होता था। आज नेता खुलेआम एक-दूसरे के लिए कटु शब्द बोलते हैं, जिससे लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती है। नेताओं को पहले जैसी स्वच्छ राजनीति करनी चाहिए, न कि नकारात्मक सोच की राजनीति।