नागरिकता अधिनियम 2019 को लेकर लगातार पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। सरकार लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर रही है। कई जगह विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप भी ले रहें है। इसे काबू करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग भी करना पड़ रहा है। बता दें कि दोनों सदनों में नागरिकता विधेयक पास होने के बाद से ही पहले असम, फिर दिल्ली और अब देशभर में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। गुरुवार को भी दिल्ली, पटना, लखनऊ और बंगलूरू, मुंबई समेत देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए।
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आजादी के बाद हुए वो आंदोलन, जिन्होंने बिना हिंसा बदल दी भारत की तस्वीर
Sat, 21 Dec 2019 07:36 AM IST
Mohit Mudgal
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: Mohit Mudgal
Updated Sat, 21 Dec 2019 07:36 AM IST
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नागरिकता कानून 2019 को लेकर लंदन में विरोध प्रदर्शन (फाइल फोटो)
- फोटो : Twitter
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शांति घाटी आंदोलन
- शांति घाटी आंदोलन स्वतंत्र भारत का पहला बड़ा जन आंदोलन था। शांति घाटी केरल राज्य के पालघाट जिले में स्थित विशाल जंगल है। इस जंगल में कंथीपुज्हा नदी बहती है। साल 1928 में राज्य सरकार ने इस स्थान को बिजली बनाने के लिए चुना था। पर इसपर काम शुरू नहीं हो पाया।
- इसके बाद साल 1970 में केरल राज्य के विद्युत बोर्ड ने इस स्थान को जल विद्युत बांध बनाने के लिए चुना। अगर यह बांध बन जाता तो इससे करीब 9 किलोमीटर का क्षेत्र पानी में डूब जाता। बता दें कि शांति घाटी को अपने पेड़-पौधों और जंगल के लिए जाता है। यहां लंबी पूंछ वाले मकाक बंदर भी पाए जाते हैं, जो एक दुर्लभ प्रजाति है।
- मद्रास सर्प उद्यान की स्थापना करने वाले रोमुलस वीटाकर ने सबसे पहले इस बांध का विरोध शुरू किया। काफी विरोध और कई बुद्धिजीवियों से अपील करने के बाद भी केरल हाईकोर्ट ने साल 1980 में शांति घाटी में पेड़ों को काटने की मंजूरी दे दी।
- प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने केरल सरकार से इस योजना को बंद करने की बात कही। इसके बाद साल 1982 में एक कमेटी बनाई गई।
- साल 1983 में कमेटी ने रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस योजना को बंद करने के आदेश दिए। इसके बाद 15 नवंबर 1984 को इसे एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया। 7 सितंबर 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शांति घाटी नेशनल पार्क का उद्घाटन किया।
चिपको आंदोलन
- चिपको आंदोलन साल 1970 में उत्तराखंड में वनों की सुरक्षा के लिए शुरू किया गया। इसमें लोग पेड़ों को गले लगा लेते थे, ताकि उन्हें कोई काट ना सके। लोगों के पेड़ को गले लगाने को मानव और प्रकृति के बीच प्रेम का प्रतीक माना गया और इसे चिपको की संज्ञा दे दी गई।
- चिपको आंदोलन का मूल केंद्र रेनी गांव (जिला - चमोली) था, जो भारत-तिब्बत सीमा पर जोशीमठ से लगभग 22 किलोमीटर दूर ऋषिगंगा और विष्णुगंगा के संगम पर बसा है। वन विभाग ने इस क्षेत्र के अंगूर के 2451 पेड़, साइमंड कंपनी को ठेके पर दिए थे। इसके बाद चंडीप्रसाद भट्ट के नेत्तृव में 14 फरवरी 1974 को एक सभा की गई, जिसमें लोगों को चेताया गया कि यदि पेड़ गिराए तो उनका अस्तित्व खतरे में पड जाएगा।
- इस सभा के बाद 15 मार्च को गांव वालों ने रेनी जंगल की कटाई के विरोध में जुलूस निकाला। 24 मार्च को भी एक ऐसा ही जुलूस विद्यार्थियों ने भी निकाला। लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से। यहां सरकार ने एक तरकीब लगाई और खेतों के अधिग्रहण का मुआवजा लेने के लिए लोगों को चमोली बुला लिया।
- गांव के पुरुष मुआवजा लेने चमोली गए तो मौके का फायदा उठाते हुए ठेकेदार और वन अधिकारी जंगल में लकड़ी काटने घुस गए। गांव में अब सिर्फ महिलाएं ही बची थीं। 27 औरतों ने गौरादेवी के नेत्तृव में चिपको आंदोलन शुरू किया और इस प्रकार 26 मार्च 1974 को इस आंदोलन की नींव रखी गई।
- इसके बाद पहाड़ों में कई जगह पेड़ों की कटाई को लेकर कई बार चिपकों आंदोलन किया गया और ज्यादातर स्थानों पर सरकार को जनता के सामने झुकना पड़ा।
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जंगल बचाओ आंदोलन
- साल 1980 में बिहार में जंगल बचाने के लिए 'जंगल बचाओ आंदोलन' शुरू हुआ। हालांकि बाद में यह आंदोलन झारखंड और ओडिशा तक फैला।
- साल 1980 में सरकार ने बिहार के सिंहभूम जिले के जंगलो को मूल्यवान सागौन के पेड़ों के जंगल में बदलने की योजना पेश की, और इसी योजना के विरोध में बिहार (तब वर्तमान झारखंड भी बिहार का हिस्सा था) के सभी आदिवासी काबिले एकजुट हो गए। उन्होंने अपने जंगलो को बचाने के लिए यह आंदोलन चलाया।
- जहां सरकार ने सागौन के पौधे रोपे थे, आंदोलनकारियों ने उन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया। इससे सरकार को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
- इस आंदोलन में आदिवासियों ने मन बना लिया था कि वो अपनी जमीन वापस लेकर रहेंगे। साल 2006 में लंबी लड़ाई के बाद वन अधिकार विधेयक के रूप में आंदोलन को बड़ी सफलता मिली।
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नर्मदा बचाओ आंदोलन
- नर्मदा नदी पर बनते बांध इस आंदोलन का सबसे बड़ा कारण थे। आंदोलनकारियों का मानना है कि अगर इसका विरोध नहीं किया जाता तो नर्मदा का अस्तित्व खत्म हो जाता। अगर ऐसा होता तो इसका प्रभाव आस-पास के लोगों पर भी पड़ता क्योंकि कई परिवार नर्मदा से ही अपनी रोटी-रोजी चला रहे थे। इन सब को देखते हुए साल 1985 में कुछ लोग साथ आए और उन्होंने नर्मदा को बचाने के लिए प्रदर्शन शुरू किया।
- इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग ने हिस्सा लिया। चाहे वो आदिवासी हों, किसान हों या पर्यावरणविद। इस आंदोलन में मुख्य रूप से नर्मदा पर बन रहे बांधो को लेकर विरोध किया गया।
- बाद में जब आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी तो कई नामचीन हस्तियों ने भी इसमें भाग लिया। आंदोलनकारियों ने विरोध जताने के लिए भूख हड़ताल भी की। जिसके बाद में कोर्ट ने दखल देते हुए सरकार को आदेश दिया कि पहले प्रभावित लोगों का पुनर्वास किया जाए, उसके बाद ही आगे का काम किया जाए।
- इस आंदोलन की खास बात यह थी कि लोगों ने अपना वरोध जताने के लिए शांति का रास्ता चुना। हालांकि बाद में कोर्ट ने बांध बनाने की भी मंजूरी दे दी।
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