आज हम आपको एक महिला की कहानी बताने जा रहे हैं। एक ऐसी महिला जिसके कारण दुनियाभर की करोड़ों महिलाओं को मां बनने की खुशी मिल सकी और आज भी मिल रही है। वो महिला जिसने दुनिया को एक महान आविष्कार दिया। एक बड़ी और जटिल समस्या का हल ढूंढा। जिसने अपने शोध से प्रजनन चिकित्सा में क्रांति ला दी। लेकिन आज दुनिया के ज्यादातर लोग उसका नाम भी नहीं जानते।
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वो गुमनाम महिला जिसके कारण दुनिया की करोड़ों महिलाओं को मिली मां बनने का खुशी
Mon, 03 Feb 2020 04:27 PM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी
Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया
Updated Mon, 03 Feb 2020 04:27 PM IST
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मिरियम मेनकिन
- फोटो : BBC
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डॉ. जॉन रॉक
- फोटो : BBC / Harvard University
- मिरियम, हॉवर्ड में फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. जॉन रॉक के साथ एक तकनीशियन के तौर पर काम करती थीं। उनका मकसद इंसान के शरीर के बाहर प्रजनन करने वाले ऐसे अंडाणुओं को उपजाऊ बनाना था, जिनमें बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती।
- खुद डॉक्टर रॉक का मकसद भी बांझपन का निदान ढूंढना था। वो असल में अपनी रिसर्च से ऐसी औरतों की मदद करना चाहते थे जिनकी बच्चेदानी तो सेहतमंद थी लेकिन फैलोपियन ट्यूब गड़बड़ थी। इस काम में मिरियम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
मिरियम मेनकिन
- फोटो : BBC / Harvard University
- करीब 6 साल की मशक्कत और लगातार मिलने वाली नाकामियों के बाद फरवरी 1944 में मिरियम को कामयाबी मिली। जब उन्होंने अपनी लैब में देखा कि जिस स्पर्म को उन्होंने अंडे के साथ रखा था, वो एक हो गए हैं और कांच की डिश में इंसानी भ्रूण बनना शुरू हो गया है।
- मिरियम मेनकिन की इस कामयाबी से बच्चे पैदा करने की तकनीक में एक नए युग का आगाज हुआ। ऐसी कई महिलाओं के का मां बनने का सपना साकार होने लगा जो इसकी उम्मीद खो चुकी थीं।
- आज इस तकनीक को दुनियाभर में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक के नाम से जाना जाता है।
आगे पढें.. मरियम ने कैसे की खोज
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ब्रूकलिन का अस्पताल (फाइल फोटो)
- फोटो : BBC / Harvard University
- डॉक्टर रॉक ब्रूकलिन के एक खैराती अस्पताल में भी अपनी सेवाएं देते थे, जहां मिरियम सुबह आठ बजे ही पहुंच जाती थीं और ऑपरेशन थिएटर के बाहर टहलती रहती थीं।
- डॉक्टर रॉक अंडाशय का एक छोटा सा टुकड़ा मिरियम को देते थे, जिसे वो दौड़कर चौथे माले पर बनी लैब में ले जाती थीं और फिर उसमें अंडा तलाशती थीं। ये कोई आसान काम नहीं था। इस अंडे को तलाशने के लिए अक्सर शोधकर्ताओं को सूक्ष्मदर्शी कांच की जरूरत होती है। लेकिन मिरियम इसे नंगी आंखों से ही तलाश लेती थीं। यही नहीं, वो ये भी बता देती थीं कि अंडा सही आकार का है कि नहीं।
- मिरियम के लिए ये हर हफ्ते का काम हो गया। वो मंगलवार को अंडा खोजतीं, बुधवार को उसे स्पर्म के साथ मिलाती और शुक्रवार के दिन उसे माइक्रोस्कोप से देखतीं। ये काम वो 6 साल से भी ज्यादा समय तक करती रहीं। फरवरी 1944 में एक शुक्रवार को उन्हें कामयाबी मिल ही गई।
- हालांकि मिरियम खुद इस तरीके से बच्चा पैदा करने के हक में नहीं थीं। ये बात खुद उन्होंने एक बार एक रिपोर्टर को बताई थी।
आगे पढ़ें.. आईवीएफ तकनीक से कब पैदा हुआ था पहला बच्चा
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दुनिया में पहली बार आईवीएफ तकनीक से पैदा हुईं लुईस ब्राउन (फाइल फोटो)
- फोटो : social Media
- 1978 में दुनिया का पहली बार इन विट्रो फर्टिलाइजर (आईवीएफ) तकनीक से बच्चा पैदा हुआ था। उसका नाम है लुईस ब्राउन।
- 2017 में अमेरिका में सबसे ज्यादा 2,84,385 महिलाओं ने इस तकनीक से गर्भ धारण किया। इनसे 78,052 बच्चे दुनिया में आए।
- मेडिकल साइंस के इतिहास में ये कोई रातों-रात होने वाला करिश्मा नहीं था। बल्कि वर्षों की मेहनत, तकनीकी महारत और सब्र का नतीजा था।
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