भोजपुरी फिल्मों 'कसम धरती मईया की' और 'सत्या' के बाद अभिनेता दया शंकर पांडे की तीसरी फिल्म 'जया' अगले महीने रिलीज होने वाली है। दया का कहना है कि वह भोजपुरी सिनेमा में वही फिल्में करना चाहते हैं जिनमें फूहड़ता ना हो। वह यह भी कहते हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में सबसे ज्यादा भोजपुरी फिल्में बनती हैं लेकिन इनके बारे में कोई गर्व से बात नहीं करता।
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अभिनेता दया शंकर इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'जया' को लेकर सुर्खियों में हैं। अभिनेता ने फिल्म के संदेश और दिल छू लेने वाली कहानी को साझा किया है।
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अभिनेता दया शंकर पांडे कहते हैं, 'मुझे अलग अलग तरह के किरदार निभाने का मौका मिलता है तो करने में मजा आता है। मैंने दिनेश लाल यादव निरहुआ के साथ 'धरती मईया की कसम' और पवन सिंह के साथ 'सत्या' की थी। दोनों फिल्मों में मेन विलेन था। इन फिल्मों में एक अभिनेता के तौर पर मुझे अलग करने को मिला। हिंदुस्तान में कई क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में बन रही हैं लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारी मराठी फिल्में, हमारी साउथ की फिल्में अच्छी है। लेकिन भोजपुरी सिनेमा को हम गर्व से नहीं कह पाते कि हमारी फिल्में बहुत अच्छी हैं, यह एक बहुत बड़ी बिडंबना है।'
दया का मानना है कि जो समाज के लिए बदलाव लाए वह सिनेमा है। वह कहते हैं, 'फिल्मों से हम भले ही ज्यादा पैसे कमा रहे हैं, लेकिन सिनेमा का एक स्तर होना चाहिए। मैं अवार्ड को सेकेंडरी समझता हूं। कला इसीलिए बनी कि वह समाज को बदले। चाहे वह कहानियों के माध्यम से हो या फिर कविताओं के माध्यम से। भोजपुरी फिल्म 'जया' एक सामाजिक संदेश देती है। मुझे ऐसी फिल्म करने में आनंद आता है और मैं ऐसे सिनेमा के साथ जुड़ा हूं चाहे वह फिल्म 'लगान', 'स्वदेश', और 'गंगाजल' जैसी फिल्मों हो जिसने समाज को सामाजिक रूप से एक नया दृष्टिकोण दिया।'
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दया शंकर पांडे कहते हैं, 'एक कलाकार के तौर पर मेरा मानना है कि हमारा ऐसा योगदान सिनेमा के प्रति होना चाहिए, जिससे समाज हमारी कला और कहानी से कुछ सीखे। और, बदलाव आए। क्योंकि ऐसा हमेशा से होता आ रहा है, चाहे भारतीय सिनेमा हो या फिर हॉलीवुड की फिल्में, समाज के बदलाव में सिनेमा की अहम भूमिका रही है। कहानी और नाटक समाज को बदलने के माध्यम रहे हैं। फिल्में देखकर लोग अपने जीवन में बदलाव लाने कोशिश करते हैं। हमने भी किया है, फिल्में देखकर हमारे भी विचार बदले हैं। आज हम 'रामायण', 'महाभारत' और 'गीता' पढ़ते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं ऐसा होना चाहिए।
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भोजपुरी फिल्म 'जया' के बारे में दया शंकर पांडे कहते हैं, 'इस फिल्म में मैं मुर्दा जलाने वाले डोम का किरदार निभा रहा हूं। एक समय आता है जब मेरी बेटी यही काम करती है तो समाज के लोग उस पर उंगली उठाते हैं। इस फिल्म में इस सवाल का जवाब दिया गया है कि आखिर लड़की डोम का काम क्यों नहीं कर सकती है? यह एक अलग तरह की फिल्म है, बहुत अच्छी बात है कि भोजपुरी में ऐसी फिल्में बन रही हैं। फिल्म के निर्माता निर्देशक ने जिस तरह से फिल्म का विषय चुना है, उसके लिए मैने उन्हें दाद देता हूं कि ऐसी फिल्म बनाई और मुझे ऐसी फिल्म का हिस्सा बनने में खुशी हुई।'
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