अमर उजाला डिजिटल से की गई बातचीत में इमरान हाशमी ने ‘तस्करी’ वेब सीरीज से जुड़े अनुभव साझा किए। इसके अलावा उन्होंने फिल्मों की बदलती कहानियों और सोशल मीडिया की तीखी प्रतिक्रियों पर भी अपनी राय रखी। पढ़िए, इस खास बातचीत के प्रमुख अंश-
‘फिल्म इंडस्ट्री एकजुट नहीं…’, इमरान हाशमी ने बॉलीवुड को लेकर किया खुलासा; ट्रोलिंग पर साझा की राय
Emraan Hashmi Interview: इमरान हाशमी हाल ही में रिलीज हुई वेब सीरीज 'तस्करी: द स्मगलर्स वेब’ में नजर आए हैं। इसी बीच उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में फिल्म इंडस्ट्री के तौर तरीकों पर बात की।
सीरीज ‘तस्करी’ आपके लिए क्या नया लेकर आई?
मुझे अंदाजा ही नहीं था कि यह दुनिया इतनी रॉ और रियल होगी। एयरपोर्ट और कस्टम में चीजें किस तरह होती हैं यह आम नागरिकों को कभी पता नहीं चलता। स्मगलिंग का सामान देश में किस तरह अंदर आता है, यह भी हमें सिर्फ खबरों में पढ़ने को मिलता है। लेकिन इस वेब सीरीज के लिए टीम ने जिस स्तर पर रिसर्च की वह बहुत चौंकाने वाला था। कस्टम अफसर कैसे काम करते हैं और पूरी प्रोसेस कैसे चलती है...यह सब जानना मेरे लिए नया और अलग अनुभव था।
आज इंडस्ट्री को पहले से कितना बदला हुआ पाते हैं?
परिभाषा बहुत बदल गई है। मैंने जब शुरुआत की थी तब लीड हीरो की एक तय इमेज होती थी। हीरो आता था, हालात पलट देता था और कहानी पूरी हो जाती थी लेकिन आज का समय इससे बहुत अलग है। ओटीटी ने ऑडियंस का टेस्ट बदल दिया है। कोविड के बाद ऑडियंस ने दुनिया भर का कंटेंट देखा है। अब लीडिंग मैन सिर्फ हीरो नहीं होता, बल्कि उसका किरदार स्पष्ट और गहराई वाला लिखना पड़ता है। कई किरदारों वाली फिल्में बन रही हैं और एक ही जॉनर में कई तरह के प्रयोग हो रहे हैं। यह बदलाव इंडस्ट्री के लिए अच्छा है।
बतौर अभिनेता सोशल मीडिया की नकारात्मकता और ट्रोलिंग का कितना असर पड़ता है?
बहुत ज्यादा असर पड़ता है। सोशल मीडिया आज सबसे ज्यादा शोरगुल से भरा मंच बन चुका है। यहां ट्रोलिंग होती है, नकारात्मक जानकारी और गलत बातें भी तेजी से फैल जाती हैं। फैन आपस में भिड़ भी जाते हैं। पहले ऐसा माहौल नहीं था। मैं एक साधारण माहौल से आता हूं, इसलिए यह लगातार बढ़ता डिजिटल शोर कई बार मानसिक रूप से थका देता है।
क्या आपको लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री सच में एकजुट नहीं है?
हां, ऐसा ही लगता है। फिल्म इंडस्ट्री एकजुट नहीं है। यहां लोग सामने कुछ नहीं कहते, लेकिन पीठ पीछे बहुत बातें होती हैं। इंडस्ट्री में खींचतान की मानसिकता बहुत आम है। अगर कोई अच्छा काम कर रहा हो तो कई लोग उसे नीचे लाने की कोशिश करते हैं। यह सोच कि अगर मेरे पास नहीं है तो दूसरे के पास क्यों हो, अभी भी यहां मौजूद है और यह अच्छी बात नहीं है।
कौन सा जोनर है जिसे भारतीय सिनेमा अब तक एक्सप्लोर नहीं कर पाया?
साइंस फिक्शन। हमने इसे छुआ जरूर है, लेकिन कभी गहराई से नहीं बनाया। सच यह है कि साइंस फिक्शन तभी सफल हो सकता है जब निर्देशक मजबूत हो और विषय वास्तव में नया और अलग हो। नहीं तो यह जोनर प्रभाव नहीं डाल पाता।
बॉक्स ऑफिस नंबर और ओटीटी व्यूअरशिप का प्रेशर आप कैसे संभालते हैं?
देखिए, दबाव हमेशा रहता है लेकिन वैसा नहीं जैसा लोग बाहर से समझते हैं। जब आप कोई फिल्म करते हैं, तो बस यही उम्मीद होती है कि ऑडियंस उसे स्वीकार करे। सच यह है कि कोई नहीं जानता कि फिल्म थिएटर में चली या ओटीटी पर पसंद की जाएगी। अगर आप हर समय इसके बारे में सोचते रहेंगे, तो आपका ध्यान काम से हट जाएगा। यह सब आपके कंट्रोल में नहीं होता। आपकी जिम्मेदारी बस ईमानदारी से अपना काम करना है। फिर आज यह समझना और भी मुश्किल हो गया है कि क्या चलेगा और क्या नहीं। बॉक्स ऑफिस पर शुक्रवार को आंकड़े आते ही सभी चिंतित हो जाते हैं। प्रोड्यूसर को भी इसी बात की चिंता रहती है कि अगर फिल्म अच्छी शुरुआत नहीं कर पाई तो आगे क्या होगा? ओटीटी पर भी यही दबाव होता है। अगर पहले वीकएंड में व्यूअरशिप कम रहती है, तो शो या फिल्म की सक्सेस धीमी हो जाती है। इंडस्ट्री में अब सब कुछ आंकड़ों पर बेस्ड है। और कई बार ये आंकड़े भी सही नहीं होते, क्योंकि उनमें जानबूझकर बदलाव कर दिए जाते हैं। हम सबको इस स्थिति में काम करना पड़ रहा है।
हां, बिल्कुल। आजकल कई फिल्में कंटेंट की वजह से नहीं बल्कि सोशल मीडिया की वजह से पहले तीन दिनों में ही नुकसान झेलती हैं। लोग फिल्म देखे बिना ही फैसला सुना देते हैं। कई बार समझ ही नहीं आता कि इतनी नेगेटिविटी क्यों और कहां से आती है। क्या दुनिया हमेशा ऐसी थी या अब नेगेटिव होना एक आदत बन गया है, इसका जवाब मेरे पास नहीं है। लेकिन इतना जरूर समझ में आता है कि अगर आप इसमें बहुत अधिक ध्यान देंगे तो यह आपको मानसिक तौर पर परेशान कर देगा। यह आपकी नींद को प्रभावित करता है और ध्यान भटकाता है। इसलिए खुद पर भरोसा रखना जरूरी है और बाहरी प्रतिक्रिया से कुछ दूरी बना कर चलना पड़ता है।