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बाइस्कोप: जीतेंद्र, कमल हासन और अनिल कपूर तक थे इस कहानी पर फिदा, लेकिन नंबर लगा राजेश खन्ना का

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 31 May 2020 01:04 PM IST
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masterji movie this day that year series by pankaj shukla 31 may 1985 rajesh Khanna sridevi
फिल्म- मास्टरजी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

ये बात है सन 1983 की। कानपुर की सर्दियां किसी मायने में दिल्ली की सर्दी से कम नहीं हुआ करती हैं। लेकिन, तब शहर इतना प्रदूषित नहीं था और सडकें भी शहर की बेहतर हालत में हुआ करती थीं। परेड चौराहे से लाल इमली की तरफ जाने वाली सड़क पर रोज का आना जाना था। फरवरी का आखिरी हफ्ता था।



और, एक दिन सबेरे सबेरे इम्पीरियल टॉकीज के सामने फैक्ट्री से निकले मजदूरों की सैकड़ों साइकिलें देख बाकी लोग भी रुकने लगे। सबकी निगाहें टॉकीज के बाहर हाथ से पेंट करके बनाए गए एक बड़े से पोस्टर पर लगी थीं। टॉकीज के बगल में शहर की सबसे बड़ी पेंटिंग वर्कशॉप रंगशाला हुआ करती थी और उसके मुख्य पेंटर शरीफ फिल्मों के शौकीनों में बेहद लोकप्रिय और जाना पहचाना नाम हुआ करते थे। शरीफ के हाथों का कमाल इस होर्डिंग में भी बिल्कुल सजीव सी दिख रही तस्वीर में दिख रहा था।

पोस्टर पर एक युवती पीले रंग का ऑफ शोल्डर टॉप पहने और बेहद चुस्त पैंट में खड़ी थी। फिल्म का नाम लिखा था, हिम्मतवाला। और, हीरोइन का नाम हीरो से भी बड़े फॉन्ट में। पब्लिक की सारी दिलचस्पी इसी नई हीरोइन श्रीदेवी की कद काठी में थी और थिएटर के मैनेजर से लेकर मालिक तक सब इस बात पर लहालोट हो रहे थे कि सिर्फ पोस्टर का ये क्रेज है तो फिल्म रिलीज होगी तो क्या होगा। इन्हीं श्रीदेवी की फिल्म मास्टरजी है हमारी आज के बायस्कोप की फिल्म।

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फिल्म- मास्टरजी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

श्रीदेवी का जादू हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सिर थोड़ी देर से चढ़ा क्योंकि रानी मेरा नाम में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट और जूली में सेकंड लीड हीरोइन के तौर पर नजर आने के बाद वह अमोल पालेकर के साथ फिल्म सोलवां सावन में बाकायदा लीड रोल कर चुकी थीं। लेकिन, उन्हें चमकना था तो जीतेंद्र की हीरोइन बनकर।

फिल्म मास्टरजी की रिलीज से पहले श्रीदेवी एक दर्जन से ज्यादा हिंदी फिल्में बतौर लीड हीरोइन कर चुकी थीं और इनमें से आठ फिल्में थीं जीतेंद्र के साथ। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी फिल्म इंकलाब हिट हो चुकी थी। कमल हासन के साथ रिलीज हुई फिल्म सदमा से वह समीक्षकों को भी भा चुकी थीं।

तभी तमिलनाडु में एक फिल्म का ज़बर्दस्त हल्ला हुआ। फिल्म का नाम था, मुनधनई मिदुचू। फिल्म की हीरोइन उर्वशी नई थी। काम फिल्म में उनका अपने नाम के ही अनुरूप रहा। लेकिन फिल्म के हीरो के भाग्यराज के करियर की ये सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित हुई। के भाग्यराज का साउथ में बड़ा जलवा रहा है।

वह निर्देशक भी कमाल के हैं और अभिनेता उससे बड़े धमाल के। भाग्यराज की लिखी फिल्मों पर कोई एक दर्जन हिंदी फिल्में बन चुकी हैं। जिनमें अनिल कपूर की पहली सोलो हिट फिल्म वो सात दिन से लेकर मास्टरजी, आखिरी रास्ता, बेटा, राजा बाबू, अंदाज, गोपी किशन, मिस्टर बेचारा, घरवाली बाहरवाली शामिल हैं। वैसे भाग्यराज भी अनिल कपूर की हिट फिल्म मिस्टर इंडिया के तमिल रीमेक में बतौर हीरो काम कर चुके हैं।


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फिल्म- मास्टरजी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

भाग्यराज का यहां जिक्र इसलिए क्योंकि फिल्म मास्टरजी जब बननी शुरू हुई तो इसके निर्देशक के तौर पर पहला नाम उन्हीं का आया। इस फिल्म से पहले के भाग्यराज की फिल्म मौना गीतांगल की रीमेक जीतेंद्र और रेखा की फिल्म एक ही भूल भी सुपरहिट हो चुकी थी। भाग्यराज फिल्म मास्टरजी में हीरो के तौर पर अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे।

अमिताभ बच्चन ने ये कहानी सुनी भी पर बात बनी नहीं। के भाग्यराज भी जिद के पक्के इंसान ठहरे। उनका कहना था कि वह हिंदी में फिल्म जब भी बनाएंगे तो पहली फिल्म अमिताभ बच्चन के साथ ही बनाएंगे। दोनों की जोड़ी मास्टरजी में तो नहीं बन सकी लेकिन के भाग्यराज को जल्दी ही ये मौका मिला फिल्म आखिरी रास्ता में। ये फिल्म उन्होंने कमल हासन के लिए तमिल में लिखी थी ओरु कैदियन डायरी के नाम से। आखिरी रास्ता भी सुपरहिट फिल्म रही और इस फिल्म में के भाग्यराज ने अमिताभ बच्चन के साथ श्रीदेवी और जयाप्रदा को भी लिया था।

खैर हम लौटते हैं अपनी आज के बाइस्कोप की फिल्म मास्टरजी की तरफ। जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि श्रीदेवी की फिल्म हिम्मतवाला से लेकर बलिदान तक उनके हिंदी सिनेमा के करियर में जीतेंद्र ही जीतेंद्र छाए हुए थे। तो जब इस बात की चर्चा चली कि के भाग्यराज की एक औऱ सुपरडुपर हिट फिल्म का रीमेक हिंदी में श्रीदेवी के साथ बनने जा रहा है तो जीतेंद्र निश्चिंत थे कि ये फिल्म तो उनके साथ ही बनेगी।

लेकिन, फिल्म के प्रोड्यूसर आर सी शर्मा अमिताभ बच्चन को ये कहानी सुनाने के बाद पहुंच गए थे राजेश खन्ना के पास। इस बात को कोई कंफर्म तो नहीं करता है पर कहा यही जाता है कि फिल्म के लिए राजेश खन्ना का नाम खुद अमिताभ बच्चन ने ही सुझाया। राजपूत, डिस्को डांसर, सौतन, अवतार, अगर तुम ना होते जैसी फिल्मों से अपनी सेकंड इनिंग्स चमका रहे राजेश खन्ना को उन दिनों काम की कमी तो नहीं थी लेकिन फिल्म मास्टरजी का किरदार ऐसा था कि एक बार इसकी कहानी सुनकर राजेश खन्ना का चेहरा भी दो सौ वाट के बल्ब की तरह चमक गया।

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फिल्म- मास्टरजी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मास्टर जी कहानी है एक ऐसे अध्यापक की जो गांव में अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ नौकरी करने आता है। पढ़ाना और बच्चे को पालना दोनों काम वह एक साथ करता है। गांव की एक युवती अपने मसखरेपन के लिए चर्चित है। वह लोगों के साथ मजाक करती है। मास्टरजी के साथ भी वह ऐसा ही कुछ करने की कोशिश करती है, लेकिन अपनी पत्नी के गम से दुखी मास्टर उसे घास नहीं डालता।

वह दूसरी शादी भी नहीं करना चाहता क्योंकि उसे नहीं पता कि नई मां उसके बेटे को कैसे पालेगी? दोनों के अहं का टकराव होता है और मास्टरजी को नीचा दिखाने के लिए छोकरी उन पर ‘मी टू’ जैसा आरोप लगा देती है। पंचायत दोनो की शादी करने का फैसला सुनाती है। शादी तो हो जाती है पर दोनों के बीच पति पत्नी जैसा रिश्ता नहीं बनता। उर्वशी बनकर मास्टरजी की ये तपस्या भंग करने के लिए जो कुछ आगे होता है वही फिल्म मास्टरजी की कहानी है।

इस फिल्म की तमिल ओरीजनल फिल्म को हिंदी सिनेमा के नायकों में पहले पहल संजीव कुमार ने देखा था। संजीव कुमार ने तमिल फिल्म के निर्देशक के भाग्यराज से वादा भी किया कि वह इसकी हिंदी रीमेक में काम करेंगे। लेकिन, ये वो दौर था जब संजीव कुमार 24 घंटे नशे में धुत रहते थे। हेमा मालिनी की धर्मेंद्र से शादी हो जाने का गम उनसे छूटा नहीं था और फिल्म मास्टरजी की टीम ने ये फैसला किया कि उनके साथ ये फिल्म बनाना बहुत मुश्किल होगा।

संजीव कुमार और जीतेंद्र के अलावा एक और अभिनेता की इस फिल्म को लेकर बहुत तगड़ी दिलचस्पी रही और वह हैं अनिल कपूर। लेकिन, निर्माताओं को लगा कि फिल्म के किरदार के हिसाब से अनिल कपूर जैसे कलाकार की उम्र काफी कम है। के भाग्यराज ने भी अनिल कपूर को यही सलाह दी। अनिल कपूर ने आगे चलकर तमाम रीमेक फिल्मों में काम करके अपना नाम रौशन किया। इस फिल्म के लिए कुछ समय तक कमल हासन का भी नाम फिल्म के लीड हीरो के तौर पर चर्चा में रहा। कमल हासन की इच्छा भी थी ये फिल्म करने की लेकिन कभी उन्होंने इसकी ख्वाहिश सार्वजनिक नहीं की।

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फिल्म- मास्टरजी - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्म मास्टरजी जब के भाग्यराज ने निर्देशित नहीं की तो इसके निर्देशन का जिम्मा मिला श्रीदेवी की पहली सुपरहिट हिंदी फिल्म हिम्मतवाला निर्देशित करने वाले के राघवेंद्र राव को। इनका पूरा नाम है कोवेलामुदी राघवेंद्र राव। जीतेंद्र के साथ उनकी खूब जमी।

और, उनके बेटे प्रकाश कोवेलामुदी ने पिछले साल जीतेंद्र की बेटी एकता कपूर के लिए निर्देशित की अपनी पहली हिंदी फिल्म, जजमेंटल है क्या। राघवेंद्र राव औऱ जीतेंद्र की दोस्ती फिल्म हिम्मतवाला से पहले शुरू हो चुकी थी जब दोनों की जोड़ी ने पूनम ढिल्लों के साथ निशाना और हेमा मालिनी व रति अग्निहोत्री के साथ फर्ज और कानून जैसी फिल्में बनाईं। राजेश खन्ना भी मास्टरजी से पहले के राघवेंद्र राव की बतौर निर्माता निर्देशक बनी हिंदी फिल्म नया कदम में काम कर चुके थे।

उस दौर की इन फिल्मों में नायिका की कामुकता, मादकता और हीरो को रिझाने के लिए फेंके जाने वाले पैंतरों पर निर्देशक का पूरा ध्यान रहता। युवाओं को फोकस में रखकर बनने वाली इन फिल्मों को पूरे परिवार के साथ देखना कई बार मुश्किल हो जाता था क्योंकि इन फिल्मों के संवाद अक्सर कादर खान लिखा करते। निर्माताओं की डिमांड कुछ कुछ दादा कोंडके की फिल्मों जैसे संवादों की होती और कादर खान ये सोचकर इंकार नहीं करते कि वह नहीं लिखेंगे तो कोई और इन्हें लिखेगा।

कादर खान और शक्ति कपूर की जोड़ी ने इन संवादों को परदे पर भी एक अलग ही गिरावट के साथ पेश किया। हिंदी सिनेमा के संवादों में दोहरे मायनों वाली बातों का ये कादर खान काल भी कहा जा सकता है। फिल्म मास्टरजी चली तो बस श्रीदेवी की श्रृंगार रस में पगी अदाओं और फिल्म के संवादों के कारण।

फिल्म मास्टरजी का संगीत ज्यादा कुछ फिल्म को सपोर्ट कर नहीं पाया और बप्पी लाहिड़ी भी उन दिनों बस गाने छाप दिया करते थे। फिल्में फिर भी सुपरहिट होती थीं। मास्टर जी भी सुपरहिट ही रही। दक्षिण के निर्माताओं ने हिंदी सिनेमा वालों की तिजोरियां भरने में अहम भूमिकाएं निभाई हैं। ये तो भला हो मणि रत्नम जैसे निर्देशकों का जिन्होंने बाद में आकर मामला संभाल लिया नहीं तो अस्सी के दशक का ये मसाला डोसा टाइप का साउथ सिनेमा हिंदी सिनेमा को कहां ले जाता, किसी को कुछ पता नहीं। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल यानी 1 जून को बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

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