कुछ किस्सों की तकदीर भी निराली होती है। अब देखिए ना। उत्तर प्रदेश पुलिस में रहते हुए आईपीएस अरुण कुमार ने देश में पहली बार मोबाइल सर्विलांस से कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला को तलाश निकाला था। इस घटना पर निर्देशक कबीर कौशिक ने फिल्म बनाई, सहर। इस तफ्तीश और इस एनकाउंटर में शामिल असली पुलिस अफसरों को लेकर मैंने एक टीवी कार्यक्रम बनाया, पूरब का पहला डॉन। कार्यक्रम के बाद आमिर खान ने कबीर कौशिक के फोन पर एक संदेश भेजा, अगर आपके पास कोई ऐसी स्क्रिप्ट हो जो मेरे लिए फिट हो तो जरूर बताएं। कबीर कौशिक ने बड़े जतन से आमिर खान के लिए एक फिल्म लिखी। और, तकरीबन उसी समय मुझे ये पता चला कि शिबानी बथीजा नाम की एक लेखक ने यशराज फिल्म्स के लिए आतंकवाद के मुद्दे पर कोई कहानी लिखनी शुरू की है, जिसमें आमिर खान का निगेटिव रोल है।
बाइस्कोप: इस फिल्म से पहली बार बीजेपी के निशाने पर आए आमिर खान, काजोल की एक्टिंग ने जीते करोड़ों दिल
मेरे मना करने के बाद भी कबीर कौशिक को तसल्ली नहीं हुई। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं आमिर खान से पूछ लूं कि क्या फना में उनका रोल एक आतंकवादी का है। ये वो दौर था जब आमिर खान की फिल्म मंगल पांडे रिलीज हो चुकी थी। फिल्म के कारोबार को लेकर आमिर खान तकरीबन दैनिक स्तर पर मुझे मैसेज करते। रंग दे बसंती की रिलीज नजदीक आई तो उसके ट्रेलर और गानों पर भी मेरी प्रतिक्रिया का उन्हें इंतजार रहता। मैंने आमिर को मैसेज किया कि क्या वह फना में आतंकवादी बने हैं? आमिर की ये आदत है कि सच बात का वह जवाब नहीं देते और अगर संदेश में कोई बात गलत हो या अफवाह हो तो वह पलट कर तुरंत मैसेज करते हैं। जाहिर था कि आमिर ने जवाब नहीं दिया। कबीर फिर भी आमिर से मिले। अपनी कहानी सुनाई और फना रिलीज होने का इंतजार करते रहे।
आमिर के करियर की पहली सौ करोड़ी फिल्म फना ने कबीर कौशिक की फिल्म कजा को उस मीटिंग से कभी आगे नहीं बढ़ने दिया। शिबानी बथीजा की लिखी और कुणाल कोहली निर्देशित फिल्म फना 26 मई 2006 को रिलीज हुई। इससे पहले आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती उसी साल गणतंत्र दिवस पर रिलीज हो चुकी थी। रंग दे बसंती पूरी देशभक्ति टाइप फील वाली फिल्म थी। आमिर बने भी उसमें चंद्रशेखर आजाद थे। उससे पहले वह मंगल पांडे भी बन ही चुके थे। तो उनके भीतर एक अलग टाइप का जोश भरा हुआ था कि कुछ तो करना है। ये जोश उन्हें लेकर चला गया गुजरात।
गुजरात में तब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री हुआ करते थे। वहां जाकर आमिर खान नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल हुए। बांध से विस्थापित लोगों के बारे में भी उन्होंने बयान दिए और बस आमिर खान आ गए सीधे राज्य बीजेपी के निशाने पर। फिल्म फना वैसे ही संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म थी। फिल्म में आमिर का किरदार आतंकवादी का और मामला इतना गर्म हुआ कि पूछो मत। पूरे गुजरात में आमिर खान के पुतले जलाए गए। फिल्म फना के पोस्टर फाड़े गए। बैनर जला दिए गए। राज्य के सिनेमाघर मालिकों ने हाथ जोड़ लिए कि भैया, ये फिल्म हम अपने यहां नहीं लगा सकते।
फिल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा को लगा कि ऐसे कैसे? यशराज फिल्म्स की पिक्चर है, कोई मजाक थोड़े ही है। वह चले गए सुप्रीम कोर्ट कि वह उनकी फिल्म को गुजरात में रिलीज कराए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि उसका काम किसी फिल्म को रिलीज कराने का नहीं है, आदित्य चोपड़ा को दिक्कत हो तो वह राज्य की पुलिस से कहें। जिन सिनेमाघरों को सुरक्षा की जरूरत होगी, वह उन्हें मिल जाएगी। लेकिन, फिल्म गुजरात में रिलीज नहीं हुई। कुणाल कोहली ने प्रेस कांफ्रेंस भी की। पर बात बनी नहीं। एक सिंगल स्क्रीन थिएटर वाले को जोश चढ़ा और उसने अपने यहां फिल्म रिलीज कर दी। वहां एक दर्शक मिट्टी का तेल लेकर पहुंचा और फिल्म के इंटरवल में बाथरूम में जाकर खुद को आग लगा ली। मामला फिर पूरे देश में फैल गया। इस सिंगल स्क्रीन से भी फिल्म हटानी ही पड़ी।
फिल्म फना में इसके कलाकारों ने काम भी कमाल का किया। मां बनने के बाद काजोल की इसे कमबैक फिल्म बताया जा रहा था। काजोल ने इससे तीन साल पहले कभी खुशी कभी गम की थी। और, आमिर खान ने फिल्म मंगल पांडे की थी अपनी पिछली फिल्म दिल चाहता है, के चार साल बाद। तो आमिर खान का कमबैक कैसे नहीं हुआ और काजोल की ये कमबैक फिल्म कैसे हो गई, इस पर लंबी बहसें दोनों के प्रशंसकों के बीच उन दिनों हुआ करती थीं। फिल्म के 14 साल पूरे होने पर काजोल ने फना की शूटिंग के दौरान के पलों को याद किया और अपनी व आमिर की एक पिक्चर भी सोशल मीडिया पर साझा की जिसे यशराज फिल्म्स ने रीट्वीट भी किया। काजोल के किरदार के इर्द गिर्द ही ये पूरी फिल्म घूमती है।
फिल्म फना में काजोल का किरदार जूनी अली बेग का है जो देख नहीं सकती। जूनी अपनी सहेलियों के साथ दिल्ली घूमने आती है। यहां उसे रेहान नाम का एक टूरिस्ट मिलता है। दोनों में इश्क होता है। जूनी के घर वाले दिल्ली आ जाते हैं दोनों की शादी की खातिर। जूनी का ऑपरेशन होता है। उसकी रोशनी वापस आती है तो पता चलता है कि रेहान दिल्ली बम ब्लास्ट में मारा गया। कहानी का अगला सिरा सात साल बाद हाथ आता है और पता चलता है कि रेहान जिंदा है। वह कट्टर आतंकवादी है। एसटीएफ की अफसर त्यागी उसके पीछे है। जूनी के वालिद बेग साब उसे आगे से मिलते हैं। कहानी उस मोड़ पर आकर मदर इंडिया बन जाती है जब जूनी अपने शौहर को गोली मार देती है।
फिल्म में काजोल को इस बेहतरीन अभिनय के लिए फिल्मफेयर और जी सिने अवार्ड्स में बेस्ट एक्टर फीमेल के खिताब मिले। दिलचस्प बात ये है कि इसके साल भर पहले ही काजोल की चचेरी बहन रानी मुखर्जी ने भी ब्लैक में एक दृष्टिहीन का किरदार करके बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड जीता था। आमिर खान को इस फिल्म के लिए गुजरात में गालियां और बाकी पूरे देश में खूब तालियां मिलीं। आमिर के करियर की ये एक बेहद अहम फिल्म है जिसमें उन्होंने अपने किरदार के जरिए अभिनय के तमाम अलग अलग रंगों को एक साथ परदे पर पेश किया। जूनी बेग के पिता से मिलने वाला सीन फिल्म की हाईलाइट है। जहां वह रेहान ही असलियत पहचान जाता है। ऋषि कपूर निर्देशक कुणाल कोहली की फिल्मों के परमानेंट कलाकार से रहे। फना से पहले वह हम तुम में भी थे और फना के बाद थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक में भी। तब्बू ने मकबूल में निम्मी का किरदार करने के बाद फना में मालिनी त्यागी के किरदार में एक बार फिर लोगों को चौंकाया। फिल्म में उनका अभिनय कमाल का रहा।
फिल्म के गाने और कमाल के निकले। ये और बात है कि तब इसके गीतकार प्रसून जोशी राजनीतिक रूप से इतने प्रभावी नहीं हो पाए थे कि गुजरात सरकार से इस फिल्म को वहां रिलीज हो जाने देने की सिफारिश कर पाते। हां, फिल्म में लिखा उनका गाना चांद सिफारिश करोड़ों लोगों ने देखा और सुना और ये गाना उस साल का सुपरहिट गाना भी रहा। प्रसून को इस गाने के लिए फिल्मफेयर और आइफा ने सर्वश्रेष्ठ गीतकार के पुरस्कार दिए। इस गाने को गाने के लिए शान को उस साल के चारों मुख्य पुरस्कारों फिल्मफेयर, स्क्रीन, जी और आइफा में सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार मिला। फिल्मफेयर और आइफा ने ये पुरस्कार देते समय गाने में उनके सह गायक रहे कैलाश खेर का भी नाम जोड़ा। सोनू निगम और सुनिधि चौहान का गाया गाना, मेरे हाथ में, भी खूब लोकप्रिय हुआ। इस गाने के बीच बीच में आपको आमिर खान और काजोल की आवाज में शेरो शायरी भी सुनाई देती है।