आने वाले अक्टूबर महीने में अमिताभ बच्चन को परदे पर हीरो का चोला छोड़े 20 साल हो जाएंगे। इन 20 सालों में ऐसा नहीं कि अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में लीड रोल करने की बजाय सारे कैरेक्टर रोल्स ही कर डाले। नहीं, बिल्कुल नहीं। अमिताभ बच्चन के लिए इन दो दशकों में तमाम निर्देशकों ने ऐसी फिल्में रची हैं, जिनके बारे में आने वाली तमाम पीढ़ियां बरसों बरस बातें करती रहेंगी। अमिताभ की ये पारी दरअसल सबसे कमाल की पारी रही है। सन 2005 में 63 बरस की उम्र में ब्लैक के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनय का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाले अमिताभ बच्चन ने इसके दो साल बाद दो ऐसी फिल्में की, जिन्होंने उनके भीतर शहद सी घुली रूमानियत को एक नई मिठास के साथ परदे पर पेश किया। ये फिल्में थीं, निशब्द और चीनी कम। ब्लैक के चार साल बाद अमिताभ बच्चन ने फिल्म पा के लिए और फिर 2015 में पीकू के लिए अभिनय के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अमिताभ बच्चन को 1990 में फिल्म अग्निपथ के लिए मिला था। मुख्य अभिनेता के तौर पर चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाले वह देश के इकलौते अभिनेता है। पिछले साल उन्हें सिनेमा का सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिल चुका है।
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आज के बाइस्कोप में मैं बात कर रहा हूं फिल्म चीनी कम की। राम गोपाल वर्मा की दो फिल्मों निशब्द और आग के बीच में मई की झुलसा देने वाली गर्मी के बीच ये फिल्म रिलीज हुई। ये तो मैं पहले ही बता चुका हूं कि मई महीना अमिताभ बच्चन को बॉक्स ऑफिस के हिसाब से बहुत सूट करता है। लोगों को निशब्द में अमिताभ का किरदार तो खूब पसंद आया, लेकिन कहानी नहीं जमी। रामगोपाल वर्मा की आग में बब्बन सिंह लोगों की उम्मीदन को पूरा मिट्टी में मिलाए दिए। लोग कहते थे कि रामगोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन की दुकान बंद करा देने की सुपारी ले ली है या फिर अमिताभ बच्चन उनके इतना वशीभूत हैं कि कहानी वगैरह पर ध्यान ही नहीं है उनका। साल 2007 में बड़े बच्चन और छोटे बच्चन शूटआउट एट लोखंडवाला और झूम बराबर झूम में पैकेज डील करते दिखे। अमिताभ बच्चन को लेकर बनी विधु विनोद चोपड़ा के करियर की सबसे कमजोर फिल्म एकलव्य भी इसी साल रिलीज हुई।
मेरे हिसाब से चीनी कम हिंदी सिनेमा की उन चंद अंगुलियों पर गिनी जा सकने वाली फिल्मों में से हैं जिनमें किसी निर्देशक ने प्रेम की वह परिभाषा दिखाने की कोशिश की, जिसे अंग्रेजी में सोल मेट्स कहते हैं। राज बब्बर और अनीता राज की फिल्म प्रेम गीत में जगजीत सिंह को ये गाते सुनकर और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है, 'ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन...!' तो निशब्द में जहां रामगोपाल वर्मा चूके थे, पहली बार फिल्म बनाने जा रहे निर्देशक आर बालाकृष्णन यानी बाल्की ने उसी को अपने तरकश का अचूक बाण बना लिया। सव्यसाची तो खैर अमिताभ बच्चन शुरू से ही रहे हैं। अर्जुन के 12 नामों में से एक नाम है सव्यसाची, जिसका मतलब होता है वह धनुर्धर जो दोनों हाथों से तीर का संधान कर सके। फिल्म चीनी कम में अमिताभ बच्चन ने अपने अभिनय का सबसे सरल रूप दिखाया है। आमतौर पर अमिताभ बच्चन अभिनय करते वक्त बहुत संजीदा रहते हैं, लेकिन बाल्की और अमिताभ के बीच यहां राणा प्रताप और चेतक जैसी ट्यूनिंग दिखी। वो लाइन याद है ना आपको, राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था।
राणा और चेतक वाली इस ट्यूनिंग के कम से कम दो किस्से इस फिल्म की शूटिंग में शामिल रहे लोगों में बहुत मशहूर रहे हैं। पहला तो वो सीन जिसमें लंदन में अपना रेस्तरां स्पाइस 6 चलाने वाले बुद्धदेव गुप्ता को गुस्सा होना था। बाल्की ने अमिताभ को सीन समझाया और जैसे ही एक्शन बोला, अमिताभ अपने एंग्री यंग मैन वाले मूड में आ गए। लेकिन बाल्की ने ओके नहीं बोला। अमिताभ झुंझलाए भी थोड़ा सा कि ये क्या बात हुई भाई। बाल्की अमिताभ के पास गए। उनके कान में कुछ फुसफुसाए। और जैसे ही कैमरा रोल हुआ तो अमिताभ के चेहरे के भाव बदल चुके थे। पिछले टेक के संवादों का गुस्सा अब उनके चेहरे की तमतमाहट में दिख रहा था। सिर्फ आंखों से जो अमिताभ ने इस सीन में कह दिया, वह सिर्फ देखने की बात है।
फिल्म का दूसरा किस्सा थोड़ा संजीदा किस्म का है। हुआ यूं कि फिल्म की शूटिंग चल रही थी और खबर आई कि ऋषिकेश मुखर्जी नहीं रहे। बिमल रॉय के नवरत्नों में शामिल रहे ऋषिकेश मुखर्जी का अमिताभ बच्चन के करियर में बड़ा योगदान रहा है और वह उनकी काफी इज्जत भी करते रहे। खबर सुनकर अमिताभ की आंखें नम हो आईं। ये जब हो रहा था तो फिल्म चीनी कम का शॉट लगा हुआ था। सौ सवा सौ लोग मौके पर मौजूद थे और अमिताभ को याद आया, शो मस्ट गो ऑन। उन्होंने बाल्की को दम भर रुकने को इशारा किया। एक कोने में गए। अपनी नम आंखों को पोछा। चार पांच लंबी लंबी सांसें लीं और खुद को व्यवस्थित कर लिया। इसके बाद वन टेक में उन्होंने अगला शॉट दिया। शॉट खत्म हुआ तो उनके भीतर का सारा दुख सैलाब बनकर बाहर आ गया।
फिल्म चीनी कम के बारे में तबू से बात करो तो वह बिल्कुल चहक सी उठती हैं। उनकी आवाज वैसे ही बदल जाती है जैसे किसी बच्चे को उसकी मनचाही चीज मिल गई हो। तबू अमिताभ बच्चन के साथ 1999 के वर्ल्ड टूर पर गईं थीं और तब से उनकी दिली ख्वाहिश रही कि वह अमिताभ बच्चन के साथ काम करें। वह बताती हैं, 'फिल्म चीनी कम बतौर अभिनेत्री तो मेरे दिल के काफी करीब है ही, बतौर इंसान भी मैंने इस फिल्म की शूटिंग के दौरान जो लम्हे जिए। वे मेरी अनमोल धरोहर हैं।' फिल्म चीनी कम में तबू ने नीना वर्मा का किरदार किया है जिसे अपने से 30 साल बड़े बुद्धदेव गुप्ता से प्यार हो जाता है। दोनों शादी करना चाहते हैं, ये जानते हुए भी कि नीना के पिता की उम्र बुद्धदेव गुप्ता से छह साल कम है। अपनी से बड़ी उम्र के होने वाले दामाद को देख नीना के पिता बने परेश रावल का जो रिएक्शन होता है, वह फिल्म का बहुत ही सहज, सरल और होठों को 180 अंश में फैला देने वाला सीन बन जाता है। फिल्म चीनी कम हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में से एक बनी तो उसका पूरा क्रेडिट इसके निर्देशक आर बाल्की को जाता है। अमिताभ के करिश्मे, तबू के चुलबुलेपन, परेश रावल की शहतीरों और जोहरा सहगल की तकरीरों को मिलाकर ये जो भी कुछ परदे पर बना था, वह सब बहुत अच्छा था।