वेब सीरीज रिव्यू: बेताल
ज्यादा दिन नहीं हुए जब रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के दफ्तर से बुलावा आया उन दिनों रिलीज होने जा रही फिल्म ‘हर किसी के हिस्से कामयाब’ के निर्माता मनीष मूंदड़ा और कंपनी के सीईओ गौरव वर्मा का इंटरव्यू करने का। साढ़े तीन बजे के तय समय से पांच मिनट पहले मैं पहुंच गया। उसके बाद गेट से लेकर इंटरव्यू के लिए तय मंजिल तक पहुंचने में जो रायता फैलता दिखा, उससे अंदाजा हो गया कि रेड चिलीज अब वो रेड चिलीज नहीं रहा, जिसमें पहले सब कुछ चुस्त चौकस हुआ करता था। परखी लगाके गेहूं परखने की सीख शहर में भी काम करती है। किसी दफ्तर के गेट से लेकर सीईओ तक पहुंचने में आपके सामने जो कुछ होता है, वही कंपनी का भविष्य होता है।
Betaal Review: शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस से ज्यादा नेटफ्लिक्स के लिए खतरे की घंटी बना 'बेताल'
छत्तीसगढ़ मैंने बहुत ही तबीयत से घूमा है। बिलासपुर से लेकर अबूझमाड और आगे बस्तर की लोहे की खदानों तक। इस सीरीज के बनाने वाले शायद रायपुर तक भी न गए हों। बाहुबली की म्लेच्छ सेना जैसी कोई बोली खोज लेना भर इस सीरीज को बनाने वालों का पूरा प्रसाद है। कहानी एक सुरंग की है जो किसी हाईवे के रास्ते में पड़ रही है। इत्ती चौड़ी भी नहीं कि उसके भीतर से हाईवे गुजर जाए और जब इसके अंदर से रास्ता निकलना ही नहीं है तो फिर खोलने की जरूरत क्या है? इलाके के आदिवासी सुरंग ताके बैठे हैं। सुरंग के भीतर सन 1857 की फौज की जिंदा लाशें (जॉम्बीज) हैं।
विनीत बहुत ही सधे हुए और समर्पित अभिनेता हैं। ये वेबसीरीज बनाने वालों की दिक्कत है कि वे उनके लायक किरदार नहीं गढ़ रहे। आहना कुमारा कहीं से अपने किरदार में ढल नहीं पातीं। वह सही कहती हैं कि ये किरदार तो कोई भी पुरुष कलाकार कर सकता था, फिर एक महिला किरदार यहां बनाने की जरूरत क्या थी? सुचित्रा पिल्लै के लिए यहां करने को कुछ है नहीं सिवाय बालों के सफेद काले होने के। जीतेंद्र जोशी का किरदार भी ढंग से लिखा जाता तो मामला बन सकता था।