सिनेमा के जो सबक डिजनी, वार्नर ब्रदर्स और फॉक्स स्टार जैसी फिल्म निर्माण कंपनियों ने अब से 20 साल पहले सीख लिए थे, उन्हें सीखने में वॉयकॉम 18 अब तक लड़खड़ा रही है। भारत जोशीला देश है। इसके दर्शक अपने नायक को कर्म करते देखना चाहते हैं। फल की चिंता इन्होंने कभी की नहीं। किसी तरह फिल्म के नाम में रॉ लाने के लिए रोमियो अकबर वॉल्टर का जो जुगाड़ फिल्म के मेकर्स ने लगाया, उसी जुगाड़ ने फिल्म की ब्रांडिंग को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। फिल्म बनी भी अच्छी नहीं है।
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Movie Review: रोमियो, अकबर, वॉल्टर के लिए बोझ बना ताबीज से तिरंगे का सफर
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: विजय जैन
Updated Fri, 05 Apr 2019 11:43 AM IST
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john abraham
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मूवी रिव्यू: रोमियो अकबर वॉल्टर
सिनेमा के जो सबक डिजनी, वार्नर ब्रदर्स और फॉक्स स्टार जैसी फिल्म निर्माण कंपनियों ने अब से 20 साल पहले सीख लिए थे, उन्हें सीखने में वॉयकॉम 18 अब तक लड़खड़ा रही है। भारत जोशीला देश है। इसके दर्शक अपने नायक को कर्म करते देखना चाहते हैं। फल की चिंता इन्होंने कभी की नहीं। किसी तरह फिल्म के नाम में रॉ लाने के लिए रोमियो अकबर वॉल्टर का जो जुगाड़ फिल्म के मेकर्स ने लगाया, उसी जुगाड़ ने फिल्म की ब्रांडिंग को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। फिल्म बनी भी अच्छी नहीं है।
सिनेमा के जो सबक डिजनी, वार्नर ब्रदर्स और फॉक्स स्टार जैसी फिल्म निर्माण कंपनियों ने अब से 20 साल पहले सीख लिए थे, उन्हें सीखने में वॉयकॉम 18 अब तक लड़खड़ा रही है। भारत जोशीला देश है। इसके दर्शक अपने नायक को कर्म करते देखना चाहते हैं। फल की चिंता इन्होंने कभी की नहीं। किसी तरह फिल्म के नाम में रॉ लाने के लिए रोमियो अकबर वॉल्टर का जो जुगाड़ फिल्म के मेकर्स ने लगाया, उसी जुगाड़ ने फिल्म की ब्रांडिंग को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। फिल्म बनी भी अच्छी नहीं है।
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John Abraham
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कोई 20 साल पहले पाकिस्तान की मुल्तान जेल में नबी अहमद शाकिर नाम के एक शख्स की मौत हुई। ये शख्स पाकिस्तानी सेना में मेजर था। दावा किया गया कि इसका असली नाम रवींद्र कौशिक है और वह भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ में काम करता था। रॉ ने कभी ये बात मानी नहीं और रवींद्र कौशिक को तिरंगे में लिपटकर अपने वतन लौटने का सम्मान भी नहीं मिल सका। ये सच्ची कहानी भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 1971 के युद्ध के बाद की है।
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रोमियो अली फिल्म में अकबर बनकर 1971 के युद्ध से पहले पाकिस्तान पहुंचता है। वह पहले से मुस्लिम है सो रवींद्र कौशिक की तरह उसे मुस्लिम बनने के संस्कारों से नहीं गुजरना पड़ता। फिल्म पहली चोट यहीं खाती है। रोमियो अली पाकिस्तान में हथियारों की तस्करी करने वाले शख्स का भरोसा जीतता है और सारी जानकारियां हिंदुस्तान भेजता रहता है। उसका राज खुलता है रॉ की ही दूसरी एजेंट श्रद्धा शर्मा के पाकिस्तान पहुंचने से। फिर इसके बाद जासूस की रगों में बहते देशभक्ति के खून में इश्क की मिलावट होती है हालांकि भांडा फूटने के बाद भी वह अपने मिशन का अंजाम देने में कामयाब रहता है।
Romeo Akbar Walter
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फिल्म रोमियो अकबर वॉल्टर की सबसे कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा। फिल्म रहस्य का रोमांच बांधने की कोशिश बैकग्राउंड म्यूजिक से करती है और कई जगह कामयाब भी होती है। लेकिन, हीरो अगर क्लाइमेक्स में हीरोगिरी न करे तो काहे का हीरो। वह दिमाग से खेलता है और ये खेल भी बाद में दूसरे किरदार को बोलकर समझाना होता है, बस यहीं फिल्म गोता लगा जाती है। सिनेमैटोग्राफी उम्दा है। प्रोडक्शन डिजाइन फर्स्ट क्लास है। लेकिन, फिल्म की पटकथा इन सब पर कलंक लगा देती है।
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John Abraham
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अभिनय के लिहाज से देखा जाए तो जॉन अब्राहम की ये चंद चर्चित फिल्मों में शुमार रहेगी। मद्रास कैफे से बाद फिर एक बार जॉन ने संतुलित रहते हुए चेहरे के भावों का खेल किया है। सिकंदर खेर भी अपने करियर के अब तक के सबसे बेहतरीन रोल में सौ फीसदी अंक पाए हैं। फिल्म के साथी कलाकारों ने फिल्म को बांधे रखने में जी जान लगा दी।
जैकी श्रॉफ, रघुवीर यादव, मुश्ताक काक और अनिल जॉर्ज सब जमते हैं। हां, सुचित्रा कृष्णमूर्ति का किरदार चमक नहीं पाता है। फिल्म में मौनी रॉय भी हैं और इंटरवल तक ठीक ठाक चलती फिल्म उनके कहानी में घुसते ही फैल जाती है। मां को आंचल छोड़ आए जासूस का माशूक के पहलू में दुबकना उसके किरदार की ऊंचाई को खत्म कर देता है।
जैकी श्रॉफ, रघुवीर यादव, मुश्ताक काक और अनिल जॉर्ज सब जमते हैं। हां, सुचित्रा कृष्णमूर्ति का किरदार चमक नहीं पाता है। फिल्म में मौनी रॉय भी हैं और इंटरवल तक ठीक ठाक चलती फिल्म उनके कहानी में घुसते ही फैल जाती है। मां को आंचल छोड़ आए जासूस का माशूक के पहलू में दुबकना उसके किरदार की ऊंचाई को खत्म कर देता है।