किसी गाने की शूटिंग से पहले इसके संगीत के बीट्स गिनने और इन बीट्स की संख्या के हिसाब से कलाकारों के स्टेप्स तय करने का काम निर्देशक की टीम करती है। कलंक के गाने तबाह हो गए में दिखता है कि पूरा काम अभिषेक ने सरोज खान और रेमो को दे दिया है और खुद सामने कुर्सी लगाकर ऐसे जमे रहे कि कैमरे की एक्सिस तक पूरे गाने में बदलकर हॉल के दूसरी तरफ नहीं जाती।
हो सकता है कि तबाह हो गए ये पूरा गाना ही क्रोमा पर शूट किया गया और स्पेशल इफेक्ट्स टीम को ध्यान ही नहीं रहा कि किसी कोठे की चार दीवारें होती हैं तो दूसरी तरफ का हिस्सा दिखाए बिना कोठा जमता नहीं है। बिनोद प्रधान जैसे गुणी सिनेमैटोग्राफर को यहां अपना ज्ञान साझा करना चाहिए था, लेकिन बुजुर्गों की सियासत से सिनेमा तक अब सुनता कौन है?
सरोज खान ने गाने के आखिर में माधुरी दीक्षित से सरगम पर जुगलबंदी कराई है लेकिन इससे पहले के सौ सेकेंड में 20 से ऊपर कट्स देख चुके दर्शक को समझ नहीं आता कि गाना विरह का है या फिर यूं ही कोई गाना बस बना दिया गया है। कहीं दर्द जैसा तो कुछ दिखता नहीं और न ही मार डाला जैसा कोई क्षोभ माधुरी के चेहरे पर नजर आता है।
कलंक कहीं ठग्स ऑफ हिंदोस्तां जैसी नकली फिल्म तो नहीं निकलेगी, अब संशय इस बात का भी होने लगा है। इतनी सारी बातों के बीच श्रेया घोषाल की तारीफ तो रह ही गई, गाना वह सुंदर गाती हैं। यहां भी गाया सुंदर ही है। बस अमिताभ भट्टाचार्य की लिखावट औसत से है और प्रीतम का संगीत उससे भी नीचे। समझ आता है कि संजय लीला भंसाली को आखिर क्यों अपनी फिल्मों के संगीत का जिम्मा भी खुद ही संभालना पड़ता है।