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Sunflower Review: सुनील ग्रोवर की अदाकारी का अलहदा अंदाज लेकिन विकास बहल ने डुबोई सीरीज की लुटिया
लेखक व सृजक: विकास बहल
कलाकार: सुनील ग्रोवर, मुकुल चड्ढा, राधा भट्ट, आशीष विद्यार्थी, रणवीर शौरी, गिरीश कुलकर्णी आदि।
निर्देशक: विकास बहल, राहुल सेनगुप्ता
ओटीटी: जी5
रेटिंग: **
जी5 देसी ओटीटी है। भारतीय भाषाओं की कहानियां दिखाना इसकी यूएसपी रही है। ऐसी कहानियां जिनमें उत्तर से लेकर दक्षिण तक के तमाम रंग देश के दिखते रहे। फिर इस पर सलमान खान की फिल्म ‘राधे: योर मोस्ट वांटेड भाई’ आई। फिल्म कम लोगों को ही पसंद आई। जी5 की ब्रांडिंग को लगा ये पहला झटका था। बची खुची कसर ‘फ्रेंड्स रीयूनियन’ ने पूरी कर दी। इस कार्यक्रम को देश में तमाम लोगों ने देखा भी लेकिन इस कार्यक्रम ने बहुत मेहनत से बनी भारतीय भाषाओं की कहानियां कहने वाली ओटीटी की जी5 की ब्रांडिंग को तार-तार कर दिया। असर, रिलायंस एंटरटनेमेंट की वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ पर दिख रहा है। एक तो ये सीरीज बनी भी बेढंगी है, दूसरे इसके ट्रेलर ने इसे क्राइम थ्रिलर जैसा प्रचारित करके भी इसका बड़ा नुकसान किया है। वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ गलत ब्रांडिंग और अधकचरी मार्केटिंग का शिकार हुई वेबसीरीज है। जी5 को इसके कथानक के हिसाब से इसे प्रचारित करना चाहिए था। अब हुआ ये कि दर्शक इसे देखने बैठे हैं सस्पेंस थ्रिलर समझकर और सीरीज का पहला सीन ही कत्ल का है जिसमें नारियल पानी में जहर मिलाता एक दंपती नजर आता है।
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सनफ्लॉवर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कहानी का दूसरा ट्रैक जो सीरीज को बेहतर पहचान दे सकता था, वह है मेट्रो शहरों की हाउसिंग सोसाइटीज में समाज के उन लोगों के साथ होने वाला भेदभाव, जो या तो अकेले हैं, लिवइन में हैं या किसी ऐसी इंडस्ट्री में काम करते हैं जिसे पिछली पीढ़ी इज्जत से नहीं देखती। इन दोनों कहानियों के बीच है दफ्तर की एक कहानी जिसका नायक सोनू सिंह है। अंदर से कुछ न कुछ ‘महान’ करने की सोचने वाला लेकिन बाहर से फुस्स पटाखा। आठ एपिसोड की वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट है इसमें सुनील ग्रोवर का किरदार। सुनील ग्रोवर ने कॉमेडी के कोष्ठक से निकलकर ड्राम की तरफ बढ़ने का जो कदम फिल्म ‘भारत’ और वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ में बढ़ाया है, उसको देखते हुए ये सीरीज उनके लिए एक बड़ी छलांग साबित हो सकती थी लेकिन इस सीरीज की सबसे कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा और इसके संवाद।
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सनफ्लॉवर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुनील ग्रोवर की कॉमेडी वाली छवि को कैश कराने के लिए उनसे जबरदस्ती ऐसे संवाद बुलवाने की कोशिश की गई है जिससे दर्शकों को हंसी आए। सुनील ग्रोवर की कॉमेडी का अंदाज दूसरा रहा है। वह बुद्धू किरदार में नहीं जमेंगे। ऐसा किरदार जो सब इंस्पेक्टर की परिभाषा सबके सामने करने लग जाए और अपनी ही हंसी उड़वाए, वह सुनील पर जमेगा नहीं। फिर भी सुनील ग्रोवर ने अपनी तरफ से सीरीज को बचाने की कोशिश पूरी की है। वह इतना तो साबित कर ही देते हैं कि अगर उनको किरदार अच्छे मिलें और निर्देशक उनकी काबिलियत का सही उपयोग कर सकें तो वह बड़े किरदार भी कर सकते हैं।
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सनफ्लॉवर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वैसे वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ के बाकी किरदारों को देखा जाए तो पूरी सीरीज का एक भी ऐसा किरदार ऐसा नहीं है जिसके साथ जुड़कर दर्शक पूरी कहानी देखने का आनंद उठा सके और ये क्रम तोड़ने में सीरीज के बैक ग्राउंड म्यूजिक और इसके ओपनिंग क्रेडिट्स का भी बड़ा हाथ है। हर एपिसोड से पहले वहीं भौंरा,वही सूरजमुखी देखना बोर करता है। एक फिक्स पैटर्न पर बजता सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक सीरीज की दूसरी सबसे कमजोर कड़ी है। वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ तकनीकी रूप से कमजोर सीरीज है। सिनेमैटोग्राफी में लाइटिंग का कोई पैटर्न पूरी सीरीज में नहीं दिखता और इसकी एडीटिंग में कुछ खास मेहनत की गई दिखती नहीं है।
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सनफ्लॉवर
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कलाकारों में सुनील ग्रोवर की तरह ही किसी दूसरे किरदार की पृष्ठभूमि का खुलासा करने में विकास बहल ने खास दिलचस्पी दिखाई नहीं हैं। मुकेश चड्ढा का किरदार एक समय के बाद न सिर्फ बोर करता है बल्कि उसके परदे पर आते ही उकताहट होने लगती है। राधा भट्ट के साथ उनके दैहिक संबंधों वाले दृश्य भी बहुत खराब तरीके से शूट किए गए हैं। एक अध्यापक का घर के अंदर का ऐसा चरित्र बनाने के अलावा आशीष विद्यार्थी का निभाया दिलीप अय्यर का किरदार भी ऐसा ही है। उसके जरिए विकास बहल बहुत कुछ कहलाना चाहते हैं, लेकिन दृश्य श्रव्य माध्यम में कह कर बताने की बजाय करके दिखाने को हमेशा बेहतर माना जाता है। सीरीज को बचाने की रणवीर शौरी और गिरीश कुलकर्णी ने भी कोशिश पूरी की है, लेकिन उनके परदे से जाते ही सीरीज को बोरियत से बचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो जाता है।
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