देश में कोरोना के मामूली और औसत लक्षणों वाले मरीजों के इलाज के लिए फेविपिराविर दवा को मंजूरी मिल गई है। दवा कंपनी ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स ने शनिवार को इस दवा की पेशकश की और बताया कि जिन मरीजों को मधुमेह और दिल की बीमारी है, वो डॉक्टर की सलाह से इस दवा का सेवन कर सकते हैं।
Corona Vaccine: कोरोना के इलाज के लिए दवा तैयार, 103 रुपये की एक गोली
वैक्सीन पर डब्ल्यूएचओ का रुख
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया में कई देश कोरोना वैक्सीन को लेकर काम कर रहे हैं, इसमें से कई देश ह्यूमन ट्रायल यानि कि इंसानी शरीर पर प्रयोग करने वाली स्टेज पर आ गए हैं तो कुछ देश अभी वैक्सीन बनाने की शुरुआती स्टेज पर ही हैं। डब्ल्यूएचओ की शीर्ष शोधकर्ता डॉ सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि कि संगठन को उम्मीद है कि इस साल के अंत यानि दिसंबर तक वैक्सीन तैयार हो सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि अभी दुनिया में कोरोना की 100 से ज्यादा वैक्सीन पर शोध चल रहा है। भारत समेत अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली और ब्रिटेन जैसे देश कोविड-19 की वैक्सीन बनाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। इजराइल और नीदरलैंड के वैज्ञानिक एंटीबॉडी आइसोलेट करने में कामयाब हुए हैं।
ब्रिटेन में वैक्सीन का स्तर
ब्रिटेन chAdOx1 nCov-19 नाम की वैक्सीन पर काम कर रहा है लेकिन इस वैक्सीन की तैयारी भारत में ही होगी। विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय इस वैक्सीन पर शोध कर रहा है कि मर्स के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वैक्सीन क्या कोविड-19 वायरस पर भी उतना असर दिखाएगी।
यह वैक्सीन शरीर में वायरस की स्पाइक प्रोटीन को पहचानने में मदद करता है, शरीर में संक्रमण फैलाने के लिए कोरोना वायरस इसी स्पाइक प्रोटीन की मदद से कोशिकाओं को चपेट में लेता है। इस वैक्सीन का इस्तेमाल मर्स के उपचार के लिए किया जाता रहा है और अभी यह क्लीनिकल ट्रायल पर है।
इस वैक्सीन का ट्रायल 800 लोगों पर चल रहा है, वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर वैक्सीन का ट्रायल सफल रहा तो यह वैक्सीन अक्टूबर से बाजार में मिलनी शुरू हो जाएगी।
चीन की पाइकोवैक वैक्सीन
चीन के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि चीन की पाइकोवैक वैक्सीन बंदरों पर प्रभावी रही है। पाइकोवैक वैक्सीन शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने पर जोर देती है और एंटीबॉ़डी वायरस को खत्म करने लगती है। चीन के वैज्ञानिकों ने बंदरों की एक खास प्रजाति पर वैक्सीन का ट्रायल किया।
शोधकर्ताओं ने बंदरों में यह वैक्सीन लगाई और तीन हफ्ते बाद बंदरों में कोरोना वायरस इंजेक्ट किया गया। एक हफ्ते बाद कोरोना वैक्सीन वाले बंदरों में वायरस नहीं देखा गया जबकि बंदर न्यूमोनिया से ग्रसित थे। चीन के मुताबिक यह वैक्सीन अभी पहले चरण पर है और बंदरों पर ट्रायल सफल होने के बाद इसे इंसानों पर ट्रायल किया जाएगा।
जर्मनी की BNT162 वैक्सीन
जर्मनी और अमेरिका की दवा कंपनी मिलकर इस वैक्सीन को विकसित करने में जुटी हैं। इस वैक्सीन में एमआरएनए यानि कि जेनेटिक मैसेंजर आरएनए का इस्तेमाल किया गया है। जेनेटिक कोड एमआरएनए शरीर को प्रोटीन बनाने का निर्देश देता है ताकि वायरस के प्रोटीन की नक्ल की जा सके और इम्यून रिस्पॉन्स पैदा हो।
यह वैक्सीन अभी क्लीनिकल ट्रायल पर चल रही है। 12 स्वतंत्र लोगों पर इसका अध्ययन किया जा रहा है और वहीं अगले चरण में 18-55 वर्ष की आयु वाले लोगों के बीच वैक्सीन की डोज को बढ़ाकर इस पर अध्ययन किया जाएगा। जर्मनी ने इस वैक्सीन के अक्तूबर आने की उम्मीद जताई है।

कमेंट
कमेंट X