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Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट के चार फैसले, जो भारत में बहुत कुछ बदल सकते हैं

Thu, 07 Nov 2019 01:20 PM IST
बीबीसी Published by: योगेश साहू Updated Thu, 07 Nov 2019 01:20 PM IST
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Four Supreme Court decisions, which can change a lot in India
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

भारतीय सुप्रीम कोर्ट अगले कुछ दिनों में कुछ ऐसे अहम फैसले सुनाएगा जिससे देश के मौजूदा हालात में काफी कुछ बदल सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं और 18 नवंबर को जस्टिस बोबडे उनकी जगह लेंगे।



ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि 17 नवंबर से पहले कुछ बड़े मामलों में फैसला आ जाएगा। इनमें जिस मामले पर फैसले पर सबसे ज्यादा बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है वो है अयोध्या का बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद। सुप्रीम कोर्ट जब इस पर फैसला सुनाएगा तो ये निश्चित रूप से ऐतिहासिक होगा।

उम्मीद जताई जा रही है कि पांच जजों वाली संवैधानिक बेंच इस मामले पर चार से पंद्रह नवंबर के बीच फैसला सुनाएगी। बेंच की अगुवाई सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे हैं। उनके अलावा जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

भारत सरकार के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन परासरन का कहना है कि अयोध्या मामला बेहद संवेदनशील है इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी बहुत सावधानी बरतनी होगी।

परासरन ने बीबीसी के सहयोगी और वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहन्ती से कहा, "अयोध्या मामला राजनीतिक और धार्मिक, दोनों मायनों में बहुत संवेदनशील है। यह चार दशक से भी पुराना विवाद है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट चाहे जो फैसला सुनाए, सभी समुदायों में शांति का माहौल बनाए रखना होगा।"

जानी-मानी वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा भी परासरन से सहमति जताती हैं। उन्होंने कहा कि अदालत का फैसला चाहे जो जो, हमें इसका स्वागत करना होगा और किसी भी कीमत पर कानून-व्यवस्था की स्थिति संभाले रखनी होगी। अयोध्या मामले के अलावा, कुछ दूसरे महत्वपूर्म मामले भी हैं, जिन पर जस्टिस रंजन गोगोई अपने दो हफ्तों में फैसला सुनाएंगे। इनमें रफाल डील और सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश जैसे मामले शामिल हैं।

Four Supreme Court decisions, which can change a lot in India
Rafale - फोटो : ANI
राफेल मामला

सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच राफेल सौदा मामले पर फैसला सुनने वाली है। बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ हैं। राफेल डील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 को दिए अपने फैसले में भारत की केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे दी थी।

हालांकि इस फैसले की समीक्षा के लिए अदालत में कई याचिकाएं दायर की गईं और 10 मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट के भारत के सौदे को चुनौती देने वाली जिन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की, उनमें पूर्व मंत्री अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की याचिकाएं शामिल थीं। सभी याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उसके पिछले साल के फैसले की समीक्षा करने की अपील की थी।

Four Supreme Court decisions, which can change a lot in India
सबरीमाला मंदिर
सबरीमला मंदिर मामला

अगले दो हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट भारत के दक्षिण भारतीय राज्य केरल स्थित सबरीमला अय्यपा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर भी अपना आखिरी फैसला सुनाएगा। वैसे तो सर्वोच्च अदालत ने 28 सितंबर, 2018 को अपने फैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश का हक दिया था।

हालांकि इस फैसले की समीक्षा के लिए 60 याचिकाएं फिर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली बेंच ने 6 फरवरी, 2019 को इन सभी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस बेंच की अगुवाई भी जस्टिस रंजन गोगोई ने की।

28 सितंबर 2018 को सीजेआई रंजन गोगोई की अगुवाई में जस्टिस आर। फली नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नाखुश कई संस्थाओं और समूहों ने इसकी समीक्षा के लिए याचिकाएं दायर कीं। फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने वालों में नायर सर्विस सोसायटी (NSS) और मंदिर के तंत्री (पुजारी) भी शामिल हैं।

सबरीमला में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर भारत में काफी लंबी-चौड़ी बहस हुई है। मासिक धर्म से गुजरने वाली महिलाओं को मंदिर में न जाने दिए जाने को महिलावादी और प्रगतिशील संगठनों ने महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन बताया है।

वहीं, कई धार्मिक संगठनों की दलील है कि चूंकि अयप्पा ब्रह्मचारी माने जाते हैं, इसलिए 10-50 वर्ष की महिलाओं को उनके मंदिर में जाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

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मुख्य न्यायाधीश कार्यालय RTI के दायरे में आता है?

अगले दो हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच यह फैसला भी सुनाएगी कि क्या भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई (सूचना के अधिकार) के दायरे में आता है या नहीं। इस संवैधानिक बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एनवी रामन्ना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना हैं। बेंच की अगुवाई जस्टिस गोगोई कर रहे हैं।

सूचना अधिकार कार्यकर्ता कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने सीजेआई ऑफिस को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए याचिका दायर की थी। सुभाष चंद्र अग्रवाल का पक्ष रखने वाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि अदालत में सही लोगों की नियुक्ति के लिए जानकारियां सार्वजनिक करना सबसे अच्छा तरीका है।

प्रशांत भूषण ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति और ट्रांसफर की प्रक्रिया रहस्यमय होती है। इसके बारे सिर्फ मुट्ठी भर लोगों को ही पता होता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया है लेकिन जब अपने यहां पारदर्शिता की बात आती है तो अदालत का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहता।"

प्रशांत भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से लेकर तबादले जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिनमें पारदर्शिता की सख्त जरूरत है और इसके लिए सीजेआई कार्यालय को आरटीआई एक्ट के दायरे में आना होगा।

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