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बर्थ-डे स्पेशल: जब 1971 में 'आयरन लेडी' इंदिरा ने पाक को घुटनों पर था टिकाया
टीम डिजिटल/ अमर उजाला
Updated Sun, 19 Nov 2017 10:30 AM IST
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इंदिरा गांधी
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आयरन लेडी इंदिरा गांधी अपने कड़े तेवर और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने में माहिर थीं। वह कब क्या फैसला ले लें किसी को नहीं पता होता था। उनकी शख्सियत कुछ ऐसी है कि आज भी लोग उनके उदाहरण देते हैं। लोग तो यहां तक कहते हैं कि इंदिरा के जाने के बाद भारतीय राजनीति में कोई ऐसा नेता नहीं हुआ जो उनकी भरपाई कर सके।
इंदिरा गांधी
साल 1971 ऐसा रहा जिसका जिक्र कर भारत हमेशा पाकिस्तान के सामने अपनी चौड़ी छाती ठोक कर कहता है कि ये वो साल था जब हमने तुम्हें झुकने पर मजबूर कर दिया। आज हम आपको पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जन्मतिथि के अवसर पर उस कहानी से रूबरू करा रहे हैं जिसने उन्हें आयरन लेडी बना दिया। 1971 के उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सरकार और सेना अपने देश के लोगों पर बेतहाशा जुल्म कर रही थी। परिणाम ये था कि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने अपनी सेना के खिलाफ विद्रोह कर दिया था और जो इस विद्रोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे वो भारतीय सीमा में दाखिल हो रहे थे। असर ये था कि पूर्वी पाकिस्तान से लोग सीमा से सटे भारतीय राज्यों में शरण लेने आ रहे थे। एक आंकड़े के मुताबिक ये संख्या 10 लाख के करीब थी। इन शरणार्थियों के भारत में आने से इन राज्यों में अशांति का माहौल पैदा हो गया था।
भारत के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था। वो किसी ना किसी बहाने से चीन और अमेरिका की ताकत पर फूलते हुए भारत को गीदड़ धभकियां दे रहा था। 25 अप्रैल 1971 को तो इंदिरा ने थलसेनाध्यक्ष से यहां तक कह दिया था कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जंग करनी पड़े तो करें, उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है।
भारत के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था। वो किसी ना किसी बहाने से चीन और अमेरिका की ताकत पर फूलते हुए भारत को गीदड़ धभकियां दे रहा था। 25 अप्रैल 1971 को तो इंदिरा ने थलसेनाध्यक्ष से यहां तक कह दिया था कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जंग करनी पड़े तो करें, उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है।
इंदिरा गांधी
भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा पर दोतरफा दबाव पड़ रहा था। पहला तो ये कि कैसे वो सीमा से सटे भारतीय राज्यों में पैदा हो रही अशांति को खत्म करें। दूसरा ये कि किस तरह पाकिस्तान को उसी की भाषा में मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। इंदिरा गांधी ने ऐसे में पाकिस्तान को दोतरफा घेरने का प्लान बनाया जिसमें तय था कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से असहाय बनाना और दूसरी तरफ उस पर सैन्य कार्रवाई के जरिए सबक सिखाना। इसके लिए इंदिरा ने सेना को तैयार रहने का आदेश दे दिया था। वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उसे घेरना शुरू कर दिया था।
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इंदिरा गांधी
उस वक्त अमेरिका के तत्कालीन एनएसए हेनरी किसिंजर ने भारत का दौरा किया। किसिंजर से इंदिरा गांधी की बैठक को उनकी कूटनीतिक समझ के जरिए देखा जाता रहा है। किसिंजर भारत पर दबाव बनाने के लिए आए थे, जिससे कि भारत पाकिस्तान की हरकतों को नजरअंदाज कर दे। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री आवास पर किसिंजर के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग तय की और बैठक से पहले शाम को ही तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष जनरल मानिक शॉ को भी ब्रेकफास्ट पर आने के लिए कह दिया गया। हालांकि उन्हें किसिंजर के साथ मीटिंग के बारे में नहीं बताया गया था। मानिक शॉ को हिदायत दी गई थी कि वो ब्रेकफास्ट के लिए अपनी फुल यूनीफॉर्म में पहुंचे। थलसेनाध्यक्ष को ब्रेकफास्ट पर फुल यूनीफॉर्म में जाना समझ नहीं आया तो उन्होंने दोबारा पूछा कि क्या फुल यूनिफॉर्म में आना जरूरी है? उन्हें जवाब मिला हां।
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इंदिरा गांधी
जनरल मानिक शॉ ब्रेकफास्ट के लिए प्रधानमंत्री आवास पहुंचे तो उन्हें इंदिरा गांधी की कूटनीतिक समझ का अंदाजा हो गया। इंदिरा ने पूरी मीटिंग के दौरान किसिंजर को ये समझाने की कोशिश की कि वो पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे नरसंहार पर पाकिस्तान से कहे कि वो इस पर रोक लगाए। अमेरिका का कहना था कि ये उनका अंदरूनी मामला है तो इंदिरा ने साफ कर दिया कि इससे भारत के सीमावर्ती राज्यों की शांति भंग हो रही है। अगर अमेरिका पाकिस्तान को नहीं रोकता है तो भारत को कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ेगा। किसिंजर ने पूछा आप क्या चाहती हैं तो इंदिरा ने जनरल शॉ की तरफ इशारा कर कहा कि हमें इनकी मदद लेनी पड़ेगी। इस मीटिंग के जरिए भारत ने अमेरिका के सामने अपने तेवर साफ कर दिए थे। अमेरिका की नरमी देखते हुए भारत ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ के साथ एक सुरक्षा संबंधी समझौता भी कर लिया जिसमें तय हुआ था कि दोनों देश सुरक्षा के मसले पर एक-दूसरे की मदद करेंगे।