क्या भाजपा-शिवसेना के बीच दबदबा साबित करने की होड़
उपमुख्यमंत्री और शिवसेना अध्यक्ष एकनाथ शिंदे के कथित असंतोष की खबरों के बीच इस कार्यक्रम के लिए ठाणे में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए हैं। इसे राजनीतिक तौर पर शिवसेना के दबदबे को भाजपा की सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
शिंदे ने 'मुझे हल्के में न लें' जैसी चेतावनी भरी टिप्पणी की
उल्लेखनीय है कि बीते कुछ हफ्ते से भाजपा और शिवसेना के संबंधों में असहजता की अटकलें लग रही हैं। शुक्रवार को शिंदे ने 'मुझे हल्के में न लें' जैसी चेतावनी भरी टिप्पणी भी की थी। शिंदे से जब पूछा गया कि इस चेतावनी का लक्ष्य कौन है, तो उन्होंने कहा, वे अपना काम करते रहेंगे। जिन्हें समझना है वे संकेतों से ही समझ लें।
35 साल से लगा रहे जनता दरबार
यह भी रोचक है कि नाईक आम लोगों की समस्या दूर करने के लिए जनता दरबार लगाने का सिलसिला 1990 के दशक में ही शुरू कर चुके थे। फिलहाल महायुति सरकार में नाईक पालघर जिले के संरक्षक मंत्री हैं। उनकी और शिंदे की प्रतिद्वंद्विता बहुत पुरानी है। नाईक कभी शरद पवार के करीबी और एनसीपी के सदस्य थे। नवी मुंबई में उनका काफी दबदबा माना जाता है। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थामा।
मकसद केवल जनता का सामाधन
आगामी जनता दरबार से पहले भी नाइक तीन फरवरी को ठाणे जिले के नवी मुंबई में वाशी और 21 फरवरी को पालघर में जनता दरबार लगा चुके हैं। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि उनका एकमात्र मकसद आम लोगों की समस्याओं का समाधान करना है।
शिंदे के करीबी क्या मानते हैं
कथित टकराव की अटकलों पर शिंदे के करीबी और ठाणे से शिवसेना सांसद नरेश म्हास्के ने कहा, ऐसी बातों को तवज्जो देना ठीक नहीं है। जब शिंदे ठाणे आते हैं तो हजारों लोग अपना काम करवाने के लिए उनसे मिलने आते हैं। सांसद आनंदमठ (एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरू आनंद दिघे के कार्यालय का नाम) में बैठते हैं और 400-500 लोगों के जमघट में अधिकारियों को भी बुलाया जाता है। इसे भी दरबार कहा जाता है। लोगों औऱ राजनेताओं के मिलने का कई और अर्थ निकालना ठीक नहीं। म्हास्के ठाणे के पूर्व मेयर भी रह चुके हैं। म्हास्के के अलावा गोपाल नाईक के बेटे और पूर्व सांसद संजीव नाइक ने भी इस घटनाक्रम पर कहा, विरोधी निराधार फैला रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि महायुति एकजुट है।
बगावती तेवरों के कारण अहम है पूरा घटनाक्रम
यह घटनाक्रम इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि शिंदे के विद्रोह के बाद ही महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे नीत महाविकास अघाड़ी (कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी) सरकार गिरी थी। शिंदे की ही बगावत के कारण उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना दो फाड़ हुई। अधिकांश नेताओं / विधायकों / सांसदों का समर्थन होने के कारण शिवसेना एकनाथ शिंदे को मिली, जबकि उद्धव ठाकरे के पास दूसरे हिस्से- शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे / यूबीटी) गई। इस घटना के कुछ समय बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) भी दो खेमों में बंट गई। एक हिस्सा अजित पवार नीत एनसीपी है, दूसरे के प्रमुख उनके चाचा शरद पवार हैं, जिसे चुनाव आयोग ने अब एनसीपी (शरद चंद्र पवार) नाम दिया है।