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Bottle Feeding: बोतल से दूध पिलाना बच्चे के दिमाग पर डालता है असर? संक्रमण से लेकर माइक्रोप्लास्टिक का भी खतरा

Mon, 17 Aug 2026 02:57 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 17 Aug 2026 02:57 PM IST
सार

बच्चों को बोतल से दूध पिलाने को लेकर एक दावा काफी चर्चा में है कि इससे बच्चा बाद में मां को पहचानने में परेशानी कर सकता है। आइए जानते हैं कि बच्चों को बोतल से दूध पिलाने से क्या दुष्प्रभाव हो सकता है?

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Bottle-Feeding Affect Baby Bond With Mom know Breastfeeding or Bottle-Feeding which one is good
प्लास्टिक की बोतल से बच्चों को नुकसान - फोटो : Freepik.com

बचपन का पोषण जीवन का आधार होता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने और करीब छह महीने तक सिर्फ मां का दूध देने की सलाह देते हैं। छह महीने के बाद बच्चे को उचित ठोस आहार शुरू करके स्तनपान दो साल या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।



सभी माता-पिता के मन में अक्सर ये सवाल रहता है कि क्या छह महीने के बाद बच्चे को बोतल से दूध दिया जा सकता है। इसको लेकर कई सारे रिपोर्ट्स अलग-अलग दावे करते रहे हैं। वैसे तो सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चे को मां का दूध या शिशु फॉर्मूला दोनों ही बोतल से दिए जा सकते हैं। हालांकि परेशानी तब बढ़ सकती है जब बोतल साफ न हो, फॉर्मूला गलत मात्रा में तैयार किया जाए या बच्चा बोतल मुंह में लेकर सो जाए।

वहीं दूसरी ओर प्लास्टिक की बोतल से दूध पीने को लेकर अध्ययनों में इससे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक पहुंचने का खतरा बताया है।

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ब्रेस्ट फीडिंग (स्तनपान) के कई सारे फायदे - फोटो : Adobe Stock

मां का दूध बच्चे के लिए इतना खास क्यों है?

मां के दूध को शिशु के शुरुआती महीनों के लिए सबसे जरूरी और आदर्श आहार माना जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार इससे बच्चे के लिए जरूरी पानी, ऊर्जा और पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं। मां के दूध में एंटीबॉडी भी मौजूद होते हैं, जो बचपन की बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं। 
 

  • यूनिसेफ के विशेषज्ञ करीब छह महीने तक सिर्फ स्तनपान की सलाह देते हैं। 
  • इसका मतलब इस अवधि में बच्चे को मां के दूध के अलावा पानी या दूसरे खाद्य-पेय देने की जरूरत नहीं होती।
  •  छह महीने के बाद बच्चे की जरूरत के अनुसार सुरक्षित और पौष्टिक पूरक आहार शुरू किया जाता है और स्तनपान जारी रखने की सलाह दी जाती है।


मां के दूध का एक बड़ा फायदा संक्रमणों से जुड़ा है। स्तनपान करने वाले बच्चों में पेट और आंतों के संक्रमण का जोखिम कम होता है। 6 महीने तक मां के दूध के साथ बच्चे को पानी की भी जरूरत नहीं होती है, क्योंकि इससे पानी की पूर्ति भी आसानी हो जाती है।  

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मस्तिष्क की क्षमता पर असर - फोटो : Adobe Stock

बोलत से दूध का दिमागी सेहत पर असर

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं अगर आप अपने नवजात बच्चे को बोतल से दूध पिला रहे हैं तो सावधान हो जाइए इससे वह आपको पहचानने में देर कर सकता है। अध्ययन में पता चला है कि बोतल से दूध पीने वाले बच्चों का आईक्यू अपेक्षाकृत कम हो सकता है। झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में 100 शिशुओं पर किए गए अध्ययन में पता चला कि ऐसे बच्चे जल्दी-जल्दी बीमार भी पड़ते हैं और उनकी बौद्धिक क्षमता पर भी असर हो सकता है।
 

  • मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष और शोध दल के मार्गदर्शक डॉ. ओमशंकर चौरसिया बताते हैं कि इन 100 शिशुओं में 50 बच्चे स्तनपान करने वाले थे। वहीं 50 बोतल से दूध पीते थे। 
  • अध्ययन में पाया गया कि स्तनपान करने वाले शिशुओं की तुलना में बोतल से दूध पीने वाले बच्चों का आईक्यू लेवल आठ से 10 प्वाइंट तक कम हो सकता है। यही नहीं इससे बच्चे में मोटापा भी बढ़ सकता है।
  • हालांकि वैश्विक स्तर पर किए गए अन्य अध्ययनों में इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
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प्लास्टिक की बोतल से बच्चों को न पिलाएं दूध - फोटो : Freepik.com
बोतल के इस्तेमाल से संक्रमण का खतरा

शोध के मुताबिक यदि छह माह के बच्चे को स्तनपान के साथ बोतल से दूध पिलाया जाता है तो बच्चा 'निप्पल कंफ्यूजन' का शिकार होता है। इससे बच्चा भूखा रह जाता है और थोड़ी-थोड़ी देर में भूख लगने पर रोता है। फिर चिड़चिड़ा हो जाता है।
 
  • डॉ. ओमशंकर चौरसिया बताते हैं कि यदि मां स्वास्थ्य की वजह से स्तनपान कराने के योग्य नहीं है तो कटोरी-चम्मच से दूध पिलाएं। यदि बहुत जरूरी है तभी बोतल से दूध पिलाएं। बोतल को अच्छे से रोजाना पानी में डालकर साफ करें। बोतल की निप्पल को भी सही तरह से साफ करें। बोतल में उतना ही दूध भरे, जितना बच्चा पी सकता है। बचा हुआ दूध दोबारा नहीं पिलाएं।
  • समुचित साफ-सफाई नहीं से दूध की बोतल में बैक्टीरिया पनपते हैं, जो सीधे बच्चे के पेट में जाकर बीमारी का कारण बनते हैं। इससे शिशु ईकोलाई, साल्मोनेला, स्ट्रेप्टोकोकस आदि बैक्टीरिया की चपेट में आकर पेट दर्द, उल्टी-दस्त, आंतों में संक्रमण का शिकार हो सकता है।
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प्लास्टिक की बोतल के नुकसान - फोटो : Amarujala.com/AI

माइक्रोप्लास्टिक का खतरा

एक अन्य अध्ययन में स्वीडन स्थित कार्लस्टेड यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर कार्ल गुस्ताफ बोर्नहैग कहते हैं, प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। इससे न सिर्फ शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, बल्कि इससे क्रॉनिक बीमारियों का भी खतरा हो सकता है।
 

  • प्लास्टिक की चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बिस्फेनॉल एफ के कारण शरीर में कई प्रकार के ऐसे परिवर्तन आ सकते हैं जिससे बच्चों की दिमागी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • प्रोफेसर कार्ल गुस्ताफ कहते हैं, चाहे आप प्लास्टिक की बोतल को साफ करने के लिए गर्म पानी में डालते हैं या धूप रखते हैं, बढ़े हुए तापमान के कारण प्लास्टिक में मौजूद रसायन अंदर के पेय पदार्थ को दूषित कर सकते हैं।
  • जब प्लास्टिक की बोतल गर्मी के संपर्क में आती है, तो रसायन कमरे के तापमान या ठंडे पानी की तुलना में आपके पानी में तेजी से घुल सकते हैं।




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स्रोत और संदर्भ

DNA methylation at GRIN2B partially mediates the association between prenatal bisphenol F exposure and cognitive functions in 7-year-old children in the SELMA study


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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