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जान लीजिए मच्छरों को मारने का जादुई फॉर्मूला, पास नहीं फटकेंगे जीका वायरस और डेंगू
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 16 Oct 2018 10:01 AM IST
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मच्छर कई बीमारियों की जड़ माने जाते हैं।डेंगू, मलेरिया और जीका जैसी बीमारियों के वायरस की ये इंसानों तक होम डिलीवरी करते हैं। खुद मच्छरों के काटने से कोई बीमारी भले न हो लेकिन इनके शरीर में मौजूद बीमारियों के कीटाणु इनके काटने से ही इंसान में घुसते हैं। यही वजह है कि दुनिया में कई बीमारियों के खात्मे के लिए मच्छरों को मारने का नुस्खा आजमाया जाता है।इंसान की तमाम कोशिशों के बावजूद, डेंगू, मलेरिया और मच्छरों की वजह से होने वाली दूसरी बीमारियां बड़ी तेजी से फैल रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पचास सालों में डेंगू की बीमारी तीस गुना तक बढ़ गई है।1970 तक ये बीमारी सिर्फ 9 देशों में भयंकर तौर पर असर दिखाती थी। मगर आज डेंगू एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के सौ से ज़्यादा देशों में कई बार महामारी का रूप धर लेता है। पिछले कुछ सालों में जीका वायरस भी लैटिन अमरीकी और दूसरे देशों में फैलता दिख रहा है।
यही वजह है कि पिछले कई दशकों से मच्छरों के खात्मे के लिए तमाम नुस्खे आजमाए गए हैं जैसे कि पिछली सदी के मध्य तक डाइक्लोरो डाइफेनाइल ट्राइक्लोरोईथेन यानी डीडीटी नाम के केमिकल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था। इससे मच्छरों पर काबू पाने में काफी मदद मिली थी।
मच्छर दोबारा क्यों लौटे?
ब्राजील को इसी की मदद से 1958 में एडीज मच्छर मुक्त देश घोषित कर दिया गया था। इसके बाद डीडीटी के छिड़काव के नियमों में ढील दे दी गई। नतीजा ये हुआ कि 1970 के दशक से मच्छरों ने दोबारा ब्राजील में वापसी की। ये पड़ोसी देश वेनेज़ुएला से घुसपैठ करके आए थे। धीरे-धीरे ये मच्छर पूरे ब्राजील में फैल गए। मच्छर लौटे, तो तमाम बीमारियां भी लौट आईं। शहरीकरण की वजह से भी बीमारियों के फैलने की रफ़्तार तेज हुई।
इधर, वैज्ञानिकों ने दुनिया को डीडीटी के साइड इफेक्ट से आगाह करना शुरू किया। इससे बड़ी तादाद में परिंदे मर रहे थे। पता चला कि इसकी वजह से इंसानों में कैंसर भी हो रहा था। इसलिए तमाम देशों ने डीडीटी के इस्तेमाल पर 2004 में रोक लगा दी। अब मच्छरों से होने वाली बीमारियों से लड़ने के लिए एकदम ताजा-नया नुस्खा आजमाया जा रहा है।
मच्छर दोबारा क्यों लौटे?
ब्राजील को इसी की मदद से 1958 में एडीज मच्छर मुक्त देश घोषित कर दिया गया था। इसके बाद डीडीटी के छिड़काव के नियमों में ढील दे दी गई। नतीजा ये हुआ कि 1970 के दशक से मच्छरों ने दोबारा ब्राजील में वापसी की। ये पड़ोसी देश वेनेज़ुएला से घुसपैठ करके आए थे। धीरे-धीरे ये मच्छर पूरे ब्राजील में फैल गए। मच्छर लौटे, तो तमाम बीमारियां भी लौट आईं। शहरीकरण की वजह से भी बीमारियों के फैलने की रफ़्तार तेज हुई।
इधर, वैज्ञानिकों ने दुनिया को डीडीटी के साइड इफेक्ट से आगाह करना शुरू किया। इससे बड़ी तादाद में परिंदे मर रहे थे। पता चला कि इसकी वजह से इंसानों में कैंसर भी हो रहा था। इसलिए तमाम देशों ने डीडीटी के इस्तेमाल पर 2004 में रोक लगा दी। अब मच्छरों से होने वाली बीमारियों से लड़ने के लिए एकदम ताजा-नया नुस्खा आजमाया जा रहा है।
मच्छर मारने का ये कैसा प्रयोग?
पिछले साल अक्टूबर में सिंगापुर में एक जगह बड़ी तादाद में लोग जमा हुए थे। इनमें सरकारी अफसर थे। स्थानीय लोग थे। मीडिया भी मौजूद था। इन सब के हाथ में मच्छरों से भरे हुए डिब्बे थे। एक, दो, तीन के काउंटडाउन के बाद सबने एक साथ अपने डिब्बे खोलकर मच्छर हवा में उड़ा दिए। सिंगापुर जैसे गर्म देश में जहां आम तौर पर मच्छरों से परेशान लोग उन्हें मारते हैं, वहां मच्छरों को इस तरह छोड़ने का नजारा आम तो था नहीं लेकिन इन लोगों ने करीब तीन हजार मच्छर हवा में छोड़े थे।
सिंगापुर के ब्रैडेल हाइट्स इलाके में हुए इस इवेंट के लिए लोगों को कई महीने से जानकारी दी जा रही थी। उन्हें बताया गया था कि ये मच्छर काटने वाले नहीं हैं। स्थानीय लोगों को बताया गया था कि ये एक बड़ा साइंस प्रोजेक्ट है, जिसमें वो शरीक होने जा रहे हैं।
पिछले साल अक्टूबर में सिंगापुर में एक जगह बड़ी तादाद में लोग जमा हुए थे। इनमें सरकारी अफसर थे। स्थानीय लोग थे। मीडिया भी मौजूद था। इन सब के हाथ में मच्छरों से भरे हुए डिब्बे थे। एक, दो, तीन के काउंटडाउन के बाद सबने एक साथ अपने डिब्बे खोलकर मच्छर हवा में उड़ा दिए। सिंगापुर जैसे गर्म देश में जहां आम तौर पर मच्छरों से परेशान लोग उन्हें मारते हैं, वहां मच्छरों को इस तरह छोड़ने का नजारा आम तो था नहीं लेकिन इन लोगों ने करीब तीन हजार मच्छर हवा में छोड़े थे।
सिंगापुर के ब्रैडेल हाइट्स इलाके में हुए इस इवेंट के लिए लोगों को कई महीने से जानकारी दी जा रही थी। उन्हें बताया गया था कि ये मच्छर काटने वाले नहीं हैं। स्थानीय लोगों को बताया गया था कि ये एक बड़ा साइंस प्रोजेक्ट है, जिसमें वो शरीक होने जा रहे हैं।
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असल में हवा में छोड़े गए ये मच्छर वोल्बाशिया नाम के बैक्टीरिया के शिकार थे। ये बैक्टीरिया मच्छरों की प्रजनन की क्षमता पर असर डालता है। साथ ही ये जीका वायरस को भी फैलने से रोकता है। ये तजुर्बा करने वाला सिंगापुर इकलौता देश नहीं। एशिया और लैटिन अमरीका के कई देशों में ये प्रयोग हो रहा है। बहुत से देशों में मच्छरों की बच्चे पैदा करने की क्षमता खत्म कर दी जाती है। फिर उन्हें हवा में छोड़ दिया जाता है। इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में भी यही प्रयोग हो रहा है। यहां पर मच्छरों की प्रजनन क्षमता खत्म करके बड़े पैमाने पर इंसानी बस्तियों के पास छोड़ा जा रहा है।
नए नुस्खों की जरूरत
मच्छरों की रोकथाम के दुनिया के जाने-माने एक्सपर्ट ड्यून गुब्लर कहते हैं कि बीमारी वाले मच्छरों की रोकथाम के लिए इंसान को नए नुस्खों की सख़्त जरूरत है। वो मानते हैं कि फिलहाल दो तरीके बेहद कारगर साबित होते दिख रहे हैं।
पहला तो वो जो सिंगापुर और योग्याकार्ता में आजमाया जा रहा है। जिसमें नर मच्छरों की बनावट में बदलाव करके उन्हें बच्चे पैदा करने की ताकत से महरूम कर दिया जाता है। इस तरह से मच्छरों की नई पीढ़ी पैदा होने से रोकी जा रही है।
इससे भी कारगर तरीका वैज्ञानिकों को मिला है वोल्बाशिया नाम के बैक्टीरिया में। ये बैक्टीरिया खुले तौर पर नहीं मिलता। ये किसी न किसी कीड़े के शरीर में ही पैदा होता है, पनपता है और फिर नई पीढ़ी को जन्म देकर खत्म हो जाता है। वोल्बाशिया जिस भी कीड़े के शरीर में होता है, उसको जीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के वायरस से लड़ने की ताकत देता है।
नए नुस्खों की जरूरत
मच्छरों की रोकथाम के दुनिया के जाने-माने एक्सपर्ट ड्यून गुब्लर कहते हैं कि बीमारी वाले मच्छरों की रोकथाम के लिए इंसान को नए नुस्खों की सख़्त जरूरत है। वो मानते हैं कि फिलहाल दो तरीके बेहद कारगर साबित होते दिख रहे हैं।
पहला तो वो जो सिंगापुर और योग्याकार्ता में आजमाया जा रहा है। जिसमें नर मच्छरों की बनावट में बदलाव करके उन्हें बच्चे पैदा करने की ताकत से महरूम कर दिया जाता है। इस तरह से मच्छरों की नई पीढ़ी पैदा होने से रोकी जा रही है।
इससे भी कारगर तरीका वैज्ञानिकों को मिला है वोल्बाशिया नाम के बैक्टीरिया में। ये बैक्टीरिया खुले तौर पर नहीं मिलता। ये किसी न किसी कीड़े के शरीर में ही पैदा होता है, पनपता है और फिर नई पीढ़ी को जन्म देकर खत्म हो जाता है। वोल्बाशिया जिस भी कीड़े के शरीर में होता है, उसको जीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के वायरस से लड़ने की ताकत देता है।
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जादुई फॉर्मूला
हालांकि ये एडीज नस्ल के मच्छरों में नहीं पाया जाता। लेकिन अब वैज्ञानिक पहले मादा मच्छरों को वोल्बाशिया बैक्टीरिया से संक्रमित कराते हैं। फिर इन मच्छरों को खुली हवा में छोड़ते हैं। ये मादा मच्छर जब अंडे देती हैं, तो बैक्टीरिया नई नस्ल में पहुंच जाते हैं और मच्छरों की नई पीढ़ी में जीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसे वायरस आने से रोकते हैं। इससे बीमारी के वायरस फैल नहीं पाते।
इस नुस्खे का सुझाव ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दिया था। दुनिया के तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर ये नुस्खा कामयाब हुआ, तो मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां रोकने का जादुई फॉर्मूला साबित हो सकता है।
सिंगापुर और चीन जैसे देश वोल्बाशिया बैक्टीरिया को सिर्फ नर मच्छरों में डालते हैं। इस वजह से वोल्बाशिया से संक्रमित नर मच्छर, आम मादा मच्छरों से सेक्स नहीं कर पाते। नतीजा मच्छरों की आबादी कम होने लगती है। ये आगे चलकर खत्म हो जाते हैं।
सिंगापुर की वैज्ञानिक ली चिंग एनजी कहती हैं कि उन्होंने इसलिए ये तरीका चुना क्योंकि नर मच्छर काटते नहीं हैं इसलिए आम जनता भी इस प्रयोग में साझेदार हो जाती है। सिंगापुर में इसका ट्रायल कामयाब होने के बाद अमरीकी सरकार ने भी वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर खुली हवा में छोड़ने की इजाजत दे दी है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद पा लेंगे क़ाबू
इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में ये प्रयोग पिछले करीब तीन साल से चल रहा है। आज की तारीख में शहर के 24 इलाकों में नियमित रूप से वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर छोड़ जा रहे हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में वो इन इलाकों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों पर काबू पा लेंगे। सिंगापुर में तो इस प्रयोग के नतीजे काफी अच्छे रहे हैं।यानी अब मच्छर ही मच्छरों का खात्मा कर के हमें बीमारियों से बचाने में काम आ रहे हैं।
हालांकि ये एडीज नस्ल के मच्छरों में नहीं पाया जाता। लेकिन अब वैज्ञानिक पहले मादा मच्छरों को वोल्बाशिया बैक्टीरिया से संक्रमित कराते हैं। फिर इन मच्छरों को खुली हवा में छोड़ते हैं। ये मादा मच्छर जब अंडे देती हैं, तो बैक्टीरिया नई नस्ल में पहुंच जाते हैं और मच्छरों की नई पीढ़ी में जीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसे वायरस आने से रोकते हैं। इससे बीमारी के वायरस फैल नहीं पाते।
इस नुस्खे का सुझाव ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दिया था। दुनिया के तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर ये नुस्खा कामयाब हुआ, तो मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां रोकने का जादुई फॉर्मूला साबित हो सकता है।
सिंगापुर और चीन जैसे देश वोल्बाशिया बैक्टीरिया को सिर्फ नर मच्छरों में डालते हैं। इस वजह से वोल्बाशिया से संक्रमित नर मच्छर, आम मादा मच्छरों से सेक्स नहीं कर पाते। नतीजा मच्छरों की आबादी कम होने लगती है। ये आगे चलकर खत्म हो जाते हैं।
सिंगापुर की वैज्ञानिक ली चिंग एनजी कहती हैं कि उन्होंने इसलिए ये तरीका चुना क्योंकि नर मच्छर काटते नहीं हैं इसलिए आम जनता भी इस प्रयोग में साझेदार हो जाती है। सिंगापुर में इसका ट्रायल कामयाब होने के बाद अमरीकी सरकार ने भी वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर खुली हवा में छोड़ने की इजाजत दे दी है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद पा लेंगे क़ाबू
इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में ये प्रयोग पिछले करीब तीन साल से चल रहा है। आज की तारीख में शहर के 24 इलाकों में नियमित रूप से वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर छोड़ जा रहे हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में वो इन इलाकों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों पर काबू पा लेंगे। सिंगापुर में तो इस प्रयोग के नतीजे काफी अच्छे रहे हैं।यानी अब मच्छर ही मच्छरों का खात्मा कर के हमें बीमारियों से बचाने में काम आ रहे हैं।