डायबिटीज तेजी से बढ़ता हुआ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट है। रिपोर्ट से पता चलता है दुनियाभर में 20-79 साल की उम्र के 589 मिलियन (58.9 करोड़) से ज्यादा वयस्क इस बीमारी से जूझ रहे हैं। जिस तेजी के साथ डायबिटीज के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है ऐसे में आशंका है कि साल 2050 तक इनकी संख्या 853 मिलियन (85 करोड़ से ज्यादा) हो सकती है।
Eye Problems: क्या आपकी नजर भी हो गई है धुंधली? डायबिटीज है तो तुरंत करें ये काम
डायबिटीज केवल रेटिना ही नहीं, बल्कि मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी आंखों की बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देती है। अच्छी बात यह है कि समय पर ब्लड शुगर नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इन जटिलताओं के जोखिम को काफी कम किया जा सकता है।
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आंखों पर डायबिटीज का असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिन लोगों का ब्लड शुगर अक्सर बढ़ा रहता है उनमें किडनी, हार्ट की समस्याओं का खतरा भी अधिक होता है। डायबिटीज का तंत्रिकाओं पर भी असर होता है इससे आंखों को रक्त का संचार करने वाली नसें भी प्रभावित हो जाती हैं।
- डायबिटीज के कारण आंखों को होने वाले नुकसान के शुरुआत में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते।
- व्यक्ति को न दर्द होता है और न ही तुरंत नजर कम होती है।
- हालांकि समय के साथ ये आंखों की रोशनी को प्रभावित करती जाती है।
डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या
हाई ब्लड शुगर रेटिना की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं को कमजोर बना देती है। इससे सूजन, रक्तस्राव का जोखिम हो सकता है, जिससे नजर कमजोर होने लगती है। इसे डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या कहा जाता है।
- इसके कारण नजर धुंधली हो जाती है, फ्लोटर्स दिखते हैं और गंभीर मामलों में रोशनी तक जा सकती है।
- कई लोगों को रात में कम दिखता है, रंगों की पहचान में करने में दिक्कत हो सकती है।
- ऐसे लक्षण होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
डायबिटीज वाले अपनी आंखों को कैसे बचाएं?
डॉक्टर कहते हैं, जिन लोगों को टाइप-2 डायबिटीज है उन्हें आंखों की विस्तृत जांच करानी चाहिए।
- इसके अलावा HbA1c, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने से भी आंखों की रक्त वाहिकाओं पर दबाव कम पड़ता है और रेटिनोपैथी बढ़ने का खतरा घट सकता है।
- आंखों की दिक्कतों को कम करने के लिए आहार और लाइफस्टाइल को ठीक रखना भी जरूरी है।
- धूम्रपान छोड़ें, दवाएं समय पर लें, आंखों की नियमित जांच कराएं। इससे आंखों की रोशनी जाने से बचाया जा सकता है।
अधिकांश मामलों में यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए और उचित इलाज शुरू हो जाए, तो गंभीर जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।