पति से इससे पहले भी झूठ बोला था पर तब उसका नफा-नुकसान समझती थी। इस बार लग रहा था कि अंधे कूंए में छलांग लगाने जा रही हूं। तब मसला कुछ और था। मैंने अपने पति को अपनी तन्ख़्वाह असल से कम बताई थी ताकि कुछ पैसे जमा कर सकूं और उसे शराब में पैसे उड़ाने से रोक सकूं।मालूम था कि पकड़ी गई तो कितनी मार पड़ेगी।आंख सूज जाएगी, आंतों में दर्द रहेगा, कमर पर कुछ निशान होंगे, पर सुकून था कि बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा किए पैसे वो फिर भी नहीं निकाल पाएगा।
'मैंने अपने पति को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली'
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पर अब तो जिंदगी भी मौत सी लगने लगी थी। मैं थी 22 साल की पर 40 की लगने लगी थी।बदन पतला जरूर था पर जवान नहीं।हड्डियों का ढांचा-सा रह गया था।आंखों के नीचे काले गड्ढे थे और चेहरे पर मासूमियत की जगह ऊबाई-सी थकान थी।चलूं तो लगता था कि कमर भी हल्की-सी झुक गई है और ये तो सिर्फ वो था जो सबको दिखाई देता था। जो कुछ अंदर बिखर गया था उसकी चीख तो सिर्फ मेरे कानों में ही गूंजती थी।
शुरुआत में तो मुझे कुछ गलत भी नहीं लगता था। 15 साल की उम्र में शादी हुई और ब्याह कर शहर आ गए। पति काम कर के घर आते तो खाने के बाद बिस्तर में मेरी जरूरत होती।सिर्फ जरूरत। मैं बस एक शरीर थी जिसकी भावनाओं से उसका कोई सरोकार नहीं था।
पर इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं थी।मां ने बताया था ऐसा ही होता है।वहां तक भी ठीक था।फिर पहली बेटी हुई ,फिर पहली मारपीट,फिर उसने पहली बार शराब पी, फिर बिस्तर में सारा गुस्सा निकला,फिर दूसरी बेटी हुई, फिर उसने काम छोड़ दिया, फिर मैंने काम करना शुरू किया,फिर तीसरी बेटी हुई।
'बेटे की चाह से जुड़ गई थी मेरी जिंदगी'
मुझसे मारपीट, मेरे कमाए पैसों से शराब और बिस्तर में शैतान की तरह मेरे ही शरीर का इस्तेमाल, सब जारी रहा, पर मैं चुप रही। औरत के साथ ये सब होता है मां ने बताया था।चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी। अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज हो गईं।
पूछा, पैदा कर पाओगी? इतना खून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा।सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी जिंदगी को। बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था।बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीकी नहीं समझा सकती थी उन्हें।मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए। किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी जिंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे।मुझे यकीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा और इस बार बेटा ही हुआ!
'लेकिन रुकी नहीं थी यातना'
अस्पताल में जब नर्स ने आकर ये बताया तो मैं रोने लगी। बच्चा पैदा करने के लिए 10 घंटे से सहा दर्द और नौ महीने तक कमजोर शरीर में पालने की थकान मानो एक पल में गायब हो गई, पर फिर... फिर कुछ नहीं बदला।वो मनहूस सिलसिला जारी रहा।अब मेरी क्या गलती थी? अब तो मैंने बेटा भी पैदा कर दिया था। पर मेरे पति को शायद शैतान बनने की आदत पड़ गई थी।मेरा शरीर बहुत टूट गया था फिर से पेट से ना हो जाऊं, ये खौफ हर वक्त सताता रहता था।
एक दिन मेरी मैडम ने मेरा बेजान चेहरा देख मुझसे पूछा, एक चीज बदलनी हो तो क्या बदलोगी अपनी जिंदगी में। मैं हंस दी। अपनी चाहत के बारे में ना मैंने कभी सोचा था ना किसी ने कभी पूछा था पर बात हंसी में टाली नहीं। खूब सोचा। एक हफ़्ते बाद मैडम से कहा कि मेरा जवाब तैयार है। वो तो तब तक भूल भी गई थीं शायद।
नसबंदी का फैसला
मैंने कहा कि मैं फिर मां नहीं बनना चाहती, पर अपने पति को कैसे रोकूं ये नहीं जानती। मैंने समझाने की कोशिश की थी। चार बच्चों को खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं, ये भी कहा था। पर बिस्तर उससे नहीं छूटता। मेरे कमजोर शरीर की परवाह नहीं और बच्चों की जिम्मेदारी जब कभी ली ही नहीं तो उससे क्या डर।तब मैडम ने कहा, नसबंदी का ऑपरेशन करवा लो। ये तुम्हारे हाथ में है। तुम उसे रात में चाहे ना रोक पाओ, कम से कम गर्भवती होने से तो खुद को बचा लोगी।मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता था। कई दिन बीत गए। मेरे बहुत से सवाल थे। जब मैडम जवाब देते-देते थक गईं तो एक क्लीनिक का पता दिया।वहां मेरे जैसी और औरतें थीं। उन्हीं से पता चला कि नसबंदी का ऑपरेशन जल्दी से हो तो जाता है पर कुछ गड़बड़ हो जाए तो जान भी जा सकती है।