Ravana Dahan: दशहरा आते ही देशभर में रावण दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं विशाल मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाए जाते हैं, तो कहीं भव्य रामलीला का आयोजन होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में कुछ ऐसे शहर और इलाके भी हैं, जहां दशहरे पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है?
दशहरा 2026: कहीं दामाद तो कहीं पूर्वज! दशहरे पर इन जगहों में रावण की होती है पूजा
Dussehra 2026: जानिए बिसरख, मंदसौर, बस्तर और अन्य जगहों पर रावण दहन की परंपरा क्यों अलग है। पढ़ें दशहरे की अनोखी धार्मिक मान्यताएं।
बिसरख, उत्तर प्रदेश
रावण के जन्मस्थान की मान्यता
उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले (नोएडा) में स्थित बिसरख गांव रावण से जुड़ी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस स्थान का संबंध रावण के पिता ऋषि विश्रवा से है और रावण को यहां विशेष सम्मान दिया जाता है।
दशहरे के दिन यहां सामान्य तौर पर होने वाले रावण दहन से दूरी रखी जाती है। कुछ स्थानीय श्रद्धालु रावण की मृत्यु पर शोक और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। हालांकि, रावण के जन्मस्थान से जुड़ी यह बात स्थानीय मान्यता है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।
मंदसौर, मध्य प्रदेश
रावण को मानते हैं दामाद
मध्य प्रदेश का मंदसौर भी दशहरे की अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदोदरी का संबंध मंदसौर से माना जाता है और इसी वजह से कुछ समुदाय रावण को अपना दामाद मानते हैं। यहां रावण से जुड़ी धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं।
इस मान्यता के कारण कुछ लोग रावण दहन के बजाय उसकी पूजा करना पसंद करते हैं। हालांकि, पूरे शहर में सभी लोग एक जैसी परंपरा का पालन करते हों, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
बस्तर, छत्तीसगढ़
75 दिनों तक चलता है दशहरा
छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा भारत के सबसे अनोखे उत्सवों में गिना जाता है। यहां यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलने वाली परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा है। इस उत्सव का मुख्य केंद्र भगवान राम और रावण का युद्ध नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना है। यहां रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है। पारंपरिक रथ यात्रा, स्थानीय देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक अनुष्ठान इस उत्सव की खास पहचान हैं।
बैजनाथ, हिमाचल प्रदेश
शिवभक्त रावण से जुड़ी आस्था
हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ क्षेत्र में भी रावण दहन को लेकर अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। रावण को भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है और स्थानीय धार्मिक आस्था में शिव की तपस्या से जुड़ी कथाओं को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण यहां रावण दहन की परंपरा से दूरी बनाए रखने की चर्चा होती है। हालांकि, इस परंपरा के स्वरूप और पालन को लेकर स्थानीय स्तर पर अंतर हो सकता है।