नेहा गोयल: फैक्ट्रियों में काम कर मां ने बनाया सफल महिला हॉकी खिलाड़ी
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क्वालीफ़ायर मुकाबले में मिली एक ट्रॉफी को दिखाते हुए नेहा गोयल की आंखों की चमक उनके हालातों से हमें एक पल के लिए पराया कर गईं। हॉकी कब और कैसे उनके जीवन का हिस्सा बन गई, इस सवाल पर नेहा याद करती हैं कि जब वह छठी कक्षा में थीं, तब उनकी एक सहेली ने उन्हें हॉकी स्टिक थमा दी।
नेहा ने उस वक़्त अच्छे कपड़े-जूतों के लिए हॉकी खेलना शुरू किया। फिर एक जिला स्तर का मुकाबला जीतने के बाद उन्हें दो हज़ार रुपए का ईनाम मिला जिसके बाद उन्हें लगा कि शायद इस खेल के जरिए वह अपने घर की आर्थिक हालत सुधार सकती हैं।
पिता इस खेल में नेहा को बढ़ावा नहीं देना चाहते थे, पर मां ने अपनी बेटी का पूरा साथ दिया। वह बताती हैं कि उनके घर के आसपास रहने वाले लोगों ने मां को बहुत बार हिदायत दी कि 'बेटी को यूं बाहर मत निकालों, कहीं कोई उठाकर कभी ले जाए तो?'मां ने समाज के तानों से ऊपर अपनी बेटी और उसके खेलने के जज्बे को रखा।
धीरे-धीरे वह इस खेल को जीने लगीं और उन्हें नेशनल टीम में जगह मिली। नेहा को इसी खेल के ज़रिए साल 2015 में रेलवे में नौकरी भी मिली। नेहा घर संभालने की स्थिति में आई ही थीं कि साल 2017 में लंबी बीमारी के चलते उनके के पिता का निधन हो गया। घर खर्च केवल नेहा के पैसों से तो पूरा हो नहीं सकता था और फिर नौकरी करते हुए हॉकी किट से लेकर खेल से जुड़ी हुई कई जरूरते भी सामने थीं।
पिता की मौत के बाद नेहा की मां ने फैक्ट्रियों में काम करना शुरू किया। कभी जूतों की फैक्ट्री में काम करतीं, तो कभी साइकिल के कारखाने में एक घंटे का 4 रुपए मेहनताना कमातीं। नेहा ने कहा कि उन दिनों वो प्रैक्टिस के बाद अपनी दोनों बहनों के साथ अपनी मां की घर और फैक्ट्री के काम में हाथ बटातीं।
नेहा ने बताया कि उनकी कोच प्रीतम रानी सिवाच ने उनकी आर्थिक मदद की। उनकी कोच नेहा के जूते खराब होने पर उन्हें पैसे देतीं ताकि वह नए जूते खरीद सके। नेहा ने खेल के साथ-साथ अपने घर को जिस तरह से संभाला, उसकी उम्मीद 23 साल की लड़की से करना मुश्किल ही होगा। नेहा कहती हैं कि अपनी दोनों बहनों की शादी भी उन्होंने ही कराई थी। घर के हालातों से समझौता करने की बजाए नेहा गोयल ने हर मुश्किल का सामना डटकर किया। अपने खेल में भी उतनी ही मेहनत की।

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