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कोरोना वायरस का पता लगाने वाली महिला कौन थी?

Tue, 21 Jul 2020 09:31 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अपराजिता शुक्ला Updated Tue, 21 Jul 2020 09:31 AM IST
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june almeida is the first woman search coronavirus
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PIB
मनुष्यों में पहली बार कोरोना वायरस की खोज करने वाली महिला स्कॉटलैंड के एक बस ड्राइवर की बेटी थीं जिन्होंने 16 वर्ष की आयु में स्कूल छोड़ दिया था। उनका नाम था जून अलमेडा जो वायरस इमेजिंग क्षेत्र के चर्चित लोगों की फेहरिस्त में अपना नाम लिखना चाहती थीं। लेकिन कोविड-19 महामारी के समय में जून के काम की चर्चा हो रही है और उनकी खोज चर्चा के केंद्र में है। कोविड-19 एक नया वायरस है, लेकिन यह कोरोना वायरस का ही एक प्रकार जिसकी खोज डॉक्टर अलमेडा ने सबसे पहले, वर्ष 1964 में लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में स्थित लैब में की थी।

वायरोलॉजिस्ट जून अलमेडा का जन्म वर्ष 1930 में हुआ था। स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर के उत्तर-पूर्व में स्थित एक बस्ती में रहने वाले बेहद साधारण परिवार में उनका जन्म हुआ। 16 साल की उम्र में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जून ने ग्लासगो शहर की ही एक लैब में बतौर तकनीशियन नौकरी की शुरुआत की थी। बाद में वे नई संभावनाएं तलाशने के लिए लंदन चली गईं और वर्ष 1954 में उन्होंने वेनेजुएला के कलाकार एनरीके अलमेडा से शादी कर ली।

june almeida is the first woman search coronavirus
सांकेतिक तस्वीर
सामान्य सर्दी-जुकाम पर रिसर्च
मेडिकल क्षेत्र के लेखक जॉर्ज विंटर के अनुसार शादी के कुछ वर्ष बाद ये दंपति उनकी युवा बेटी के साथ कनाडा के टोरंटो शहर चला गया था। कनाडा के ही ओंटारियो केंसर इंस्टीट्यूट में डॉक्टर जून अलमेडा ने एक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के साथ अपने उत्कृष्ट कौशल को विकसित किया। इस संस्थान में काम करते हुए उन्होंने एक ऐसी विधि पर महारत हासिल कर ली थी जिसकी मदद से वायरस की कल्पना करना बेहद आसान हो गया था।
लेखक जॉर्ज विंटर ने बीबीसी को बताया कि 'यूके ने डॉक्टर जून अलमेडा के काम की अहमियत को समझा और साल 1964 में उनके सामने लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल में काम करने का प्रस्ताव रखा। ये वही अस्पताल है जहां कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का इलाज हुआ। कनाडा से लौटने के बाद डॉक्टर अलमेडा ने डॉक्टर डेविड टायरेल के साथ रिसर्च का काम शुरू किया जो उन दिनों यूके के सेलिस्बरी क्षेत्र में सामान्य सर्दी-जुकाम पर शोध कर रहे थे।

जॉर्ज विंटर ने बताया कि डॉक्टर टायरेल ने जुकाम के दौरान नाक से बहने वाले तरल के कई नमूने एकत्र किये थे और उनकी टीम को लगभग सभी नमूनों में सामान्य सर्दी-जुकाम के दौरान पाये जाने वाले वायरस दिख रहे थे। लेकिन इनमें एक नमूना जिसे बी-814 नाम दिया गया था और उसे साल 1960 में एक बोर्डिंग स्कूल के छात्र से लिया गया था, बाकी सबसे अलग था।

june almeida is the first woman search coronavirus
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
कोरोना वायरस नाम किसने दिया

डॉक्टर टायरेल को लगा, क्यों ना इस नमूने की जांच डॉक्टर जून अलमेडा की मदद से इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के जरिए की जाए। यह सैंपल जांच के लिए डॉक्टर अलमेडा के पास भेजा गया जिन्होंने परीक्षण के बाद बताया कि 'ये वायरस इनफ्लूएंजा की तरह दिखता तो है, पर ये वो नहीं, बल्कि उससे कुछ अलग है।' और यही वो वायरस है जिसकी पहचान बाद में डॉक्टर जून अलमेडा ने कोरोना वायरस के तौर पर की। जॉर्ज विंटर कहते हैं कि डॉक्टर अलमेडा ने दरअसल इस वायरस जैसे कण पहले चूहों में होने वाली हेपिटाइटिस और मुर्गों में होने वाली संक्रामक ब्रोंकाइटिस में देखे थे।

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june almeida is the first woman search coronavirus
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विंटर बताते हैं कि जून का पहला रिसर्च पेपर हालांकि यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि 'उन्होंने इन्फ्लूएंजा वायरस की ही खराब तस्वीरें पेश कर दी हैं।' लेकिन सैंपल संख्या बी-814 से हुए इस नई खोज को वर्ष 1965 में प्रकाशित हुए ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में और उसके दो वर्ष बाद जर्नल ऑफ जेनेरल वायरोलॉजी में तस्वीर के साथ प्रकाशित किया गया। जॉर्ज विंटर के अनुसार वे डॉक्टर टायरेल, डॉक्टर अलमेडा और सेंट थॉमस मेडिकल संस्थान के प्रोफेसर टोनी वॉटरसन थे जिन्होंने इस वायरस की ऊंची-नीची बनावट को देखते हुए ही इस वायरस का नाम कोरोना वायरस रखा था।



 
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june almeida is the first woman search coronavirus
सांकेतिक तस्वीर

बाद में डॉक्टर अलमेडा ने लंदन के पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज में काम किया। वहीं से उन्होंने अपनी डॉक्ट्रेट की पढ़ाई पूरी की। अपने करियर के अंतिम दिनों में डॉक्टर जून अलमेडा वैलकॉम इंस्टिट्यूट में थीं जहां उन्होंने इमेजिंग के जरिए कई नए वायरसों की पहचान की और उनके पेटेंट अपने नाम करवाए। वैलकॉम इंस्टिट्यूट से रिटायर होने के बाद डॉक्टर अलमेडा एक योगा टीचर बन गई थी। लेकिन 1980 के दशक में उन्हें संरक्षक के तौर पर एचआईवी वायरस की नोवल तस्वीरें लेने के लिए बुलाया गया था।


 
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