कोरोना वायरस का पता लगाने वाली महिला कौन थी?
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मेडिकल क्षेत्र के लेखक जॉर्ज विंटर के अनुसार शादी के कुछ वर्ष बाद ये दंपति उनकी युवा बेटी के साथ कनाडा के टोरंटो शहर चला गया था। कनाडा के ही ओंटारियो केंसर इंस्टीट्यूट में डॉक्टर जून अलमेडा ने एक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के साथ अपने उत्कृष्ट कौशल को विकसित किया। इस संस्थान में काम करते हुए उन्होंने एक ऐसी विधि पर महारत हासिल कर ली थी जिसकी मदद से वायरस की कल्पना करना बेहद आसान हो गया था।
लेखक जॉर्ज विंटर ने बीबीसी को बताया कि 'यूके ने डॉक्टर जून अलमेडा के काम की अहमियत को समझा और साल 1964 में उनके सामने लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल में काम करने का प्रस्ताव रखा। ये वही अस्पताल है जहां कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का इलाज हुआ। कनाडा से लौटने के बाद डॉक्टर अलमेडा ने डॉक्टर डेविड टायरेल के साथ रिसर्च का काम शुरू किया जो उन दिनों यूके के सेलिस्बरी क्षेत्र में सामान्य सर्दी-जुकाम पर शोध कर रहे थे।
जॉर्ज विंटर ने बताया कि डॉक्टर टायरेल ने जुकाम के दौरान नाक से बहने वाले तरल के कई नमूने एकत्र किये थे और उनकी टीम को लगभग सभी नमूनों में सामान्य सर्दी-जुकाम के दौरान पाये जाने वाले वायरस दिख रहे थे। लेकिन इनमें एक नमूना जिसे बी-814 नाम दिया गया था और उसे साल 1960 में एक बोर्डिंग स्कूल के छात्र से लिया गया था, बाकी सबसे अलग था।
डॉक्टर टायरेल को लगा, क्यों ना इस नमूने की जांच डॉक्टर जून अलमेडा की मदद से इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के जरिए की जाए। यह सैंपल जांच के लिए डॉक्टर अलमेडा के पास भेजा गया जिन्होंने परीक्षण के बाद बताया कि 'ये वायरस इनफ्लूएंजा की तरह दिखता तो है, पर ये वो नहीं, बल्कि उससे कुछ अलग है।' और यही वो वायरस है जिसकी पहचान बाद में डॉक्टर जून अलमेडा ने कोरोना वायरस के तौर पर की। जॉर्ज विंटर कहते हैं कि डॉक्टर अलमेडा ने दरअसल इस वायरस जैसे कण पहले चूहों में होने वाली हेपिटाइटिस और मुर्गों में होने वाली संक्रामक ब्रोंकाइटिस में देखे थे।
विंटर बताते हैं कि जून का पहला रिसर्च पेपर हालांकि यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि 'उन्होंने इन्फ्लूएंजा वायरस की ही खराब तस्वीरें पेश कर दी हैं।' लेकिन सैंपल संख्या बी-814 से हुए इस नई खोज को वर्ष 1965 में प्रकाशित हुए ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में और उसके दो वर्ष बाद जर्नल ऑफ जेनेरल वायरोलॉजी में तस्वीर के साथ प्रकाशित किया गया। जॉर्ज विंटर के अनुसार वे डॉक्टर टायरेल, डॉक्टर अलमेडा और सेंट थॉमस मेडिकल संस्थान के प्रोफेसर टोनी वॉटरसन थे जिन्होंने इस वायरस की ऊंची-नीची बनावट को देखते हुए ही इस वायरस का नाम कोरोना वायरस रखा था।
बाद में डॉक्टर अलमेडा ने लंदन के पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज में काम किया। वहीं से उन्होंने अपनी डॉक्ट्रेट की पढ़ाई पूरी की। अपने करियर के अंतिम दिनों में डॉक्टर जून अलमेडा वैलकॉम इंस्टिट्यूट में थीं जहां उन्होंने इमेजिंग के जरिए कई नए वायरसों की पहचान की और उनके पेटेंट अपने नाम करवाए। वैलकॉम इंस्टिट्यूट से रिटायर होने के बाद डॉक्टर अलमेडा एक योगा टीचर बन गई थी। लेकिन 1980 के दशक में उन्हें संरक्षक के तौर पर एचआईवी वायरस की नोवल तस्वीरें लेने के लिए बुलाया गया था।

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