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Akshaya Tritiya Katha: अक्षय तृतीया पर किसने करवाई थी सोने की वर्षा? जानें पौराणिक कथा और धन प्राप्ति के उपाय

ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: Shweta Singh Updated Sat, 18 Apr 2026 07:33 PM IST
सार

अक्षय तृतीया पर खरीदा गया सोना घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी का स्थायी वास लेकर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे एक बेहद रोचक और प्रेरणादायक कथा भी छिपी है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी कथा।  

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Akshaya Tritiya 2026 Jab Aasman Se Barse Tha Sona Janiye Puri Kahani aur dhan prapti ke upay
Akshaya Tritiyaa Katha - फोटो : amar ujala

Akshaya Tritiya 2026 Katha: अक्षय तृतीया हिंदू धर्म का एक बेहद शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। इसे हर साल वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। साल 2026 में यह खास दिन 19 अप्रैल, रविवार को पड़ रहा है। मान्यता है कि इस दिन किए गए हर शुभ कार्य का फल कभी समाप्त नहीं होता।  इसलिए इसे “अक्षय” यानी कभी न खत्म होने वाला कहा जाता है। यही वजह है कि इस दिन लोग सोना खरीदना बेहद शुभ मानते हैं। माना जाता है कि अक्षय तृतीया पर खरीदा गया सोना घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी का स्थायी वास लेकर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे एक बेहद रोचक और प्रेरणादायक कथा भी छिपी है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी कथा।  

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Akshaya Tritiya 2026 Jab Aasman Se Barse Tha Sona Janiye Puri Kahani aur dhan prapti ke upay
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। - फोटो : adobe stock

अक्षय तृतीया कथा 
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। इस दिन से जुड़ी एक प्राचीन और प्रेरणादायक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि एक बार आदि गुरु शंकराचार्य भिक्षा मांगते हुए एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण के घर पहुंचे। उस ब्राह्मण के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था लेकिन उसके मन में अतिथि के प्रति गहरा सम्मान और दान की भावना थी। उसने अपने घर में खोजबीन की और अंततः एक सूखा आंवला (आँवला फल) ही उन्हें भिक्षा के रूप में अर्पित कर दिया।
उस ब्राह्मण की गरीबी के बावजूद उसके भीतर की उदारता और श्रद्धा को देखकर शंकराचार्य जी अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने तुरंत वहीं बैठकर माता लक्ष्मी की स्तुति में विशेष मंत्रों का उच्चारण करना शुरू किया। यह स्तुति इतनी प्रभावशाली और भक्ति से परिपूर्ण थी कि देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो गईं। देवी लक्ष्मी ने उस गरीब ब्राह्मण की निस्वार्थ भावना से प्रभावित होकर उसके घर में स्वर्ण की वर्षा कर दी। देखते ही देखते उसकी दरिद्रता समाप्त हो गई और उसका जीवन समृद्धि से भर गया।
मान्यता है कि यह चमत्कारिक घटना वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन ही हुई थी। तभी से इस दिन को अत्यंत शुभ माना जाने लगा और सोना खरीदने की परंपरा शुरू हुई। लोगों का विश्वास है कि इस दिन किया गया दान, जप और खरीदारी विशेष रूप से फलदायी होती है और जीवन में कभी खत्म न होने वाली समृद्धि का आशीर्वाद देती है।

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कनकधारा स्तोत्र पाठ के लाभ - फोटो : adobe

कनकधारा स्तोत्र पाठ के लाभ 
कनकधारा स्तोत्र को हिंदू धर्म में अत्यंत शक्तिशाली और चमत्कारी स्तोत्र माना जाता है। मान्यता है कि इसी स्तोत्र के प्रभाव से आदि गुरु शंकराचार्य ने एक निर्धन ब्राह्मण के घर देवी लक्ष्मी की कृपा से सोने की वर्षा करवाई थी। “कनक” का अर्थ होता है सोना और “धारा” का अर्थ है वर्षा, यानी सोने की वर्षा कराने वाला स्तोत्र। विद्वानों के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, उसके जीवन में धन-संपत्ति की कमी दूर होने लगती है और मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र न केवल भौतिक समृद्धि बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है। धार्मिक मान्यता है कि कनकधारा स्तोत्र का पाठ कठिन परिस्थितियों में भी सौभाग्य के द्वार खोल सकता है और व्यक्ति के जीवन में धन लाभ के शुभ योग बना सकता है। इसलिए इसे मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावी साधन माना गया है।

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श्री कनकधारा स्तोत्र - फोटो : Amar Ujala
श्री कनकधारा स्तोत्र 
अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत् प्रभावान्मांगल्यं भाजिः मधुमायिनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।
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