Angarki Chaturthi 2021: अंगारकी गणेश चतुर्थी आज, जानिए महत्व और चतुर्थी व्रत कथा
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गणेश जी दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान था। उनके हाथ में अनेकों प्रकार के आयुध सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूंड सुंदर थी मुख में एक दांत शोभायमान हो रहा था। शूर्पसदृश्य उनके बड़े-बड़े कान कुंडलों से सुशोभित हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्य की आभा वाला और अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत था। अपने इष्टदेव भगवान गणेश के सुंदरस्वरूप को सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणों में गिर पड़ा और उन जगदीश्वर श्री गणेश की स्तुति करने लगा। भौम को हर प्रकार से स्तुति करते हुए देख भगवान गणेश अत्यंत प्रसन्न हुए और मधुर वाणी से बोले वत्स ! मैं तुम्हारी उग्र तपस्या, भक्ति और स्तुति से मैं बहुत प्रसन्न हूं। बाल्यवस्था होते हुए भी तुममें बहुत धैर्य है। मैं तुम्हें वांछित वर देता हूँ।
गणेश जी के इस प्रकार वचनों को सुनते हुए भूमिपुत्र ने कहा हे स्वामी ! आपके दर्शन से मेरी दृष्टि धन्य हो गई। मेरा जन्म लेना भी धन्य हो गया। मेरा ज्ञान मेरा कुल और पर्वतों सहित यह मेरी माता पृथ्वी भी धन्य हो गई। मेरी यह संपूर्ण तपस्या भी धन्य हो गई जो मैंने आप अखिलेश का दर्शन प्राप्त किया। हे देव ! आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरा नाम त्रैलोक्य में कल्याणकारक के रूप में विख्यात हो जाय। हे विभो ! चतुर्थी तिथि को मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है अतः यह तिथि सम्पूर्ण संकटों को हरने वाली तथा सभी कामनाओं की पूर्ति कराने वाली हो।
भौम के इस तरह के अनेकों मधुर वचनों से गणेश जी अति प्रसन्न हुए और पुनः बोले हैं पृथ्वी पुत्र तुम देवताओं के साथ सम्यकरूप से अमृतपान करोगे और मंगल इस नाम से लोक में तुम्हारी ख्याति होगी। अंगारक के सामान रक्तवर्ण होने के कारण तुम अंगारक नाम से भी प्रसिद्ध होगे। जो मनुष्य अंगारक चतुर्थी को तुम्हारा व्रत करेगा उसे वर्ष भर संकष्ट चतुर्थी व्रत करने से होने वाले फल के समतुल्य पुण्य प्राप्त होगा। उनके संपूर्ण कार्यों में निर्बिघ्नता होगी इसमें कोई संशय नहीं है। हे शत्रुओं को संतप्त करने वाले ! तुमने व्रतों में सर्वश्रेष्ठ चतुर्थी व्रत का अनुष्ठान किया अतः उसके प्रभाव से तुम अवंतीनगरी के राजा होगे। तुम्हारे नाम के संकीर्तन मात्र से मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त करेगा।
मंगल को इस प्रकार वर देकर गजानन भगवान गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए। उसके पश्चात मंगल ने भगवान गणेश की संपूर्ण सुंदर अंगों और दसभुजा वाली प्रतिमा की भक्ति पूर्वक स्थापना की और मंदिर का नाम मंगलमूर्ति रखा। तभी से अवंतिका क्षेत्र सभी मनुष्यों के लिए कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो गया। अंगारकी चतुर्थी को मंगल की पूजा आराधना से जन्म कुंडली में मंगल ग्रह जनित दोषों से मुक्ति मिलती है।