Hanuman Chalisa Path: हनुमान चालीसा हिंदू धर्म के सबसे प्रभावशाली और चमत्कारी स्तोत्रों में से एक मानी जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति को भगवान हनुमान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके प्रभाव से मन को शांति मिलती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हनुमान चालीसा का पाठ ग्रह दोषों के अशुभ प्रभाव को कम करने में भी सहायक माना गया है। वैसे तो कोई भी व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुसार हनुमान चालीसा का पाठ कर सकता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए इसका नियमित पाठ विशेष रूप से लाभकारी बताया गया है। जिन लोगों पर शनि दोष, शनि की महादशा, साढ़ेसाती अथवा ढैय्या का प्रभाव चल रहा हो, जो मानसिक तनाव, भय, चिंता या बार-बार आने वाली बाधाओं से परेशान हों, उन्हें मंगलवार और शनिवार हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से जीवन की कई परेशानियों में राहत मिलने की मान्यता है। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा के लाभ और इससे जुड़े जरूरी नियम।
Hanuman Chalisa Path: इन 3 लोगों को जरूर करना चाहिए हनुमान चालीसा का पाठ, मिलते हैं मनचाहे परिणाम
Hanuman Chalisa Path: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने से ग्रह दोषों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती हैं। इसके अलावा तनाव को कम करने में भी यह सहायक माना गया है।
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हनुमान चालीसा के लाभ और नियम
- मंगलवार की सुबह स्नान के बाद भगवान हनुमान की पूजा करके श्रद्धापूर्वक हनुमान चालीसा का पाठ करें। इससे बजरंगबली की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
- पाठ करते समय स्वच्छ वस्त्र धारण करें और साफ आसन पर बैठकर एकाग्र मन से हनुमान चालीसा का पाठ करें। इससे पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
- यदि संभव हो तो हनुमान जी को गुड़-चना अर्पित करें। इससे पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।
- हनुमान चालीसा के पाठ से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य शनि दोष के अशुभ प्रभाव को कम करने में सहायक माना जाता है।
- इस पाठ से घर और जीवन में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा सकारात्मक वातावरण बनता है।
- हनुमान चालीसा के पाठ से व्यक्ति के भीतर हिम्मत, ऊर्जा और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।
हनुमान चालीसा Hanuman Chalisa
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निजमनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन वरन विराज सुवेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।
शंकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन।।
विद्यावान गुणी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना।।
जुग सहस्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को भावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
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