Ramadan Me Kya Kare Or Kya Nahi: रमजान का मुबारक महीना इबादत, रहमत और आत्मिक पाकीजगी का महीना माना जाता है। इस दौरान मुसलमान अल्लाह की रज़ा हासिल करने और अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने के लिए रोज़ा रखते हैं। सेहरी से लेकर सूर्यास्त तक का यह रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, परहेज़गारी और आत्मसंयम की सीख भी देता है। इफ्तार के साथ रोज़ा खोलना इस इबादत की एक खूबसूरत परंपरा है, जो शुक्रगुज़ारी का एहसास कराती है।
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रोजा रखने वालों के लिए जरूरी नियम, पाक महीने में इन बातों का रखें खास ध्यान
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: श्वेता सिंह
Updated Wed, 11 Feb 2026 12:36 PM IST
सार
Ramazan Ke Niyam: माह-ए-रमजान को इस्लाम में सबसे पाक और बरकत वाला महीना माना गया है। रोजा केवल खाने-पीने से परहेज़ नहीं, बल्कि बुरे विचारों और गलत आचरण से दूरी बनाना भी है। रोजेदारों को सब्र, नमाज़, कुरान की तिलावत और जरूरतमंदों की मदद पर खास ध्यान देना चाहिए। झूठ, ग़ुस्सा, चुगली और बुरे कामों से बचना रोजे की असल रूह को कायम रखता है।
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ramadan 2026
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रमजान
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रमजान में सख्ती से मना किए गए काम
- इस्लाम में हर हाल में झूठ हराम है, लेकिन रमजान में इसकी सख्त मनाही और भी बढ़ जाती है। रोज़े की हालत में सच्चाई और ईमानदारी अपनाना जरूरी है।
- किसी की गैरमौजूदगी में उसकी बुराई करना गुनाह माना गया है। रमजान में ज़ुबान पर काबू रखना रोज़े की अहम शर्त है।
- रोज़ा सब्र और संयम की ट्रेनिंग है। गुस्सा, लड़ाई-झगड़ा या अपशब्द बोलना रोज़े की रूह के खिलाफ है।
- ब्याज से जुड़े लेन-देन या किसी भी तरह की नाजायज़ कमाई इस्लाम में मना है, और रमजान में इससे खास तौर पर बचने की ताकीद की गई है।
- सेहरी के बाद और इफ्तार से पहले जानबूझकर कुछ भी खाना या पीना रोज़ा तोड़ देता है।
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रमजान में किन परिस्थितियों में परहेज़ या छूट दी गई है
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रमजान में किन परिस्थितियों में परहेज़ या छूट दी गई है
- इस दौरान महिलाओं को रोज़ा रखने से छूट दी गई है। वे रमजान के बाद छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा रख सकती हैं।
- वैवाहिक संबंध इस्लाम में जायज़ हैं, लेकिन रोज़े के दौरान सुबह से शाम तक संबंध बनाना मना है। इफ्तार के बाद इसकी अनुमति होती है।
- यदि कोई व्यक्ति लगभग 57 किलोमीटर या उससे अधिक की दूरी की यात्रा पर है, तो उसे रोज़ा न रखने की इजाज़त है। बाद में इन रोज़ों की क़ज़ा पूरी करनी होती है।
- गंभीर बीमारी, बुजुर्ग अवस्था या ऐसी हालत जिसमें रोज़ा रखना नुकसानदेह हो, वहां भी छूट दी गई है।
रोजेदारों के लिए कुछ अहम नियम
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रोजेदारों के लिए कुछ अहम नियम और हिदायतें
- यदि कोई मुस्लिम यात्रा पर है और तय दूरी (शरई हद) के अनुसार मुसाफिर माना जाता है, तो उसे रोज़ा न रखने की इजाज़त है। हालांकि बाद में छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा पूरी करना जरूरी होता है।
- अगर कोई पुरुष या महिला बीमार है और रोज़ा रखने से सेहत को नुकसान पहुंच सकता है, तो उसे रोज़ा न रखने की छूट दी गई है। स्वस्थ होने के बाद वे छूटे रोज़े पूरे कर सकते हैं।
- रमजान रहमत और हमदर्दी का महीना है। भूखे को खाना खिलाना, गरीबों और बेघर लोगों की मदद करना बहुत सवाब का काम माना गया है। इससे रोज़े की रूह और ज्यादा मजबूत होती है।
- ईद-उल-फितर की नमाज़ से पहले ज़कात-उल-फितर (फितरा) अदा करना जरूरी माना गया है, ताकि जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशी में शामिल हो सकें। जिन पर ज़कात फ़र्ज़ है, उन्हें रमजान में इसे अदा करने का खास ख्याल रखना चाहिए।
- अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थायी मजबूरी (जैसे बुजुर्ग या लाइलाज बीमारी) की वजह से रोज़ा नहीं रख सकता, तो वह हर छूटे रोज़े के बदले एक गरीब व्यक्ति को खाना खिलाए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।