Thursday Remedies: हिंदू धर्म में गुरुवार का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह दिन विष्णु जी और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, गुरु ग्रह को ज्ञान, भाग्य, विवाह और संतान का कारक माना गया है। इसलिए गुरुवार के दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से कुंडली में गुरु का स्थान मजबूत बनता है। हालांकि, इस दिन विष्णु चालीसा का पाठ करने से जीवन में अत्यधिक बदलाव आते हैं। साथ ही विवाह में आ रही बाधाएं, आर्थिक परेशानियां और संतान से जुड़ी समस्याएं भी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। ऐसे में आइए विष्णु चालीसा पाठ के लाभ को जानते हैं।
Thursday Remedies: गुरुवार को अवश्य करें यह एक काम, विवाह-संतान और व्यापार से जुड़ी दिक्कतें होंगी दूर
Thursday Remedies: गुरुवार के दिन विष्णु चालीसा का पाठ करने से कुंडली में गुरु का स्थान मजबूत होता है। साथ ही भगवान विष्णु की कृपा मिलने से जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता भी बनी रहती है।
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विष्णु चालीसा पाठ के लाभ
- गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा और विष्णु चालीसा का पाठ करने से विवाह मार्ग की रुकावटें कम होने लगती हैं।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नियमित रूप से विष्णु चालीसा का पाठ करने से कुंडली में गुरु ग्रह की स्थिति मजबूत होने लगती है।
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- कहा जाता है कि भगवान विष्णु की कृपा से धन संबंधी परेशानियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। साथ ही नौकरी और व्यापार में तरक्की के अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
- जिन लोगों को संतान से जुड़ी परेशानियां होती हैं, उन्हें गुरुवार के दिन श्रद्धा से विष्णु चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं।
- विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से मन शांत रहता है और नकारात्मक विचार धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। व्यापार में भी लाभ होता है।
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विष्णु चालीसा
दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय,
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।।
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी।।
सुंदर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत।।
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे।।
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन।।
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण।।
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा।।
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रत्नन को निकलाया।।
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया।।
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया।।
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया।।
असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई।।
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी।।
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी।।
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे।।
हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे।।
चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन।।
शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण।।
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई।।
दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ।।
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै।।