True Love vs Attachment Geeta Quotes: किसी के साथ रहना अच्छा लगना प्रेम हो सकता है, लेकिन उसके बिना बेचैन हो जाना हमेशा प्रेम नहीं होता। कई बार रिश्तों में अपनापन और अधिकार की भावना इतनी घुल जाती है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम प्यार कर रहे हैं या सामने वाले से मोह करने लगे हैं। प्रेम में मन को विस्तार मिलता है, जबकि मोह धीरे-धीरे मन को बांधने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं में भी आसक्ति (अटैचमेंट), अपेक्षा और मन की स्थिरता को लेकर गहरी बातें कही गई हैं।
Love vs Attachment: प्रेम है या मोह? श्रीमद्भगवद्गीता की इन सीखों से समझें रिश्ते में छिपा असली फर्क
Love vs Attachment Geeta: श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं में अटैचमेंट, अपेक्षा और मन की स्थिरता को लेकर गहरी बातें कही गई हैं। आइए प्रेम और मोह के बीच का फर्क विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।
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प्रेम में आजादी, मोह में अधिकार की भावना
सच्चा प्रेम किसी व्यक्ति को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं करता। इसमें सामने वाले की पसंद, भावनाओं और स्वतंत्रता का सम्मान होता है। इसके विपरीत मोह में यह भावना मजबूत होने लगती है कि दूसरा व्यक्ति हमेशा हमारे मुताबिक व्यवहार करे।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 47वां श्लोक)
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने पर है, उसके परिणाम पर नहीं। रिश्तों में भी इस सीख को समझा जा सकता है। प्रेम करें, अपना व्यवहार सच्चा रखें, लेकिन सामने वाला उसी तरह प्रतिक्रिया दे, इसकी जिद न करें।
जहां भरोसा है, वहां हर पल डर नहीं
अगर किसी रिश्ते में सच्चा प्रेम है तो दूरी या व्यस्तता के बावजूद विश्वास बना रहता है। लेकिन मोह बढ़ने पर व्यक्ति बार-बार यह सोच सकता है कि कहीं दूसरा उसे छोड़ न दे। फोन का जवाब देर से मिलना, कम बातचीत होना या अकेले समय बिताना भी बेचैनी पैदा करने लगता है। गीता मन को स्थिर रखने की सीख देती है।
भगवान कृष्ण कहते हैं-
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 का श्लोक 48)
यानी आसक्ति छोड़कर संतुलित मन से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। रिश्तों में भी संतुलन जरूरी है। प्रेम हो, लेकिन इतना नहीं कि मन की शांति दूसरे व्यक्ति के हर व्यवहार पर निर्भर हो जाए।
प्रेम में अपनापन, मोह में खोने का भय
किसी को अपना मानना स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब वही अपनापन डर में बदल जाता है। जब हमें लगने लगे कि उस व्यक्ति के बिना हमारा जीवन अधूरा है, हमारी खुशी खत्म हो जाएगी या हम खुद को संभाल नहीं पाएंगे, तो यह भाव प्रेम से आगे बढ़कर अटैचमेंट का रूप ले सकता है।
गीता में कहा गया है-
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 62वां श्लोक)
अर्थात किसी विषय के बारे में लगातार चिंतन करने से उसमें मोह पैदा होता है। यह बात रिश्तों पर भी लागू की जा सकती है। जब हमारा मन लगातार किसी एक व्यक्ति, उसके व्यवहार और उसकी प्रतिक्रिया में उलझा रहता है, तो भावनात्मक निर्भरता बढ़ सकती है।
उम्मीदों का बोझ रिश्ते को कर सकता है कमजोर
“उसने मुझे मैसेज क्यों नहीं किया?”, “उसने मेरी बात नहीं मानी”, “वह मेरे लिए इतना नहीं करता जितना मैं उसके लिए करती हूं” ऐसी अपेक्षाएं धीरे-धीरे रिश्ते में तनाव बढ़ा सकती हैं।
प्रेम का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला हमारी हर इच्छा पूरी करे। स्वस्थ रिश्ते में बातचीत, समझ और सम्मान होता है। अपनी भावनाएं व्यक्त करना जरूरी है, लेकिन हर भावना के बदले मनचाहा व्यवहार मिलने की उम्मीद रखना जरूरी नहीं।
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-
“समत्वं योग उच्यते।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 48वां श्लोक)
अर्थात मन की समता ही योग है। रिश्तों में भी यही संतुलन हमें सिखाता है कि खुशी और दुख दोनों परिस्थितियों में खुद को संभालना सीखें।