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समाज ने रोका, किस्मत ने परखा: फिर पुणे की डायना कैसे बनीं भारत की पहली महिला फेरारी रेसर? भावुक कर देगी कहानी

Wed, 01 Jul 2026 09:03 AM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पुणे
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पुणे Published by: स्वप्निल शशांक Updated Wed, 01 Jul 2026 09:03 AM IST
सार

शिक्षिका बनने की तैयारी कर रही एक भारतीय महिला ने जिंदगी का सबसे बड़ा जोखिम उठाया और मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में कदम रखा। ताने, हार, दुर्घटनाएं और असफलताएं झेलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज वही महिला अंतरराष्ट्रीय फेरारी रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं। यह कहानी सिर्फ रफ्तार की नहीं, बल्कि हिम्मत, विश्वास और सपनों को सच करने की है।

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From Classroom Dreams to Ferrari Glory: The Inspiring Journey of India Trailblazing Woman Racer Diana Pundole
डायना पुंडोले - फोटो : instagram

एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी, दूसरी तरफ रफ्तार से भरी अनिश्चित दुनिया। एक तरफ क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने का सपना था, तो दूसरी तरफ रेसिंग ट्रैक पर खुद को साबित करने की चुनौती। ज्यादातर लोग शायद सुरक्षित रास्ता चुनते, लेकिन डायना पुंडोले ने वह रास्ता चुना, जिस पर न मंजिल तय थी और न ही सफलता की गारंटी। आज वही डायना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेरारी चलाने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं, लेकिन इस उपलब्धि तक पहुंचने का सफर जितना चमकदार दिखता है, उतना आसान कभी नहीं था। आइए उनकी कहानी जानते हैं...



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From Classroom Dreams to Ferrari Glory: The Inspiring Journey of India Trailblazing Woman Racer Diana Pundole
डायना पुंडोले - फोटो : instagram
पिता का सपना, जिसने बदल दी जिंदगी
पुणे में पली-बढ़ीं डायना के भीतर रेसिंग का जुनून बचपन से था। उनके पिता फॉर्मूला-1 के बड़े प्रशंसक थे और शायद ही कोई रेस मिस करते हों। सात साल की उम्र में डायना ने पहली बार गो-कार्टिंग की और वहीं से स्पीड के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ।
From Classroom Dreams to Ferrari Glory: The Inspiring Journey of India Trailblazing Woman Racer Diana Pundole
डायना पुंडोले - फोटो : instagram
समय बीतने के साथ उनके पिता इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका सपना डायना की सबसे बड़ी ताकत बन गया। वह कई बार कह चुकी हैं कि आज भी हर रेस में उन्हें अपने पिता का साथ महसूस होता है। मुश्किल समय में वही यादें उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती हैं।

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डायना पुंडोले - फोटो : instagram
जब शिक्षिका बनने का सपना छोड़ लिया
डायना ने अंग्रेजी साहित्य और फोनेटिक्स में मास्टर्स किया था। पढ़ाई पूरी होने के बाद वह एक स्कूल में शिक्षिका बनने वाली थीं। नौकरी लगभग तय हो चुकी थी। उसी दौरान उन्हें महिलाओं के लिए आयोजित मोटरस्पोर्ट्स टैलेंट हंट के बारे में पता चला। करीब 200 प्रतिभागियों के बीच उन्होंने अपनी जगह बनाई और यहीं से जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। उन्होंने सुरक्षित नौकरी छोड़ दी और रेसिंग को अपना करियर बनाने का फैसला किया।
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डायना पुंडोले - फोटो : instagram
ताने, हार और हादसे... लेकिन हार नहीं मानी
रेसिंग की दुनिया में कदम रखते ही चुनौतियां सामने थीं। कई बार वह रेस हार गईं, कई बार आखिरी स्थान पर रहीं और कई दुर्घटनाओं का भी सामना करना पड़ा। लोगों ने कहा कि मोटरस्पोर्ट्स महिलाओं के लिए नहीं है। कुछ ने उन्हें घर लौट जाने की सलाह दी, तो कुछ ने यहां तक कह दिया कि वह इस खेल के लिए बनी ही नहीं हैं। लेकिन डायना ने हर आलोचना को अपनी ताकत बनाया। उन्होंने रेसिंग नहीं छोड़ी। लगातार अभ्यास किया, खुद को बेहतर बनाया और धीरे-धीरे वही लोग उनकी तारीफ करने लगे जो कभी उन पर सवाल उठाते थे।

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