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90 घंटे की ड्यूटी का दर्द: चंडीगढ़ PGI के डाॅक्टर्स में बढ़ रहा मानसिक तनाव, अपने लिए नहीं मिल रहा वक्त

Thu, 02 Jul 2026 12:40 PM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Thu, 02 Jul 2026 12:40 PM IST
सार

डाॅक्टर्स का कहना है कि लंबी ड्यूटी से उन्हें अपने शौक या व्यक्तिगत रुचियों के लिए बिल्कुल समय नहीं मिलता। परिवार के साथ समय बिताना भी अधिकतर डॉक्टरों के लिए चुनौती बन गया है।

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long duty hours mental fatigue resident doctors at PGI Chandigarh now reached national level
Doctor - फोटो : adobestock

विस्तार

चंडीगढ़ पीजीआई के रेजिडेंट डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी, बढ़ते तनाव और मानसिक थकान का मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। एआरडी अध्यक्ष और नेफोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विष्णु जिंजा ने कहा कि पीजीआई के सर्वे और फाइमा के राष्ट्रीय आरएमएस 2.0 सर्वे के निष्कर्ष स्वास्थ्य मंत्रालय को भेज दिए गए हैं। उनका कहना है कि रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए निश्चित कार्य घंटे, साप्ताहिक अवकाश और मानसिक स्वास्थ्य सहायता केवल डॉक्टरों के हित का नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का भी विषय है। यदि समाधान नहीं निकला तो इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।
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462 रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए सर्वे में सामने में यह आया सामने

करीब 90% रेजिडेंट डॉक्टर एनएमसी की निर्धारित 74 घंटे प्रति सप्ताह की सीमा से अधिक काम कर रहे हैं।
45.2% डॉक्टर सप्ताह में 80 घंटे से अधिक ड्यूटी कर रहे हैं।
34.2% डॉक्टर सप्ताह में 61 से 80 घंटे तक काम करते हैं।
केवल करीब 10% डॉक्टर ही एनएमसी के निर्धारित कार्यघंटों के भीतर ड्यूटी कर रहे हैं।

हर दूसरा डॉक्टर हाई स्ट्रेस में

सर्वे के अनुसार 37.7 प्रतिशत डॉक्टर हाई स्ट्रेस और 16.7 प्रतिशत बहुत अधिक तनाव में हैं। वहीं 35.5 प्रतिशत डॉक्टर मध्यम तनाव महसूस कर रहे हैं। यानी अधिकांश युवा डॉक्टर लगातार मानसिक दबाव के बीच मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

काम का असर निजी जिंदगी पर भी

सर्वे में 85.5 प्रतिशत डॉक्टरों ने माना कि ड्यूटी के लंबे घंटे उनकी निजी जिंदगी को प्रभावित करते हैं। 79.9 प्रतिशत डॉक्टर अक्सर काम के बोझ से अभिभूत महसूस करते हैं, जबकि 84.8 प्रतिशत को शिफ्टों के बीच पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता।
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मानसिक थकान और शौक भी छूट रहे
करीब 87.8 प्रतिशत डॉक्टरों ने स्वीकार किया कि वे अक्सर मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं। वहीं 47.4 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें अपने शौक या व्यक्तिगत रुचियों के लिए बिल्कुल समय नहीं मिलता। परिवार के साथ समय बिताना भी अधिकांश डॉक्टरों के लिए चुनौती बन गया है।

क्षमता से अधिक काम लेने का एहसास
सर्वे में 78 प्रतिशत से अधिक डॉक्टरों ने माना कि उनसे उनकी व्यावहारिक क्षमता से अधिक काम लिया जाता है। बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने यह भी स्वीकार किया कि लगातार दबाव के कारण वे मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

साप्ताहिक अवकाश और योग सत्र की पहल
डॉ. विष्णु जिंजा ने बताया कि पिछले वर्ष पीजीआई प्रशासन को प्रत्येक विभाग में साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित करने और ड्यूटी घंटों को संतुलित करने का प्रस्ताव दिया गया था। कई विभागों में इसका सकारात्मक असर दिखा है। अब भी काफी विभागों में ये लागू नहीं हो पाया है। इसके अलावा तनाव कम करने के लिए योग सत्र और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी पहल भी शुरू की गई हैं। उनका कहना है कि अब लक्ष्य इन सुविधाओं को सभी विभागों तक पहुंचाना है, ताकि युवा डॉक्टर बेहतर मानसिक स्थिति में रहकर मरीजों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण इलाज दे सकें।
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