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ट्राइसिटी कोचिंग सेंटर्स में सुरक्षा बड़ा सवाल: दरवाजे के भरोसे हजारों छात्र, लखनऊ हादसे पर क्या बोले संचालक?
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़ पंचकूला
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Tue, 23 Jun 2026 05:54 PM IST
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सार
सवाल यह है कि ट्राइसिटी में हजारों छात्र रोजाना कोचिंग संस्थानों में पढ़ने पहुंचते हैं। ऐसे में क्या प्रशासन, फायर विभाग और कोचिंग संचालकों को किसी बड़े हादसे का इंतजार करना चाहिए।
ट्राइसिटी के कोचिंग सेंटर्स में सुरक्षा बड़ा सवाल
- फोटो : संवाद
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विस्तार
लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में कोचिंग सेंटर में हुए हादसे के बाद ट्राइसिटी के कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चंडीगढ़ के सेक्टर-34 और पंचकूला के सेक्टर-15 समेत कई क्षेत्रों में संचालित कोचिंग सेंटरों में हजारों छात्र रोजाना पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या ऐसे संस्थानों की है जहां आपातकालीन निकासी (इमरजेंसी एग्जिट) की व्यवस्था नहीं है।कई भवनों में छात्रों के आने-जाने के लिए केवल एक ही रास्ता है, जिससे किसी भी आपदा की स्थिति में बड़ा हादसा हो सकता है।
चंडीगढ़ का सेक्टर-34 लंबे समय से शिक्षा हब के रूप में पहचान रखता है। यहां छोटे-बड़े 50 से अधिक कोचिंग सेंटर संचालित हैं, जहां प्रतिदिन करीब 10 हजार छात्र आईआईटी-जेईई, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। अधिकांश संस्थान व्यावसायिक भवनों की पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल पर चल रहे हैं। बड़े कोचिंग सेंटरों में एक कक्षा में 50 से अधिक छात्र मौजूद रहते हैं, जबकि छोटे संस्थानों में भी एक बैच में 25 से 30 छात्र होते हैं।
छात्रों का कहना है कि अधिकांश कक्षाओं में प्रवेश और निकासी के लिए केवल एक ही दरवाजा है। यही रास्ता अंदर आने और बाहर जाने के लिए इस्तेमाल होता है। ऐसे में आग लगने, शॉर्ट सर्किट, धुआंभरने या अन्य आपात स्थिति में यह एकमात्र रास्ता बाधित हो गया तो सैकड़ों छात्रों की जान खतरे में पड़ सकती है। कई छात्रों ने बताया कि उन्होंने कभी किसी मॉक ड्रिल या आपदा प्रबंधन अभ्यास में भाग नहीं लिया।
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स्थिति केवल चंडीगढ़ तक सीमित नहीं है। पंचकूला के सेक्टर-15 और अन्य क्षेत्रों में संचालित कई कोचिंग संस्थानों में भी इमरजेंसी एग्जिट की सुविधा नहीं है। यहां भी अधिकांश सेंटर पहली और दूसरी मंजिल पर संचालित हो रहे हैं, जहां छात्रों की संख्या काफी अधिक रहती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भीड़भाड़ वाले संस्थानों में एक अतिरिक्त निकासी मार्ग और नियमित सुरक्षा ऑडिट बेहद जरूरी हैं।
चंडीगढ़ का सेक्टर-34 लंबे समय से शिक्षा हब के रूप में पहचान रखता है। यहां छोटे-बड़े 50 से अधिक कोचिंग सेंटर संचालित हैं, जहां प्रतिदिन करीब 10 हजार छात्र आईआईटी-जेईई, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। अधिकांश संस्थान व्यावसायिक भवनों की पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल पर चल रहे हैं। बड़े कोचिंग सेंटरों में एक कक्षा में 50 से अधिक छात्र मौजूद रहते हैं, जबकि छोटे संस्थानों में भी एक बैच में 25 से 30 छात्र होते हैं।
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छात्रों का कहना है कि अधिकांश कक्षाओं में प्रवेश और निकासी के लिए केवल एक ही दरवाजा है। यही रास्ता अंदर आने और बाहर जाने के लिए इस्तेमाल होता है। ऐसे में आग लगने, शॉर्ट सर्किट, धुआंभरने या अन्य आपात स्थिति में यह एकमात्र रास्ता बाधित हो गया तो सैकड़ों छात्रों की जान खतरे में पड़ सकती है। कई छात्रों ने बताया कि उन्होंने कभी किसी मॉक ड्रिल या आपदा प्रबंधन अभ्यास में भाग नहीं लिया।
स्थिति केवल चंडीगढ़ तक सीमित नहीं है। पंचकूला के सेक्टर-15 और अन्य क्षेत्रों में संचालित कई कोचिंग संस्थानों में भी इमरजेंसी एग्जिट की सुविधा नहीं है। यहां भी अधिकांश सेंटर पहली और दूसरी मंजिल पर संचालित हो रहे हैं, जहां छात्रों की संख्या काफी अधिक रहती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भीड़भाड़ वाले संस्थानों में एक अतिरिक्त निकासी मार्ग और नियमित सुरक्षा ऑडिट बेहद जरूरी हैं।
ग्राउंड फ्लोर पर दो गेट, ऊपर सिर्फ एक रास्ता
जांच में सामने आया कि अधिकांश कोचिंग सेंटरों के ग्राउंड फ्लोर पर रिसेप्शन क्षेत्र में प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग गेट हैं, लेकिन जहां वास्तविक कक्षाएं संचालित होती हैं, वहां केवल एक सामान्य दरवाजा ही उपलब्ध है। छात्र इसी रास्ते से अंदर जाते हैं और बाहर निकलते हैं। किसी भी आपात स्थिति में यही सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
कोचिंग संचालकों ने भी मानी समस्या
कुछ कोचिंग संचालकों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर स्वीकार किया कि कई व्यावसायिक भवनों का डिजाइन ही ऐसा है, जहां आने-जाने के लिए केवल एक रास्ता है। उनका कहना है कि यह समस्या केवल कोचिंग सेंटरों तक सीमित नहीं, बल्कि शहर की कई व्यावसायिक इमारतों में मौजूद है। उन्होंने प्रशासन से भवन सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा करने की मांग की।
जांच में सामने आया कि अधिकांश कोचिंग सेंटरों के ग्राउंड फ्लोर पर रिसेप्शन क्षेत्र में प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग गेट हैं, लेकिन जहां वास्तविक कक्षाएं संचालित होती हैं, वहां केवल एक सामान्य दरवाजा ही उपलब्ध है। छात्र इसी रास्ते से अंदर जाते हैं और बाहर निकलते हैं। किसी भी आपात स्थिति में यही सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
कोचिंग संचालकों ने भी मानी समस्या
कुछ कोचिंग संचालकों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर स्वीकार किया कि कई व्यावसायिक भवनों का डिजाइन ही ऐसा है, जहां आने-जाने के लिए केवल एक रास्ता है। उनका कहना है कि यह समस्या केवल कोचिंग सेंटरों तक सीमित नहीं, बल्कि शहर की कई व्यावसायिक इमारतों में मौजूद है। उन्होंने प्रशासन से भवन सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा करने की मांग की।
दमकल विभाग ने शुरू की निगरानी
चंडीगढ़ के चीफ फायर ऑफिसर डॉ. इंद्रजीत सिंह ने कहा कि लखनऊ की घटना बेहद दुखद है। फायर विभाग की टीमों को निर्देश दिए गए हैं कि वे कोचिंग संस्थानों का नियमित निरीक्षण करें। विभागकई सेंटरों में जागरूकता कार्यक्रम भी चला चुका है और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
वहीं, पंचकूला के फायर अधिकारी तरसेम सिंह ने कहा कि जिन संस्थानों को फायर विभाग की एनओसी जारी की गई है, उनमें इमरजेंसी एग्जिट सहित आवश्यक सुरक्षा प्रबंध उपलब्ध हैं। हालांकि छात्रों की सुरक्षा को देखते हुए सभी कोचिंग संस्थानों की व्यापक जांच जरूरी है, ताकि कहीं भी सुरक्षा मानकों में कमी न रहे।
ये है सवाल
ट्राइसिटी में हजारों छात्र रोजाना कोचिंग संस्थानों में पढ़ने पहुंचते हैं। ऐसे में क्या प्रशासन, फायर विभाग और कोचिंग संचालकों को किसी बड़े हादसे का इंतजार करना चाहिए, या फिर सुरक्षा मानकों की व्यापक जांच और सुधार की शुरुआत अभी से होनी चाहिए? लखनऊ की घटना के बाद यह सवाल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
चंडीगढ़ के चीफ फायर ऑफिसर डॉ. इंद्रजीत सिंह ने कहा कि लखनऊ की घटना बेहद दुखद है। फायर विभाग की टीमों को निर्देश दिए गए हैं कि वे कोचिंग संस्थानों का नियमित निरीक्षण करें। विभागकई सेंटरों में जागरूकता कार्यक्रम भी चला चुका है और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
वहीं, पंचकूला के फायर अधिकारी तरसेम सिंह ने कहा कि जिन संस्थानों को फायर विभाग की एनओसी जारी की गई है, उनमें इमरजेंसी एग्जिट सहित आवश्यक सुरक्षा प्रबंध उपलब्ध हैं। हालांकि छात्रों की सुरक्षा को देखते हुए सभी कोचिंग संस्थानों की व्यापक जांच जरूरी है, ताकि कहीं भी सुरक्षा मानकों में कमी न रहे।
ये है सवाल
ट्राइसिटी में हजारों छात्र रोजाना कोचिंग संस्थानों में पढ़ने पहुंचते हैं। ऐसे में क्या प्रशासन, फायर विभाग और कोचिंग संचालकों को किसी बड़े हादसे का इंतजार करना चाहिए, या फिर सुरक्षा मानकों की व्यापक जांच और सुधार की शुरुआत अभी से होनी चाहिए? लखनऊ की घटना के बाद यह सवाल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।