Teejan Bai: अंबालवियों को तंबूरे की तान पर झुमा चुकी थी तीजन, सपना था-पंडवानी शैली को जिंदा रखे युवा पीढ़ी
एक धार्मिक आयोजन के दौरान 2008 में तीजन को अंबाला में विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। पूरा पंडाल खचाखच भरा था और काफी संख्या में तीजन के कद्रदान खड़े होकर भी तीजन की चिर-परिचित गायन कला को सुनने के लिए बेताब थे।
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महाभारत कथा को एक खास अंदाज में गाने वाली पंडवानी (पांडव वाणी) शैली की पुरोधा तीजन बाई चाहती थीं कि देश की युवा पीढ़ी, खासकर गायन क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले इस पंडवानी शैली को भी सीखें और इसे जिंदा रखें। अपने इस सपने का जिक्र उन्होंने करीब 18 साल पहले हरियाणा के अंबाला जिले में एक कार्यक्रम के दौरान किया था।
साल 2008 में तीजन बाई अंबाला स्थित प्रभु प्रेम पुरम में एक कार्यक्रम में आई थीं। अंबाला में यह उनका पहला और आखिरी कार्यक्रम था। प्रस्तुति के दौरान चेहरे पर चमक और अलग सा तेज, हाथ में तंबूरा, तार पर अंगुलियां और भीतर तक झकझोर देने वाला तीजन का गायन, शायद ही इसे वहां मौजूद अंबालवी कभी भूल पाएंगे।
एक धार्मिक आयोजन के दौरान तीजन को अंबाला में विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। पूरा पंडाल खचाखच भरा था और काफी संख्या में तीजन के कद्रदान खड़े होकर भी तीजन की चिर-परिचित गायन कला को सुनने के लिए बेताब थे।
बेसब्री से तीजन बाई का इंतजार हो रहा था। तीजन जैसे ही एक हाथ में घुंघरू और मोर पंख से सजे तंबूरे और दूसरे हाथ में मंजीरे लेकर स्टेज पर पहुंचीं, तो पूरे पंडाल में जबरदस्त तालियों की गूंज ने तीजन का उत्साह दोगुना कर दिया। तीजन ने भी दोनों हाथ ऊपर कर अपनी खास मुस्कान के साथ श्रोताओं का अभिनंदन स्वीकार किया था।
फिर तीजन की आवाज थी और तालियों की गूंज
स्टेज पर जैसे ही तीजन की प्रस्तुति आगे बढ़ती गई, माहौल ऐसा था कि बस पंडाल में तीजन की आवाज व श्रोताओं की तालियों की गूंज के बीच और कुछ नहीं था। तीजन का अभिनय, संवाद, गायन के दौरान उनकी भाव-भंगिमाएं और नाटकीय प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। श्रोताओं के सामने तीजन ने महाभारत के कई प्रसंग अपनी खास शैली में प्रस्तुत कर उन्हें भावुक कर दिया था।
प्रस्तुति खत्म होने के बाद कुछ पलों तक लगातार बजती श्रोताओं की तालियां मानो तीजन का दिल खोलकर आभार व्यक्त कर रही हों।
अंबालवियों का ऐसा प्यार देखकर तीजन भी काफी उत्साहित और भावुक थीं। तीजन ने मंच पर सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि वे चाहती हैं कि इस पंडवानी शैली का देश में खूब प्रचार हो। संगीत शिक्षा से जुड़े युवा इस शैली को सीखने के प्रति अपनी रुचि बढ़ाएं और इस शैली के साथ आगे बढ़ते हुए सदैव इसे जिंदा रखें।