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घर के भीतर सियासी लकीर: पंजाब के राजनीतिक परिवारों में बंटे झंडे, चन्नी से बादल तक बंटी सियासत
Tue, 18 Aug 2026 04:29 PM IST
शाहिल शर्मा
सुरिंदर पाल, जालंधर
सुरिंदर पाल, जालंधर
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Tue, 18 Aug 2026 04:29 PM IST
सार
पंजाब की राजनीति में पारिवारिक रिश्ते अक्सर टूटते नजर आते हैं। टिकट की होड़, महत्वाकांक्षा और बदलते समीकरणों के कारण एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग दलों में हैं।
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पंजाब विधानसभा चुनाव
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
राज्य की राजनीति में पारिवारिक रिश्ते अक्सर दिलचस्प मोड़ लेते हैं। कई बार एक ही घर के सदस्य अलग-अलग राजनीतिक दलों में शामिल हो जाते हैं। टिकट की दौड़, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बदलते समीकरण इसके मुख्य कारण हैं। इसी वजह से पंजाब के कई राजनीतिक परिवार अलग-अलग खेमों में बंट गए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के भाई मनोहर सिंह ने 2022 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बस्सी पठाना से निर्दलीय चुनाव लड़ा। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा और उनके भाई फतेह जंग सिंह बाजवा भी इसका उदाहरण हैं। प्रताप बाजवा कांग्रेस में विपक्ष के नेता बने रहे जबकि फतेह जंग ने भाजपा का दामन थामा।
बादल परिवार में भी चचेरे भाइयों के रास्ते अलग हुए। मनप्रीत सिंह बादल ने अकाली दल छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई, फिर कांग्रेस और बाद में भाजपा में गए। वहीं, सुखबीर सिंह बादल अकाली दल की कमान संभालते रहे। दिवंगत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। उनके चचेरे भाई गुरकीरत सिंह कोटली कांग्रेस में ही विधायक और मंत्री बने रहे। बटाला के अश्वनी सेखड़ी और इंदरवीर सिंह सेखड़ी ने 2017 में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। बाद में दोनों भाजपा में शामिल हुए, पर 2023 में जमीन विवाद में हाथापाई तक हुई।
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पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के भाई मनोहर सिंह ने 2022 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बस्सी पठाना से निर्दलीय चुनाव लड़ा। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा और उनके भाई फतेह जंग सिंह बाजवा भी इसका उदाहरण हैं। प्रताप बाजवा कांग्रेस में विपक्ष के नेता बने रहे जबकि फतेह जंग ने भाजपा का दामन थामा।
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बादल परिवार में भी चचेरे भाइयों के रास्ते अलग हुए। मनप्रीत सिंह बादल ने अकाली दल छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई, फिर कांग्रेस और बाद में भाजपा में गए। वहीं, सुखबीर सिंह बादल अकाली दल की कमान संभालते रहे। दिवंगत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। उनके चचेरे भाई गुरकीरत सिंह कोटली कांग्रेस में ही विधायक और मंत्री बने रहे। बटाला के अश्वनी सेखड़ी और इंदरवीर सिंह सेखड़ी ने 2017 में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। बाद में दोनों भाजपा में शामिल हुए, पर 2023 में जमीन विवाद में हाथापाई तक हुई।
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चौधरी और नाभा परिवार में राजनीतिक विभाजन
जालंधर के चौधरी परिवार में भी राजनीतिक मतभेद सामने आए। पूर्व सांसद संतोख सिंह चौधरी की पत्नी कर्मजीत कौर चौधरी ने 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उनके बेटे विक्रमजीत सिंह चौधरी कांग्रेस में ही बने रहे। टिकट और राजनीतिक उपेक्षा से कर्मजीत कौर की नाराजगी चर्चा में रही। रणदीप सिंह नाभा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनके भाई जसदीप सिंह निक्कू ने आम आदमी पार्टी का रास्ता चुना।
मलूका और जाखड़ परिवार की बदलती निष्ठाएं
सिकंदर सिंह मलूका शिरोमणि अकाली दल के पुराने नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनकी बहू परमपाल कौर सिद्धू, जो पूर्व आईएएस अधिकारी हैं, भाजपा में शामिल हो गईं। उनके बेटे गुरप्रीत सिंह मलूका भी पत्नी के साथ भाजपा में चले गए। पूर्व पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ कांग्रेस छोड़कर भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल हो चुके हैं। उनके भतीजे अजय कुमार जाखड़ की राजनीतिक सोच अलग दिशा में रही है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक परिवारों में विचारधारा एक जैसी होना जरूरी नहीं।
कंबोज परिवार में पिता-पुत्र के अलग रास्ते
जलालाबाद के विधायक जगदीप सिंह गोल्डी कंबोज आम आदमी पार्टी से हैं। उनके पिता सुरिंदर कंबोज ने बहुजन समाज पार्टी का रास्ता चुना। सुरिंदर कंबोज ने लोकसभा चुनाव भी लड़ा। यह मामला पिता और बेटे की राजनीतिक पसंद के अलग होने का उदाहरण है। पंजाब की राजनीति में खून के रिश्ते भी राजनीतिक झंडों से ऊपर नहीं होते। टिकट, महत्वाकांक्षा और विचारधारा अक्सर परिवारों को बांट देती है।
जालंधर के चौधरी परिवार में भी राजनीतिक मतभेद सामने आए। पूर्व सांसद संतोख सिंह चौधरी की पत्नी कर्मजीत कौर चौधरी ने 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उनके बेटे विक्रमजीत सिंह चौधरी कांग्रेस में ही बने रहे। टिकट और राजनीतिक उपेक्षा से कर्मजीत कौर की नाराजगी चर्चा में रही। रणदीप सिंह नाभा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनके भाई जसदीप सिंह निक्कू ने आम आदमी पार्टी का रास्ता चुना।
मलूका और जाखड़ परिवार की बदलती निष्ठाएं
सिकंदर सिंह मलूका शिरोमणि अकाली दल के पुराने नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनकी बहू परमपाल कौर सिद्धू, जो पूर्व आईएएस अधिकारी हैं, भाजपा में शामिल हो गईं। उनके बेटे गुरप्रीत सिंह मलूका भी पत्नी के साथ भाजपा में चले गए। पूर्व पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ कांग्रेस छोड़कर भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल हो चुके हैं। उनके भतीजे अजय कुमार जाखड़ की राजनीतिक सोच अलग दिशा में रही है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक परिवारों में विचारधारा एक जैसी होना जरूरी नहीं।
कंबोज परिवार में पिता-पुत्र के अलग रास्ते
जलालाबाद के विधायक जगदीप सिंह गोल्डी कंबोज आम आदमी पार्टी से हैं। उनके पिता सुरिंदर कंबोज ने बहुजन समाज पार्टी का रास्ता चुना। सुरिंदर कंबोज ने लोकसभा चुनाव भी लड़ा। यह मामला पिता और बेटे की राजनीतिक पसंद के अलग होने का उदाहरण है। पंजाब की राजनीति में खून के रिश्ते भी राजनीतिक झंडों से ऊपर नहीं होते। टिकट, महत्वाकांक्षा और विचारधारा अक्सर परिवारों को बांट देती है।