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केजरी'वॉल' में दरार: अब सत्ता और संगठन बचाने की दोहरी चुनौती, नेतृत्व और रणनीति पर सवाल; किलेबंदी की परीक्षा

सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: Sharukh Khan Updated Sat, 25 Apr 2026 11:12 AM IST
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सार

पंजाब में आम आदमी पार्टी के सामने बगावत के बाद सत्ता और संगठन बचाने की दोहरी चुनौती है। राज्यसभा में 10 में से 7 सांसद भाजपा में जाने से नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठ गए हैं। पंजाब में किलेबंदी की परीक्षा है। विधायकों और संगठन को एकजुट रखना बड़ी चुनौती होगी।

AAP Crisis News: Reports of 7 Rajya Sabha MPs Joining BJP Raise Questions on Leadership Strategy
AAP Crisis - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

24 अप्रैल 2026 भारतीय राजनीति में बड़े उलटफेर के तौर पर दर्ज हो सकता है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के एक साथ इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से पार्टी को गहरा झटका लगा है। 
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यह घटनाक्रम केवल संख्या का नुकसान नहीं बल्कि नेतृत्व रणनीति और भरोसे पर भी सीधा असर माना जा रहा है। अब पार्टी के सामने पंजाब में सरकार की स्थिरता बनाए रखने के साथ संगठन को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
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पार्टी के 10 में से 7 सांसदों के जाने से राज्यसभा में आप की स्थिति कमजोर हुई है। पंजाब से राघव चड्ढा संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे चेहरे पार्टी की रणनीति और संगठन दोनों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। 
 

राघव चड्ढा जहां विधायकों और मंत्रियों के संपर्क में रहते थे वहीं संदीप पाठक को संगठन का रणनीतिक दिमाग माना जाता था। अशोक मित्तल का प्रभाव संगठन के साथ आर्थिक मोर्चे पर भी मजबूत रहा है और वे कई नेताओं को पार्टी में लाने में सक्रिय रहे हैं।

साल 2022 में संदीप पाठक व राघव चड्ढा ने संभाली थी कमान
साल 2022 में पंजाब में आप की जीत के पीछे संदीप पाठक और राघव चड्ढा की अहम भूमिका रही थी। संदीप पाठक ने चुनावी रणनीति तैयार की और जमीनी स्तर पर टीमों को सक्रिय किया जबकि राघव चड्ढा ने पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर प्रचार की कमान संभाली। 

 

टिकट वितरण से लेकर चुनावी मुद्दों तक दोनों की भूमिका निर्णायक रही। ऐसे में इन नेताओं के जाने से संगठनात्मक ढांचे और चुनावी प्रबंधन पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। 
 

संगठन के भीतर सामने आई दरार लंबे समय से पनप रही असंतुष्टि का संकेत देती है। बगावत करने वाले नेताओं ने पार्टी पर अपनी मूल विचारधारा से भटकने के आरोप लगाए हैं। इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है।

 

संगठन के लिए भी चुनौती
  • पंजाब इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बना हुआ है। नेताओं में असंतोष बढ़ने या टूट की स्थिति में सरकार की स्थिरता पर भी सवाल उठ सकते हैं। संगठनात्मक स्तर पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है। संदीप पाठक के जाने से चुनावी मैनेजमेंट और बूथ स्तर के नेटवर्क पर असर पड़ सकता है। 

  • वहीं राघव चड्ढा और अशोक मित्तल के जाने से शहरी और युवा वर्ग में भी संदेश गया है। इसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

  • विधायकों को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम रखना और जनता के बीच अपनी छवि को मजबूत करना आप के लिए चुनौती है। पार्टी के भीतर असंतोष पहले से मौजूद था। 

 

  • कई नेताओं पर कार्रवाई और कुछ के जेल जाने से संगठन पहले ही दबाव में था। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह घटनाक्रम एक सीमित राजनीतिक झटका है या बड़े बदलाव की शुरुआत।
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