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Sukhbir Badal Attacked: जेड प्लस सुरक्षा के बाद भी हमला कैसे हुआ, 2015 के बाद से क्यों निशाने पर सुखबीर

Fri, 14 Aug 2026 09:09 AM IST
Nivedita सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: Nivedita Updated Fri, 14 Aug 2026 09:09 AM IST
सार

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर नांदेड़ स्थित तख्त श्री हजूर साहिब में एक व्यक्ति ने कृपाण से हमला किया। सुखबीर के हाथ में चोट लगी जबकि बचाने की कोशिश में एक पुलिस अधिकारी भी घायल हुआ। हमलावर को हिरासत में ले लिया गया है। हमले का मकसद अभी स्पष्ट नहीं है।

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Sukhbir Badal Attack despite Z-plus security target since 2015
सुखबीर बादल पर हमला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर गुरुवार को महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित तख्त श्री हजूर साहिब के पास हमला हुआ।
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सुखबीर सिंह बादल को जेड प्लस सुरक्षा मिली है। इसके बावजूद दिसंबर 2024 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और अब महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा साहिब में उन तक हमलावर के पहुंचने से सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सवाल यह है कि धार्मिक स्थलों की खुली व्यवस्था और भारी भीड़ के बीच उच्च श्रेणी की सुरक्षा कितनी प्रभावी है।

सुखबीर की सुरक्षा के संदर्भ में अक्सर ब्लू बुक का जिक्र होता है। हालांकि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति जैसे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा के विशेष नियमों और अन्य संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था को एक समान नहीं माना जा सकता। गृह मंत्रालय के अनुसार सुरक्षा खतरे के आकलन और लागू नियमों के आधार पर तय की जाती है।
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सबसे ऊंची सुरक्षा श्रेणियों में से एक है जेड प्लस
जेड प्लस देश की सबसे ऊंची सुरक्षा श्रेणियों में से एक है। इसमें प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी और कमांडो तैनात किए जा सकते हैं। इनकी संख्या तय नहीं होती बल्कि खतरे, कार्यक्रम और स्थान की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। सुरक्षा की प्रभावशीलता का आकलन केवल सुरक्षाकर्मियों की संख्या से नहीं किया जा सकता।

सुरक्षा आकलन से लेकर भीड़ प्रबंधन तक कई स्तर
किसी संरक्षित व्यक्ति की सुरक्षा में कार्यक्रम से पहले खतरे का आकलन, स्थल की जांच, आने-जाने के रास्तों की सुरक्षा, प्रवेश नियंत्रण, भीड़ प्रबंधन, स्थानीय पुलिस और खुफिया तंत्र के बीच तालमेल तथा आपात स्थिति से निपटने की तैयारी अहम होती है। धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या और सेवादारों की मौजूदगी के साथ धार्मिक मर्यादाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे में संरक्षित व्यक्ति को आम लोगों से पूरी तरह अलग रखना कठिन होता है।

सुखबीर जब धार्मिक सेवा या कार्यक्रम में श्रद्धालुओं के बीच होते हैं तो चुनौती और बढ़ जाती है। सुरक्षा घेरे को मजबूत रखने के साथ सामान्य आवाजाही और धार्मिक परंपराओं में बाधा न आए इसका भी ध्यान रखना होता है।

अमृतसर और नांदेड़ की घटनाओं की समीक्षा जरूरी
दोनों घटनाओं के बाद यह जांचना जरूरी है कि कार्यक्रम से पहले पर्याप्त सुरक्षा आकलन हुआ था या नहीं। स्थानीय पुलिस, सुरक्षा कर्मियों और खुफिया तंत्र में कितना तालमेल था तथा प्रवेश-निकास पर निगरानी कैसी थी इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए। भीड़ में संदिग्ध व्यक्ति की पहचान के लिए पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।

कई बार धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा कर्मी सादी वर्दी में भी तैनात किए जाते हैं। हालांकि इसे ‘ब्लू बुक’ का अनिवार्य नियम बताना उचित नहीं है। ऐसी तैनाती खतरे और स्थानीय सुरक्षा योजना के अनुसार तय हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कई स्तर की सुरक्षा के बावजूद हमलावर इतनी नजदीक कैसे पहुंचा। किस स्तर पर चूक हुई और संभावित खतरे की पहचान समय रहते क्यों नहीं हुई इसका जवाब जांच से ही सामने आएगा।

धार्मिक स्थलों पर चुनौती ज्यादा
धार्मिक स्थलों पर खुला परिसर, बड़ी संख्या में श्रद्धालु, सेवादारों की मौजूदगी और धार्मिक मर्यादा सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती होती है। सुरक्षा घेरे को मजबूत रखते हुए श्रद्धालुओं की सामान्य आवाजाही प्रभावित न हो इसका संतुलन जरूरी है। अमृतसर और नांदेड़ की घटनाओं के बाद सुरक्षा व्यवस्था की हर परत की समीक्षा जरूरी है।

पंथक नाराजगी के बीच भरोसे पर सवाल
करीब दो साल में सुखबीर पर यह दूसरा बड़ा हमला है। दिसंबर 2024 में श्री हरमंदिर साहिब के बाहर धार्मिक सजा के तहत सेवादार की भूमिका निभा रहे सुखबीर पर गोली चलाने की कोशिश हुई थी। पुलिसकर्मी की तत्परता से उनकी जान बची थी। दोनों घटनाओं के बाद सवाल है कि क्या सुखबीर के खिलाफ पंथक नाराजगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालांकि नांदेड़ की घटना को सीधे पंथक नाराजगी से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी।
 
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माफी और तनखइया के बाद भी पुराने सवाल
2024 में सुखबीर ने श्री अकाल तख्त साहिब के सामने राजनीतिक कार्यकाल की गलतियां स्वीकार की थीं। उन्हें तनखइया (धार्मिक सजा) घोषित किया गया और धार्मिक दंड के तहत सेवा के बाद उन्होंने माफी मांगी। उम्मीद थी कि इससे अकाली दल और पंथक मतदाताओं की दूरी कम होगी। इसके बावजूद बेअदबी, बहबल कलां-कोटकपूरा गोलीकांड, 2015 में गुरमीत राम रहीम को मिली विवादास्पद माफी, धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और जत्थेदारों की नियुक्ति जैसे सवाल कायम हैं।

2015 की बेअदबी के बाद बरगाड़ी सहित कई स्थानों पर विरोध हुआ। कोटकपूरा और बहबल कलां में पुलिस कार्रवाई हुई और बहबल कलां में दो प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। उस समय सुखबीर उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री थे। विशेष जांच दल ने कोटकपूरा मामले में सुखबीर सहित तत्कालीन सत्ता और पुलिस तंत्र के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। हालांकि इन्हें अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

चुनावी आंकड़े भी बता रहे भरोसे में कमी
2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 34.73 प्रतिशत वोट और 56 सीटें मिली थीं। 2017 में वोट शेयर 25.24 प्रतिशत और सीटें 15 रह गईं। 2022 में वोट शेयर 18.38 प्रतिशत और सीटें तीन रह गईं। 2024 लोकसभा चुनाव में वोट शेयर करीब 13.4 प्रतिशत रहा और पार्टी को एक सीट मिली। यानी 2012 से 2024 तक वोट शेयर में करीब 21 प्रतिशत अंक की गिरावट आई।
इसी चुनाव में अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब और सरबजीत सिंह खालसा ने फरीदकोट से निर्दलीय जीत दर्ज की। इसे पंथक मतदाताओं के अकाली दल से दूर होने के संकेत के तौर पर देखा गया हालांकि वोट को सीधे अकाली दल का पारंपरिक पंथक वोट मानना उचित नहीं होगा।

राजनीतिक माहिर प्रोफेसर कुणाल के अनुसार धार्मिक दंड पूरा होना और राजनीतिक भरोसा लौटना अलग बातें हैं। पंथक मतदाताओं के सामने बेअदबी में न्याय, गोलीकांड में जिम्मेदारी, धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और बंदी सिंहों जैसे सवाल हैं। नांदेड़ हमला पंथक नाराजगी का प्रमाण नहीं है लेकिन इससे सुखबीर की सुरक्षा और राजनीतिक आधार पर चर्चा तेज हुई है।

दो साल में दो हमले
दिसंबर 2024 में श्री हरमंदिर साहिब के बाहर सुखबीर पर गोली चलाने की कोशिश हुई थी। वह धार्मिक सजा के तहत सेवादार की भूमिका निभा रहे थे। पुलिसकर्मी की तत्परता से उनकी जान बची। अब नांदेड़ में कृपाण से हमला हुआ। दोनों घटनाएं धार्मिक स्थलों के आसपास हुईं। नांदेड़ हमले के पीछे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

पुराने मुद्दे अब भी कायम
बेअदबी, बहबल कलां-कोटकपूरा गोलीकांड, राम रहीम की माफी, धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, जत्थेदारों की नियुक्ति और बंदी सिंहों की रिहाई जैसे मुद्दे पंथक राजनीति में अब भी चर्चा में हैं। 2024 में सुखबीर ने श्री अकाल तख्त साहिब का आदेश मानकर धार्मिक दंड पूरा किया और माफी मांगी। इसके बावजूद राजनीतिक भरोसा पूरी तरह लौटा है या नहीं इस पर सवाल कायम हैं। आलोचक इन मुद्दों को अकाली दल के कमजोर होते पंथक आधार से जोड़ते रहे हैं।

नांदेड़ हमले ने बढ़ाई चिंता
सुखबीर बादल पर हमले की घटनाओं ने पंजाब की राजनीति में बढ़ती हिंसा और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।

2021 में नामांकन के दौरान काफिले पर हमला
फरवरी 2021 में फाजिल्का के जलालाबाद में नगर निकाय चुनाव के नामांकन के दौरान अकाली दल और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़प हुई थी। पार्टी उम्मीदवारों का नामांकन करवाने पहुंचे सुखबीर के काफिले पर पथराव हुआ और गोली चलने की भी बात सामने आई थी। वह बाल-बाल बचे थे।

2024 में अमृतसर में चली थी गोली
4 दिसंबर 2024 को श्री हरमंदिर साहिब के बाहर सेवादार की ड्यूटी कर रहे सुखबीर पर नारायण सिंह चौड़ा ने कथित तौर पर गोली चलाई थी। गोली उन्हें नहीं लगी और दीवार में जा लगी। इस घटना को उनकी सुरक्षा में गंभीर चूक माना गया था। नांदेड़ की घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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