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Ajmer News: रूसी योगिनी अन्नपूर्णा नाथ की पुष्कर में कठिन अग्नि साधना, नौ धूणियों के बीच रोज सवा तीन घंटे तप

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर Published by: अजमेर ब्यूरो Updated Thu, 07 May 2026 08:55 PM IST
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सार

Ajmer News: पुष्कर में रूसी मूल की योगिनी अन्नपूर्णा नाथ नौ धूणियों के बीच कठिन अग्नि तपस्या कर रही हैं। नाथ संप्रदाय की यह साधना 25 मई तक चलेगी, जिसमें विश्व शांति, जनकल्याण और शिव भक्ति के उद्देश्य से प्रतिदिन सवा तीन घंटे तप किया जा रहा है।

Ajmer News: Russian Yogini Annapurna Nath Performs Rigorous Fire Austerity Amidst Nine Sacred Fires in Pushkar
धधकती धूणियों के बीच तप करतीं रूसी योगिनी अन्नपूर्णा नाथ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अजमेर जिले के तीर्थराज पुष्कर की पवित्र भूमि इन दिनों एक अद्भुत आध्यात्मिक साधना की साक्षी बनी हुई है। छोटी बस्ती स्थित श्मशान स्थल में अघोरी सीताराम बाबा के आश्रम पर नाथ संप्रदाय की प्राचीन “नौ धूणी अग्नि तपस्या” जारी है। धधकती आग, चारों ओर उठती लपटें, भस्म से लिपटे साधक और शिव मंत्रों की गूंज पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर रही है।

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इस कठिन साधना का केंद्र बनी हैं रूसी मूल की साध्वी योगिनी अन्नपूर्णा नाथ, जो नौ धूणियों के बीच बैठकर प्रतिदिन सवा तीन घंटे तक शिव साधना और गुरु बीज मंत्र का जाप कर रही हैं। उनके साथ गुरु बाल योगी दीपक नाथ भी तपस्या में लीन हैं। यह साधना 3 मई से शुरू हुई है और 25 मई तक चलेगी।

धधकती धूणियों के बीच तप
 
धधकती अग्नि के बीच साधना का कठिन क्रम
रोजाना सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजकर 15 मिनट तक दोनों साधक अग्नि की तेज तपिश के बीच बैठते हैं। धूणियों को गोबर के कंडों से जलाया जाता है और हर दिन इनकी संख्या बढ़ाई जाती है। शुरुआत 21 कंडों से हुई थी, जबकि अंतिम दिन 108 कंडों से धूणियां प्रज्ज्वलित की जाएंगी। वर्तमान में प्रत्येक धूणी पर करीब 40 कंडे लगाए जा रहे हैं।
 
तपस्या के दौरान साधक अपने शरीर पर गौमय भस्म का लेप करते हैं। धूणियों के बीच लगभग 3 से 4 फीट की दूरी रखी गई है, जिससे अग्नि का ताप और अधिक तीव्र हो जाता है। पूरे क्षेत्र में हवन की सुगंध, धुएं के बीच गूंजते मंत्र और साधकों की एकाग्रता श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति करा रही है।

धधकती धूणियों के बीच तप
 
‘सिद्धि तपस्या का परिणाम है’
योगिनी अन्नपूर्णा नाथ का कहना है कि तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मशक्ति और साधना का मार्ग है। उनके अनुसार सिद्धि स्वयं तपस्या का परिणाम होती है। उन्होंने कहा कि संतों की साधना केवल व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं होती, बल्कि समाज, नगर और विश्व के कल्याण के उद्देश्य से भी की जाती है। इसी भावना के साथ वे यह कठिन अग्नि तप कर रही हैं।
 
नाथ संप्रदाय की प्राचीन परंपरा
गुरु बाल योगी दीपक नाथ ने बताया कि “नौ धूणी अग्नि तपस्या” नाथ संप्रदाय की सदियों पुरानी परंपरा है। उन्होंने कहा कि संत-महात्मा अनादि काल से इस प्रकार की साधना करते आ रहे हैं। देश के हरियाणा, जयपुर, जोधपुर, सिरोही और उज्जैन सहित कई स्थानों पर संत इसी तरह की तपस्याएं कर रहे हैं।

धधकती धूणियों के बीच तप
 
उन्होंने बताया कि कुछ संत 21 धूणी, कुछ 108 और कुछ 1100 धूणी तक की साधना करते हैं। उनके अनुसार यह परंपरा यज्ञ की तरह ही मानी जाती है। जैसे पंडित यज्ञ करते हैं, वैसे ही संत धूणी तपस्या करते हैं।
 
दीपक नाथ ने कहा कि इस तपस्या का उद्देश्य विश्व शांति, जनकल्याण और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है। उन्होंने कहा कि दर्शन करने वाला प्रत्येक श्रद्धालु पुण्य का भागी बनता है।

धधकती धूणियों के बीच तप
 
रूस से भारत तक की आध्यात्मिक यात्रा
योगिनी अन्नपूर्णा नाथ की आध्यात्मिक यात्रा भी काफी रोचक रही है। उनका जन्म तत्कालीन सोवियत संघ में हुआ था और उनका पालन-पोषण कजाकिस्तान में हुआ। करीब 17 वर्ष पहले वे भारत आई थीं। भारतीय संस्कृति, योग और सनातन परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने लगभग 10 वर्ष पहले नाथ संप्रदाय के योगियों से दीक्षा ली और सांसारिक जीवन त्यागकर साधना का मार्ग अपना लिया।

पढ़ें- Op Sindoor: 'भारत आतंक से लड़ने को तैयार, LoC के पार कोई ठिकाना सुरक्षित नहीं', लेफ्टिनेंट जनरल की दो टूक
 
वर्तमान में उनके पास रूसी नागरिकता है और वे टूरिस्ट वीजा पर भारत में रहती हैं। वीजा अवधि पूरी होने पर वे दूसरे देश जाकर पुनः भारत लौट आती हैं। अगस्त 2025 में वे नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन कर लौटी थीं। हाल ही में उन्होंने पुष्कर सरोवर के किनारे लगातार 9 दिनों तक खड़े रहकर भी कठिन तपस्या की थी।

धधकती धूणियों के बीच तप
 
52 शक्तिपीठों की यात्रा पर हैं योगिनी
योगिनी अन्नपूर्णा नाथ इस समय 52 शक्तिपीठों की यात्रा पर हैं। अब तक वे 35 शक्तिपीठों के दर्शन कर चुकी हैं। हालांकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में स्थित कुछ शक्तिपीठों तक वे फिलहाल नहीं पहुंच सकी हैं। उनका कहना है कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा और सनातन संस्कृति ने उन्हें भीतर से बदल दिया है। अब उनका जीवन पूरी तरह साधना, सेवा और शिव भक्ति को समर्पित है।
 
25 मई को होगा पूर्णाहुति कार्यक्रम
इस तपस्या के समापन पर 25 मई को पूर्णाहुति, हवन और संत भंडारे का आयोजन किया जाएगा। तब तक पुष्कर का यह श्मशान स्थल धधकती धूणियों, शिव मंत्रों और साधना की ऊर्जा से जीवंत बना रहेगा।

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