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निकाय-पंचायत चुनाव से पहले 6 मोर्चों पर घिरी भजनलाल सरकार; छात्र आंदोलनों से लेकर UGC विवाद तक बढ़ा दबाव
Wed, 05 Aug 2026 05:01 PM IST
Sourabh Bhatt
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Wed, 05 Aug 2026 05:01 PM IST
सार
राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव से पहले भजनलाल सरकार छात्र आंदोलन, यूजीसी विवाद, कर्मचारी असंतोष, प्रसूताओं की मौत, शिक्षा तबादला विवाद और भाजपा के अंदरूनी मतभेदों समेत छह मोर्चों पर घिरी नजर आ रही है।
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बीजेपी मुख्यालय, जयपुर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों का बिगुल बज चुका है, लेकिन चुनावी मैदान में उतरने से पहले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार एक साथ कई राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों से घिरी दिखाई दे रही है। यूजीसी रेगुलेशन-2026 के विरोध में चल रहा सवर्ण आंदोलन, छात्रसंघ चुनावों की बहाली की मांग, कर्मचारी संगठनों की नाराजगी, सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत, शिक्षा विभाग में तबादलों का विवाद और भाजपा के भीतर उभरता असंतोष विपक्ष को सरकार पर लगातार हमले का मौका दे रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि जहां कांग्रेस इन मुद्दों पर लगातार आक्रामक नजर आ रही है, वहीं भाजपा के कई बड़े नेता विवादित घटनाओं से दूरी बनाए हुए दिखाई दिए हैं।
1. UGC रेगुलेशन पर सवर्णों की नाराजगी
राजस्थान में UGC Regulations-2026 के विरोध में उठा सवर्ण आंदोलन सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है। जयपुर में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, एक प्रदर्शनकारी की मौत के बाद आंदोलन और तेज हो गया। प्रदर्शन के दौरान भाजपा के खिलाफ "कमल का फूल, हमारी भूल" जैसे नारे लगे और चुनाव में भाजपा का विरोध करने की चेतावनी दी गई। राजनीतिक रूप से यह इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आंदोलन से जुड़े कई संगठन भाजपा के पारंपरिक समर्थक सामाजिक वर्गों से जुड़े माने जाते हैं। विपक्ष इसे भाजपा के कोर वोट बैंक में बढ़ती नाराजगी के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।
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2. छात्रसंघ चुनाव और छात्र आंदोलन
प्रदेशभर में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर आंदोलन तेज है। हाल के GEN-Z आंदोलन के बाद सरकार पहले ही युवाओं के मुद्दों पर आलोचना झेल चुकी है। अब छात्र नेता शुभम रेवाड़ का आमरण अनशन राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। रेवाड़ पिछले 15 दिनों से राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र स्थापित करने और छात्रसंघ चुनाव बहाल करने जैसी मांगों को लेकर अनशन पर हैं। स्वास्थ्य बिगड़ने पर प्रशासन ने उन्हें एसएमएस अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन भाजपा का कोई बड़ा नेता उनसे मिलने नहीं पहुंचा। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अस्पताल पहुंचकर उनसे मिले और उन्हें पानी पिलाकर अनशन समाप्त कराया। कांग्रेस इसे सरकार की संवेदनहीनता का मुद्दा बना रही है।
3. कर्मचारी संगठनों में बढ़ता असंतोष
सरकार को कर्मचारी संगठनों के बढ़ते असंतोष का भी सामना करना पड़ रहा है। मंत्रालयिक कर्मचारी, पटवारी, रोडवेज कर्मचारी, बिजली कर्मचारी, संविदाकर्मी, बेरोजगार संगठन, चिकित्सा और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारी लगातार अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। अब राजस्थान राज्य कर्मचारी संघ ने भी पदोन्नति, ग्रेड-पे और सेवा पुनर्गठन की मांग को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन और विभागवार गेट मीटिंग का ऐलान कर दिया है। शिक्षा विभाग, जो प्रदेश का सबसे बड़ा कर्मचारी कैडर है, वहां भी व्यावसायिक शिक्षकों का आंदोलन जारी है। चुनावी वर्ष में कर्मचारियों की नाराजगी सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकती है।
4. भाजपा के भीतर बढ़ता अंतर्विरोध
निकाय और पंचायत चुनावों की तैयारियों के बीच भाजपा संगठन को भी अंदरूनी असंतोष का सामना करना पड़ा। संभागीय चुनाव संचालन समितियों की पहली सूची जारी होने के बाद गृह जिला और गृह संभाग में नेताओं को चुनाव प्रभारी बनाए जाने पर सवाल उठे। संगठन के भीतर विरोध बढ़ने पर पार्टी को कई नेताओं की जिम्मेदारियां बदलनी पड़ीं। राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनाव से पहले संगठनात्मक असहजता के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
5. प्रसूताओं की मौत और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं और नवजातों की मौत के मामलों ने भी सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। चिकित्सा व्यवस्था, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, रेफरल सिस्टम और अस्पतालों में संसाधनों के अभाव को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में जांच के आदेश दिए गए हैं, लेकिन कांग्रेस इसे स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता बताते हुए सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा रही है। चुनावी माहौल में यह मुद्दा सरकार की छवि पर असर डाल सकता है।
6. शिक्षा विभाग में तबादलों पर विवाद
शिक्षा विभाग में तबादलों को लेकर भी सरकार विवादों में रही। भाजपा संगठन के भीतर ही कई कार्यकर्ताओं ने शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की कार्यशैली को लेकर प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ से शिकायत की। इसके बाद प्रदेशाध्यक्ष ने दिलावर को भाजपा कार्यालय बुलाया, लेकिन उनके नहीं पहुंचने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में रही। तबादला प्रक्रिया में पारदर्शिता और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का एक और मुद्दा दे दिया है।
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1. UGC रेगुलेशन पर सवर्णों की नाराजगी
राजस्थान में UGC Regulations-2026 के विरोध में उठा सवर्ण आंदोलन सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है। जयपुर में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, एक प्रदर्शनकारी की मौत के बाद आंदोलन और तेज हो गया। प्रदर्शन के दौरान भाजपा के खिलाफ "कमल का फूल, हमारी भूल" जैसे नारे लगे और चुनाव में भाजपा का विरोध करने की चेतावनी दी गई। राजनीतिक रूप से यह इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आंदोलन से जुड़े कई संगठन भाजपा के पारंपरिक समर्थक सामाजिक वर्गों से जुड़े माने जाते हैं। विपक्ष इसे भाजपा के कोर वोट बैंक में बढ़ती नाराजगी के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।
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2. छात्रसंघ चुनाव और छात्र आंदोलन
प्रदेशभर में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर आंदोलन तेज है। हाल के GEN-Z आंदोलन के बाद सरकार पहले ही युवाओं के मुद्दों पर आलोचना झेल चुकी है। अब छात्र नेता शुभम रेवाड़ का आमरण अनशन राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। रेवाड़ पिछले 15 दिनों से राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र स्थापित करने और छात्रसंघ चुनाव बहाल करने जैसी मांगों को लेकर अनशन पर हैं। स्वास्थ्य बिगड़ने पर प्रशासन ने उन्हें एसएमएस अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन भाजपा का कोई बड़ा नेता उनसे मिलने नहीं पहुंचा। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अस्पताल पहुंचकर उनसे मिले और उन्हें पानी पिलाकर अनशन समाप्त कराया। कांग्रेस इसे सरकार की संवेदनहीनता का मुद्दा बना रही है।
3. कर्मचारी संगठनों में बढ़ता असंतोष
सरकार को कर्मचारी संगठनों के बढ़ते असंतोष का भी सामना करना पड़ रहा है। मंत्रालयिक कर्मचारी, पटवारी, रोडवेज कर्मचारी, बिजली कर्मचारी, संविदाकर्मी, बेरोजगार संगठन, चिकित्सा और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारी लगातार अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। अब राजस्थान राज्य कर्मचारी संघ ने भी पदोन्नति, ग्रेड-पे और सेवा पुनर्गठन की मांग को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन और विभागवार गेट मीटिंग का ऐलान कर दिया है। शिक्षा विभाग, जो प्रदेश का सबसे बड़ा कर्मचारी कैडर है, वहां भी व्यावसायिक शिक्षकों का आंदोलन जारी है। चुनावी वर्ष में कर्मचारियों की नाराजगी सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकती है।
4. भाजपा के भीतर बढ़ता अंतर्विरोध
निकाय और पंचायत चुनावों की तैयारियों के बीच भाजपा संगठन को भी अंदरूनी असंतोष का सामना करना पड़ा। संभागीय चुनाव संचालन समितियों की पहली सूची जारी होने के बाद गृह जिला और गृह संभाग में नेताओं को चुनाव प्रभारी बनाए जाने पर सवाल उठे। संगठन के भीतर विरोध बढ़ने पर पार्टी को कई नेताओं की जिम्मेदारियां बदलनी पड़ीं। राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनाव से पहले संगठनात्मक असहजता के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
5. प्रसूताओं की मौत और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं और नवजातों की मौत के मामलों ने भी सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। चिकित्सा व्यवस्था, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, रेफरल सिस्टम और अस्पतालों में संसाधनों के अभाव को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में जांच के आदेश दिए गए हैं, लेकिन कांग्रेस इसे स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता बताते हुए सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा रही है। चुनावी माहौल में यह मुद्दा सरकार की छवि पर असर डाल सकता है।
6. शिक्षा विभाग में तबादलों पर विवाद
शिक्षा विभाग में तबादलों को लेकर भी सरकार विवादों में रही। भाजपा संगठन के भीतर ही कई कार्यकर्ताओं ने शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की कार्यशैली को लेकर प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ से शिकायत की। इसके बाद प्रदेशाध्यक्ष ने दिलावर को भाजपा कार्यालय बुलाया, लेकिन उनके नहीं पहुंचने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में रही। तबादला प्रक्रिया में पारदर्शिता और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का एक और मुद्दा दे दिया है।