Rajasthan Health News:सावधान! कबूतरों से सांसों पर खतरा, जयपुर में बढ़ी फेफड़ों की बीमारी
Rajasthan Health News: जयपुर में कबूतरों और अन्य पक्षियों के लगातार संपर्क से फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। सवाई मानसिंह अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार कबूतरों के मल और पंखों में मौजूद सूक्ष्म कण फेफड़ों तक पहुंचकर इंटरस्टिशियल लंग डिजीज़ का कारण बन सकते हैं। शुरुआती लक्षणों में खांसी और सांस फूलना शामिल है। समय पर इलाज न मिलने पर बीमारी जानलेवा हो सकती है।
विस्तार
Rajasthan Health News: जयपुर में पक्षियों के लगातार संपर्क में रहने से फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, खासकर कबूतरों के संपर्क में आने से इंटरस्टिशियल लंग डिजीज यानी ILD का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। सवाई मानसिंह अस्पताल सहित शहर के अन्य अस्पतालों में सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एसएमएस अस्पताल के मेडिसिन विभाग के चिकित्सक डॉ. मनोज शर्मा का कहना है कि कबूतरों और अन्य पक्षियों के मल व पंखों में मौजूद सूक्ष्म और खतरनाक कण हवा के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे एलर्जी और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों को स्थायी नुकसान होने का खतरा रहता है।
डॉ. शर्मा के अनुसार बीमारी के शुरुआती चरण में मरीजों को खांसी और सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जिन्हें आमतौर पर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने पर बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और कई मामलों में मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत तक पड़ जाती है, यहां तक कि जान जाने का खतरा भी बना रहता है।
लंग डिजीज के मामले बढ़े
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन इलाकों में कबूतर चौक बने हुए हैं या जहां कबूतरों की संख्या अधिक है, वहां रहने वाले लोगों में सांस की समस्या, लगातार खांसी और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। सूखे मल और पंखों में मौजूद कण हवा के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचकर सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। खासतौर पर बुजुर्गों, बच्चों, कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों और पहले से फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए यह खतरा और बढ़ जाता है। वहीं जिन घरों की छत, बालकनी या कमरों में कबूतरों ने बसेरा बना रखा है, कबूतर पालने वाले लोग और नियमित रूप से कबूतरों की बीट साफ करने वाले सफाई कर्मी भी उच्च जोखिम में हैं।
डॉक्टरों ने लोगों को सलाह दी है कि वे सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने से बचें और घरों व दफ्तरों में कबूतरों को बैठने न दें। कबूतरों की बीट की सफाई करते समय मास्क और दस्ताने का उपयोग करना जरूरी है और हमेशा गीली सफाई करें ताकि धूल न उड़े। यदि किसी व्यक्ति में सांस फूलना, लगातार खांसी या सीने में जकड़न जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
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