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Rajasthan: सीमा जाखड़ केस में राजस्थान सरकार को हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, कहा- 'जमानत रद्द करना इतना आसान नहीं'

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: जयपुर ब्यूरो Updated Tue, 19 May 2026 08:59 AM IST
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सार

Rajasthan: राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट से जुड़े भ्रष्टाचार और जांच में हेरफेर मामले में आरोपी तत्कालीन SHO सीमा जाखड़ की जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल गंभीर आरोपों के आधार पर जमानत रद्द नहीं की जा सकती, जब तक जमानत के दुरुपयोग के ठोस प्रमाण न हों। साथ ही राज्य सरकार की अर्जी को भ्रामक और मेरिट रहित बताते हुए फटकार भी लगाई।

Rajasthan High Court Refuses to Cancel Bail of SHO Seema Jakhar in NDPS Bribery Case
राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट से जुड़े बहुचर्चित भ्रष्टाचार और जांच में हेरफेर मामले में आरोपी तत्कालीन SHO सीमा जाखड़ की जमानत रद्द करने से इनकार करते हुए राज्य सरकार की अर्जी खारिज कर दी। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने स्पष्ट कहा कि केवल गंभीर आरोपों के आधार पर पहले से दी गई जमानत को निरस्त नहीं किया जा सकता, जब तक आरोपी द्वारा जमानत का दुरुपयोग साबित न हो।



141 किलो डोडा पोस्त बरामदगी से जुड़ा है मामला
मामला सिरोही जिले के बरलूट थाना क्षेत्र में दर्ज FIR नंबर 143/2021 से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 14 नवंबर 2021 को पुलिस ने कार में जा रहे दो आरोपियों के कब्जे से 141 किलो डोडा पोस्त बरामद किया था। आरोप लगाया गया कि तत्कालीन SHO सीमा जाखड़ ने सह-आरोपियों से कथित रूप से 10 लाख रुपये की रिश्वत लेकर कार्रवाई को कमजोर किया और पुलिस रिकॉर्ड में हेरफेर कर यह दर्शाया कि आरोपी मौके से फरार हो गए थे।
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सरकार ने जमानत रद्द करने की रखी मांग
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दायर जमानत निरस्तीकरण आवेदन में तर्क दिया कि 20 जुलाई 2022 को दी गई जमानत में मामले की गंभीरता का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया। सरकार ने कहा कि आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट की धारा 8/15, 29, 27A और 59 जैसे गंभीर अपराध बनते हैं, इसलिए जमानत आदेश वापस लिया जाना चाहिए।
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बचाव पक्ष ने कोर्ट में क्या कहा?
वहीं सीमा जाखड़ की ओर से अधिवक्ता धीरेन्द्र सिंह और प्रियंका बोराणा ने अदालत को बताया कि आरोपी लगभग चार वर्षों से जमानत पर हैं और इस दौरान उन्होंने किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया। बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी एक महिला और सरकारी कर्मचारी हैं। उनके फरार होने या जांच प्रभावित करने की कोई आशंका नहीं है। साथ ही कथित रिश्वत राशि की कोई बरामदगी भी नहीं हुई है।

हाईकोर्ट ने बताई जमानत रद्द करने की शर्तें
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 'जमानत रद्द करना' और 'गलत जमानत आदेश को निरस्त करना' दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही रद्द की जा सकती है, जैसे गवाहों को प्रभावित करना, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करना, जांच में बाधा डालना या फरार होने की कोशिश करना।

अदालत ने सरकार को लगाई फटकार
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का आवेदन मूल रूप से पुराने जमानत आदेश की समीक्षा जैसा था, जबकि समन्वय पीठ के आदेश पर उसी अदालत द्वारा अपीलीय पुनर्विचार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि भारतीय न्यायशास्त्र में “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है।

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महिला आरोपी को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
महिला आरोपी के संदर्भ में अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को जमानत मामलों में उदार दृष्टिकोण देने का प्रावधान है। अंत में कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि इस प्रकार की अर्जी दाखिल करने से पहले उचित कानूनी सलाह ली जानी चाहिए थी। अदालत ने आवेदन को “भ्रामक”, “गलत अवधारणा पर आधारित” और “मेरिट रहित” बताते हुए खारिज कर दिया।

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