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नागौर की सियासत में उबाल: मिर्धा परिवार की नाराजगी से बदले समीकरण, क्या बेनीवाल-भाजपा गठबंधन की बनेगी राह?

Sun, 08 Mar 2026 06:25 PM IST
Ashutosh Pratap Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागौर Published by: Ashutosh Pratap Singh Updated Sun, 08 Mar 2026 06:25 PM IST
सार

राजस्थान की राजनीति में अहम माने जाने वाले नागौर जिले में इन दिनों सियासी हलचल तेज हो गई है। यहां की राजनीति लंबे समय से हनुमान बेनीवाल, मिर्धा परिवार और यूनुस खान जैसे प्रभावशाली नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 

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हनुमान बेनीवाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान की राजनीति में नागौर जिला हमेशा से खास महत्व रखता रहा है। यहां की राजनीति मुख्य रूप से तीन बड़े राजनीतिक परिवारों—हनुमान बेनीवाल, मिर्धा परिवार और यूनुस खान—के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इन तीनों नेताओं की राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव के कारण नागौर को प्रदेश की सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रयोगशालाओं में गिना जाता है।

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नागौर जिले में कुल दस विधानसभा सीटें हैं। इनमें से पांच सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, चार सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है, जबकि एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार यूनुस खान जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले मिर्धा परिवार ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मिर्धा परिवार के इस कदम से भाजपा को नागौर में बड़ा फायदा मिला और पार्टी की स्थिति पहले से मजबूत हुई।

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इससे पहले जब वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा की सरकार हुआ करती थी, तब यूनुस खान का भी नागौर में मजबूत प्रभाव माना जाता था। इसके बावजूद भाजपा को नागौर में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती थी और कांग्रेस का अच्छा-खासा वर्चस्व बना रहता था। मिर्धा परिवार के भाजपा में आने के बाद समीकरण बदले और नागौर की राजनीति में भाजपा की स्थिति मजबूत दिखाई देने लगी। साथ ही हनुमान बेनीवाल को सीधी टक्कर देने वाले नेताओं में मिर्धा परिवार को प्रमुख रूप से देखा जाने लगा।

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हालांकि हाल ही में विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान हुई एक घटना ने नागौर की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। भाजपा के डेगाना विधायक अजय सिंह किलक द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने वर्ष 2019 से 2023 के बीच विधायक रहे विजयपाल सिंह मिर्धा का नाम लिए बिना भ्रष्टाचार में विधायक की संलिप्तता की बात कही। इस बयान को मिर्धा परिवार से जोड़कर देखा गया, जिससे उनके समर्थकों और परिवार में नाराजगी देखने को मिली।

इसका जवाब भी जल्द ही सामने आ गया। घटना के करीब एक घंटे के भीतर ही रिछपाल मिर्धा और विजयपाल मिर्धा विधानसभा पहुंचे और उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि यदि बिना जांच के आरोप लगाए गए हैं तो ऐसे बयान को विधानसभा की कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया जाए।

इस घटनाक्रम के बाद नागौर में भाजपा की स्थिति को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। यदि मिर्धा परिवार भाजपा से नाराज होकर दूरी बना लेता है या पार्टी का साथ छोड़ देता है, तो नागौर में भाजपा की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में यह भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भविष्य में हनुमान बेनीवाल और भाजपा के बीच किसी प्रकार का गठबंधन संभव हो सकता है।

हाल ही में हुए उपचुनाव में हनुमान बेनीवाल को अपनी ही खींवसर विधानसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस हार के पीछे मिर्धा परिवार की मजबूत चुनौती एक बड़ा कारण रही। लंबे समय से हनुमान बेनीवाल की सीधी राजनीतिक टक्कर वसुंधरा राजे से मानी जाती रही है, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।

ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बेनीवाल भविष्य में भाजपा के साथ फिर से गठबंधन कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो नागौर में भाजपा को नई राजनीतिक मजबूती मिल सकती है, वहीं बेनीवाल के लिए भी यह रणनीतिक रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।

साथ ही यह भी देखना दिलचस्प होगा कि मिर्धा परिवार आने वाले समय में क्या राजनीतिक रुख अपनाता है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी संभावना जता रहे हैं कि यदि सम्मान और राजनीतिक महत्व को लेकर असंतोष बढ़ता है तो मिर्धा परिवार कांग्रेस में वापसी का रास्ता भी चुन सकता है।

अगर ऐसा हुआ तो इसका असर सिर्फ नागौर ही नहीं बल्कि पूरे जाट बहुल क्षेत्रों और लगभग 80 विधानसभा सीटों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में नागौर की यह सियासी हलचल आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति को नया मोड़ दे सकती है।

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