आंदोलनों की राजनीति में घिरी सरकार; सड़क पर अन्नदाता, छात्र और विपक्ष, अब पानी और किसान बनेंगे बड़ा मुद्दा
राजस्थान में सड़क की राजनीति फिर से उबाल पर है। छात्र आंदोलन, किसान विरोध, कर्मचारी नाराजगी और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच आने वाले दिनों में पानी और सिंचाई संकट सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
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राजस्थान इस समय आंदोलनों के दौर से गुजर रहा है। छात्र, किसान, कर्मचारी, क्षेत्रीय संगठन और विपक्षी दल अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। NEET पेपर लीक, MSP, जमीन अधिग्रहण, नहरी पानी, बिजली संकट और क्षेत्रीय मांगों को लेकर राज्य के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में गर्मी और सिंचाई सीजन बढ़ने के साथ पानी का मुद्दा सबसे बड़ा आंदोलनकारी विषय बन सकता है।
NEET पेपर लीक बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
राजस्थान में इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन NEET पेपर लीक को लेकर देखने को मिल रहा है। कांग्रेस लगातार भाजपा सरकार और केंद्र सरकार को घेर रही है। जयपुर में भाजपा मुख्यालय के सामने प्रदर्शन और छात्र संगठनों के विरोध ने इस मुद्दे को बड़ा राजनीतिक रूप दे दिया है।
MSP और जमीन अधिग्रहण पर किसान नाराज
दूसरी ओर किसान संगठन MSP, जमीन अधिग्रहण और सिंचाई पानी को लेकर लगातार सक्रिय हैं। चना MSP को लेकर किसानों में नाराजगी है। भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत जमीन अधिग्रहण को लेकर करौली, दौसा, भरतपुर, सीकर, जयपुर और अजमेर क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
बाड़मेर में भाटी का आंदोलन चर्चा में
बाड़मेर क्षेत्र में स्थानीय मुद्दों को लेकर निर्दलीय सांसद रविंद्र सिंह भाटी के नेतृत्व में आंदोलन लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आंदोलन ने पश्चिमी राजस्थान की राजनीति को नया मोड़ दिया है।
राजस्थान में जून से खरीफ सीजन शुरू होने के साथ ही नहरी पानी को लेकर आंदोलन तेज होने की आशंका बढ़ रही है। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान के कई इलाके इंदिरा गांधी नहर परियोजना पर निर्भर हैं। कपास, मूंग, ग्वार और अन्य फसलों की बुआई के समय पानी की मांग अचानक बढ़ जाती है।
इसी के चलते सरदारशहर, बीकानेर और इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में किसान संगठन अभी से पानी संकट को लेकर धरना-प्रदर्शन और आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। कई जगह किसान सभाओं ने चक्काजाम और महापड़ाव की रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि जून-जुलाई में पानी आपूर्ति प्रभावित हुई तो पश्चिमी राजस्थान में बड़े किसान आंदोलन खड़े हो सकते हैं। इससे पहले भी श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में पंजाब से पानी छोड़ने के मुद्दे पर किसान सड़क पर उतर चुके हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के हालिया किसान संबंधी बयान ने भी राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। विपक्ष और किसान संगठनों ने इसे किसानों की मेहनत का अपमान बताते हुए सरकार पर हमला बोला।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राजस्थान में किसान केवल खेती नहीं करता, बल्कि खाद, बीज, बिजली, पानी, MSP और जमीन बचाने के संघर्ष में सालभर लगा रहता है। यही कारण है कि यहां किसान आंदोलन मौसमी नहीं बल्कि स्थायी राजनीतिक प्रवृत्ति बन चुके हैं।
राजस्थान की राजनीति में आंदोलनों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। शेखावाटी किसान आंदोलन से लेकर गुर्जर आरक्षण आंदोलन, कर्मचारी हड़ताल, किसान संघर्ष और छात्र आंदोलनों तक कई बार सड़क की राजनीति ने सत्ता का गणित बदला है।
घड़साना आंदोलन आज भी बड़ा संदर्भ
वसुंधरा राजे सरकार के समय 2004 से 2006 के बीच श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर क्षेत्रों में नहरी पानी और कृषि संकट को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ था। घड़साना, रावला और खाजूवाला इसके केंद्र बने। पुलिस फायरिंग में 7 किसानों की मौत हुई और आंदोलन लंबे समय तक चला। आज भी पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में घड़साना आंदोलन बड़ा संदर्भ माना जाता है।
कर्मचारी आंदोलन ने बदली थी सियासत
अशोक गहलोत सरकार के पहले कार्यकाल में कर्मचारियों की लंबी हड़ताल ने सरकार को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था। करीब 64 दिन चली हड़ताल के दौरान नो वर्क-नो पे नीति लागू हुई, जिससे लाखों कर्मचारियों में नाराजगी फैल गई। बाद में खुद अशोक गहलोत भी मान चुके हैं कि कर्मचारियों की नाराजगी चुनावी हार का बड़ा कारण बनी थी।
भजनलाल सरकार के कार्यकाल में खेजड़ी बचाओ आंदोलन और अरावली संरक्षण आंदोलन दो बड़े जनआंदोलन के रूप में सामने आए। खेजड़ी आंदोलन में बिश्नोई समाज, संत समाज और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए। आखिरकार सरकार को जोधपुर और बीकानेर संभाग में खेजड़ी कटाई पर रोक लगाने की घोषणा करनी पड़ी।
वहीं अरावली क्षेत्र में खनन और पेड़ों की कटाई के विरोध में पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने आंदोलन छेड़ा। बढ़ते दबाव के बाद अरावली क्षेत्र में खनन पट्टों पर रोक लगानी पड़ी।
इनका कहना है
कर्मचारी दुखी हैं। आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं। आरजीएचएस योजना को सरकार बंद कर रही है, हमें सरेंडर लीव का पैसा भी नहीं मिल रहा। बिल पास पड़े हैं लेकिन पैसा नहीं है। मुख्यमंत्री ने मंत्रालयिक कर्मचारियों को लेकर जो घोषणाएं की थीं उन्हें भी पूरा नहीं किया गया।
-मनोज सक्सेना - राजस्थान राज्य मंत्रालयिक कर्मचारी महासंघ
किसानों को सरकार द्वारा घोषित सहायता प्राप्त करने के लिए, एमएसपी प्राप्त करने किए जमीन बचाने के लिए निरंतर कमाई छोड़ लड़ाई करनी पड़ रही है। ये दुर्भाग्य है। सरकार की नीतियां किसान के पक्ष में नहीं है।
-किसान महापंचात- राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट