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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   High Court orders a halt to frequent transfers of Class I officers and directs that a minimum tenure be fixed.

Himachal: प्रथम श्रेणी अधिकारियों के बार-बार तबादले पर रोक, हाईकोर्ट ने न्यूनतम कार्यकाल तय करने को कहा

Thu, 20 Aug 2026 05:30 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 20 Aug 2026 05:30 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के बार-बार और असमय तबादलों पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि क्लास वन अधिकारियों का भी निश्चित और तर्कसंगत कार्यकाल होना जरूरी है। 

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High Court orders a halt to frequent transfers of Class I officers and directs that a minimum tenure be fixed.
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के बार-बार और असमय तबादलों पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि क्लास वन अधिकारियों का भी निश्चित और तर्कसंगत कार्यकाल होना जरूरी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता भबनेश चड्डा के तबादला आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार को प्रथम श्रेणी अधिकारियों के लिए भी न्यूनतम कार्यकाल की नीति तय करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल क्लास वन अधिकारी होने का यह अर्थ नहीं है कि विभाग उनका बार-बार तबादला करता रहे। 

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तबादला आदेश रद्द, ढाई से तीन साल का कार्यकाल देने के निर्देश
ऐसे अधिकारियों को भी किसी एक स्थान पर कम से कम उचित कार्यकाल पूरा करने का अधिकार है। राज्य सरकार को प्रथम श्रेणी अधिकारियों के लिए न्यूनतम कार्यकाल की समय-सीमा निर्धारित करनी चाहिए, ताकि एक स्टेशन पर तर्कसंगत कार्यकाल को लेकर स्पष्ट और निष्पक्ष दिशा-निर्देश मौजूद रहें। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 1 जुलाई 2026 को जारी तबादला आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उनके वर्तमान स्टेशन बालीचौकी में कम से कम ढाई से तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने दिया जाए। इसके बाद ही प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार उनके तबादले को लेकर निर्णय लिया जाए। अदालत ने कहा कि अधिकारियों के बार-बार तबादलों से प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने के साथ अधिकारियों को भी अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसलिए प्रथम श्रेणी अधिकारियों के लिए भी न्यूनतम कार्यकाल की स्पष्ट नीति होना जरूरी है।
 

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तय किए गए मामलों में बार-बार अपील दायर करने पर हाईकोर्ट ने सरकार पर लगाया 25 हजार का जुर्माना
 प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से अदालती मामलों में अपनाई जा रही टालमटोल और पहले से तय मामलों में भी बार-बार अपील दायर करने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के हक में फैसला सुनाते हुए सरकार की अपील को 25 हजार रुपयेए के अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सरकार के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता है, लेकिन इसके बावजूद उन मामलों में भी अपीलें दायर की जा रही हैं जो कानूनी रूप से पहले ही तय हो चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार केवल ऑफ-बीट चांस (अंधेरे में तीर चलाने) के लिए ऊपरी अदालतों का रुख करती है, जिससे न केवल अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि गरीब चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का भी मानसिक और वित्तीय उत्पीड़न होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित विभागों को नींद से जगाने के लिए यह जुर्माना लगाना बेहद जरूरी हो गया था।
 

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उल्लेखनीय है कि प्रतिवादी राम गोपाल को साल 1993 में वन विभाग के तहत इंटीग्रेटेड वॉटरशेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट कांडी में दैनिक वेतन भोगी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया था।एकल पीठ ने 21 नवंबर 2025 को राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि याचिकाकर्ता को 8 साल की निरंतर सेवा पूरी करने के बाद 1 जनवरी 2001 से नियमित करते हुए वर्क-चार्ज स्टेटस का लाभ दिया जाए। सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट तक खारिज हो चुके संत राम मामले के आधार पर कवर्ड होने के बावजूद खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी। सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि कर्मचारी को साल 2001 में यह अधिकार मिला था, लेकिन वह 23 साल की देरी के बाद 2024 में अदालत आया, इसलिए याचिका खारिज होनी चाहिए।इस दलील को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने खुद 9 अक्तूबर 2012 को नियमितीकरण की नीति जारी की थी, जिसके लाभ पात्र कर्मचारियों तक पहुंचाना सरकार की अपनी जिम्मेदारी थी।

नौणी यूनिवर्सिटी की हॉस्टल वार्डन से 9.25 लाख की रिकवरी आदेश रद्द
 प्रदेश हाईकोर्ट ने डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री की पूर्व प्रोफेसर और गर्ल्स हॉस्टल वार्डन डॉ. निवेदिता शर्मा को बड़ी राहत दी है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने विश्वविद्यालय की ओर से उनके खिलाफ जारी 9,25,790 रुपये की रिकवरी के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने विश्वविद्यालय के रिकवरी आदेश को कानूनन गलत और मनमाना करार दिया। अदालत ने कहा कि हॉस्टल वार्डन, विशेषकर गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन की जिम्मेदारियां ऐसी होती हैं जिन्हें घर से या परिसर से दूर रहकर पूरा नहीं किया जा सकता। छात्रों के अनुशासन, स्वास्थ्य की देखभाल और रात के समय सुरक्षा के लिए वार्डन का हॉस्टल परिसर में बने विशेष सरकारी आवास में रहना जरूरी है।
 

विशेष आवास को सामान्य सरकारी मकान नहीं माना
कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय के आवास आवंटन नियमों में स्पष्ट है कि जिन कर्मचारियों का अपना घर है, वे विश्वविद्यालय आवास के पात्र नहीं होंगे। हालांकि, इसमें यह अपवाद भी है कि यदि किसी कर्मचारी का कैंपस में रहना अनिवार्य हो तो उसे आवास दिया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि हॉस्टल वार्डन का पद इसी अपवाद के दायरे में आता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वार्डन के लिए आवंटित विशेष आवास को सामान्य पूल के सरकारी मकानों की तरह नहीं माना जा सकता। वार्डन के वहां न रहने की स्थिति में भी इस आवास को किसी अन्य सामान्य शिक्षक को आवंटित नहीं किया जा सकता था।

रोके गए सेवानिवृत्ति लाभ भी जारी करने के आदेश
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिए कि इस मामले के कारण डॉ. निवेदिता शर्मा के जो भी सेवानिवृत्ति लाभ रोके गए हैं, उन्हें बिना किसी कटौती के तत्काल जारी किया जाए। इनमें ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट समेत अन्य पात्र लाभ शामिल हैं।

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