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ध्यान दें: हिमाचल में नदियों के किनारे 60 हजार से ज्यादा आबादी, ग्लेशियर झील टूटी तो मच सकती है तबाही

Mon, 31 Aug 2026 09:43 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला/धर्मशाला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला/धर्मशाला। Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 31 Aug 2026 09:43 AM IST
सार

Himachal Flood Risk: हिमाचल में 60 हजार से ज्यादा लोग नदियों के किनारे बसे हैं। ग्लेशियर झील टूटने या अचानक बाढ़ आने पर कई गांव-कस्बों के साथ सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं भी खतरे में आ सकती हैं। सतलुज, ब्यास और चिनाब घाटी सबसे संवेदनशील मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों के अध्ययन में 680 से अधिक ढांचों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। जानें विस्तार से...

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ग्लेशियर झील टूटी तो हिमाचल में मच सकती है तबाही - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

ग्लेशियर झील फटने से नेपाल जैसी त्रासदी हिमाचल प्रदेश में आती है तो बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है। हम आपको डरा नहीं रहे, अलर्ट कर रहे हैं। प्रदेश में सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और यमुना नदी के किनारे करीब 60 हजार से अधिक आबादी बसी हुई है।

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नदियों में अचानक बाढ़ आने की स्थिति में इन क्षेत्रों में बसे गांव, कस्बे, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। किन्नौर-शिमला में 30 हजार, कुल्लू-मंडी में 10-10 हजार, 10 की आबादी ही लाहौल-सिरमौर, हमीरपुर और कांगड़ा जिले में नदियों के किनारे रहती है। इनमें 90 फीसदी आबादी पक्के घरों और 140 फीसदी अस्थायी शेडों में रहती है।

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किन्नौर के नमज्ञा से लेकर शिमला के रामपुर और सुन्नी तक सतलुज नदी तबाही मचा सकती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस नदी के किनारे बसी 30 हजार की आबादी को खतरा है। सतलुज तिब्बत से होकर शिपकी ला के रास्ते किन्नौर में प्रवेश करती है। इसके किनारे नमज्ञा, पूह, स्पिलो, कनम, मोरांग, रिकांगपिओ का निचला क्षेत्र, कड़छम, वांगतू, भावानगर, नीरथ, झाकड़ी, ज्यूरी और नोगली जैसे कस्बे और बस्तियां हैं। 

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राष्ट्रीय राजमार्ग-5 भी कई हिस्सों में सतलुज के साथ गुजरता है, जहां बाढ़, भूस्खलन और भू-कटाव से संपर्क कटने का खतरा रहता है। अगस्त 2025 में सतलुज और इसकी सहायक खड्डों में उफान के कारण रामपुर बाजार में भी खतरे की स्थिति पैदा हो गई थी। प्रशासन को कई घर और दुकानें खाली करवानी पड़ी थीं। रामपुर कस्बे और उसके सामने सतलुज किनारे बसे कुल्लू जिले के गांवों की आबादी करीब 15 हजार है। कुल्लू जिले में ब्यास के अलावा तीर्थन, पिन पार्वती और पार्वती नदियों के किनारे करीब 10 हजार आबादी रहती है।

मनाली के नेहरूकुंड, बाहंग, क्लाथ, पतलीकूहल, डोभी, रायसन, बबेली, रामशिला, अखाड़ा बाजार, मौहल, शमशी, भुंतर और पार्वती घाटी के मणिकर्ण, कसोल व जिया जैसे क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। पिन पार्वती घाटी में शाक्टी, मरौड़, न्यूली, सियुंड, सैंज, बकशाहड़, बिहाली, लारजी और तीर्थन नदी की धारा में बठाहड़, गुशैणी, हामनी, होरनगाड़, बालीचौकी आदि बाजार बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। लाहौल-स्पीति में घेपन झील को प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। झील फटने की स्थिति में चंद्रा और भागा नदी (चिनाब) के किनारे बसे सिस्सू, तांदी, केलांग और आसपास के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। आईआईटी रुड़की और आईआईटी रोपड़ के हाल ही में किए गए एक अध्ययन के अनुसार हिमालय में ग्लेशियर झील टूटने और उसी दौरान अत्यधिक बारिश हो जाए तो ब्यास व सतलुज में बाढ़ आई तो 680 से अधिक ढांचे ध्वस्त हो सकते हैं।

मंडी में ब्यास और खड्डों के किनारे रहते हैं 10 हजार लोग
मंडी जिले में ब्यास नदी और इसकी सहायक खड्डों के किनारे बड़ी आबादी बसी हुई है। ब्यास नदी के किनारे पंडोह कस्बा बसा हुआ है। यहां पंडोह में ही ज्यूणी खड्ड के किनारे भी घनी आबादी रहती है। ज्यूणी खड्ड पंडोह में ब्यास नदी में मिलती है। जिले में करीब 10 हजार की आबादी खड्डों और नालों के किनारे बसे गांवों व बाजारों में रहती है। मंडी शहर से भी ब्यास नदी गुजरती है। भ्यूली की बंगाली बस्ती और इंदिरा आवास कॉलोनी सहित नदी किनारे बसे क्षेत्र ब्यास के बढ़ते जलस्तर की चपेट में आ सकते हैं। खलियार और पंचवक्त्र मंदिर के आसपास भी बाढ़ का खतरा बना रहता है। मंडी शहर में सुकेती खड्ड और स्कोढी खड्ड के किनारे भी घनी आबादी है। धर्मपुर उपमंडल मुख्यालय भी सोन खड्ड के किनारे स्थित है। सराज घाटी में भी खड्डों और नालों के किनारे कई बाजार और गांव बसे हुए हैं।

सरकार ने नदी-नालों के 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर लगाई है रोक
वर्ष 2023-24 में आई आपदा के बाद हिमाचल सरकार ने प्रदेश में नदी-नालों के 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक लगाई है। हालांकि, यह रोक नए निर्माण पर है। पहले से बसी हजारों की आबादी अभी भी खतरे के साये में है। खतरे को देखते हुए कई झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की भी तैयारी है। पंडोह बांध से 25 किमी और भाखड़ा बांध से 100 किमी पहले नदियों के ऊपरी हिस्सों में सेंसर लगाए जा रहे हैं, ताकि झील फटने की स्थिति में निचले इलाकों की आबादी को 1 से 2 घंटे पहले सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

एक दर्जन प्रोजेक्ट खतरे की जद में 
सतलुज में बाढ़ आती है तो किन्नौर के कड़छम, शोंगटोंग, वांगतू, नाथपा-झाकड़ी, रामपुर जलविद्युत परियोजनाएं, कोल डैम, बैराज और निर्माण कार्य साइटें क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। वहीं, ब्यास ने तबाही मचाई तो पंडोह बांध का बुनियादी ढांचा और उहल-3 हाइड्रो पावर स्टेशन जैसी संपत्तियां चपेट में आ सकती हैं। रावी नदी पर बने चमेरा-1, 2 और 3 के अलावा चांजू हाइड्रो प्रोजेक्ट भी खतरे की जद में आ सकता है।

हमारी प्राथमिकता जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी, निचले क्षेत्रों में जोखिम का आकलन, समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करना है। आर्यभट्ट भू-सूचना विज्ञान एवं अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के साथ मिलकर संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में संपत्तियों की डिजिटल पहचान और मैपिंग की जा रही है। शहरी स्थानीय निकायों में करीब 50 हजार संपत्तियों की डिजिटल पहचान पहले ही की जा चुकी है। - पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन

हर बरसात में खतरा, सुरक्षा दीवार लगाए सरकार
कुल्लू के रामशिला और जुआनी रोपा के दुकानदारों व बाशिंदों को ब्यास के बाढ़ का खौफ सताता रहता है। 1995, 2023 और 2025 में ब्यास में बाढ़ आने से दुकानों को खाली करना पड़ा था। राइट बैंक में एनएचएआई ने सुरक्षा दीवार का काम शुरू किया है। इससे वामतट जुआणी रोपा और रामशिला के लोगों को और खतरा मंडरा रहा है। वामतट क्षेत्र में भी सुरक्षा दीवार लगानी चाहिए। -मुनीष भंडारी, कारोबारी।

रामपुर की सरपारा पंचायत के समेज गांव में 31 जुलाई 2024 में सतलुज नदी की सहायक खड्ड में बाढ़ से 36 लोग लापता हो गए थे। आज भी समेज गांव पर इसी तरह का खतरा है। समेज में नेपाल जैसा सैलाब आता है तो  पूरा गांव तबाह हो जाएगा। सरकार को ऐसे गांवों को बचाने के प्रयास करने चाहिए। -इंद्र खुराना, प्रधान, सरपारा 

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