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अध्ययन में खुलासा: हिमालय की हवा में मौजूद कार्बनिक कण बढ़ा सकते हैं गर्मी, ऑक्सीडेटिव तनाव का भी खतरा
Sun, 18 Oct 2026 06:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला।
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 18 Oct 2026 06:07 AM IST
सार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के पांच शोधकर्ताओं के अध्ययन में ह्यूमिक जैसे कार्बनिक पदार्थों (एचयूएलआईएस) के प्रभाव सामने आए हैं।
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हिमालय
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हिमालय के वातावरण में मौजूद कुछ सूक्ष्म कार्बनिक पदार्थ जलवायु को गर्म करने और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के पांच शोधकर्ताओं के अध्ययन में ह्यूमिक जैसे कार्बनिक पदार्थों (एचयूएलआईएस) के प्रभाव सामने आए हैं।
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शोध के अनुसार, यह पदार्थ वातावरण में मौजूद भूरे कार्बन के सापेक्ष विकिरण प्रभाव में 53 से 75 फीसदी तक योगदान दे रहे हैं। अध्ययन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एनवायरनमेंटल पॉल्यूशन में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं राहुल कांत यादव, आनंद प्रभाकर, अनन्या सिंह, अदिति राणा और सयंतन सरकार ने हिमाचल प्रदेश सहित उत्तर-पश्चिमी हिमालय के वातावरण में इन कार्बनिक पदार्थों की संरचना, संभावित स्रोतों और उनके जलवायु एवं ऑक्सीडेटिव प्रभावों का विश्लेषण किया।
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ह्यूमिक जैसे कार्बनिक पदार्थ वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कार्बनिक कणों के समूह होते हैं। ये सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर विकिरण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जिससे जलवायु पर असर पड़ सकता है। अध्ययन में पाया गया कि इन पदार्थों का जल में घुलनशील कार्बनिक कार्बन की कुल मात्रा में योगदान 53 से 63 फीसदी तक है। वहीं, भूरे कार्बन से प्रकाश के अवशोषण में इनकी हिस्सेदारी 37 से 53 फीसदी रही। शोधकर्ताओं ने 300 से 400 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश क्षेत्र में इनके संयुक्त सापेक्ष विकिरण प्रभाव का आकलन किया। अलग-अलग मौसम में यह प्रभाव 15 से 27 फीसदी के बीच पाया गया।
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गर्मियों में अधिक मिली ऑक्सीडेटिव क्षमता
अध्ययन में इन पदार्थों की ऑक्सीडेटिव क्षमता भी मापी गई। ऑक्सीडेटिव तनाव शरीर में हानिकारक प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन कणों और उन्हें नियंत्रित करने वाले एंटीऑक्सीडेंट के बीच असंतुलन की स्थिति है। इससे कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है।
शोध के अनुसार, वातावरण में मौजूद कुल आयतन-आधारित ऑक्सीडेटिव क्षमता में ह्यूमिक जैसे पदार्थों का योगदान आधे से अधिक था। इनके उदासीन स्वरूप की हिस्सेदारी 31 से 37 फीसदी और अम्लीय स्वरूप की 14 से 18 फीसदी रही। उदासीन स्वरूप की प्रति इकाई द्रव्यमान ऑक्सीडेटिव क्षमता अम्लीय स्वरूप से 1.5 से 3.2 गुना अधिक पाई गई। गर्मियों में यह क्षमता सर्दियों की तुलना में अधिक रही। शोधकर्ताओं ने इसका संबंध प्रकाश-रासायनिक प्रक्रियाओं और प्राथमिक उत्सर्जन में मौसमी अंतर से जोड़ा।
प्रदूषण के स्रोतों की पहचान में मिलेगी मदद
विश्लेषण में उदासीन स्वरूप का संबंध प्राथमिक उत्सर्जन और जटिल सुगंधित संरचनाओं से मिला, जबकि अम्लीय स्वरूप का वातावरण में बाद में बनने वाले द्वितीयक कणों से अधिक पाया गया। शोध नतीजे हिमालयी क्षेत्र में कार्बनिक प्रदूषकों की भूमिका समझने और वायु गुणवत्ता के आकलन को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
आईआईटी मंडी के इस अध्ययन ने हिमालय में वायु प्रदूषण के महत्वपूर्ण पहलू को उजागर किया है। ऑर्गेनिक एरोसोल न केवल वायुमंडल को गर्म करने में योगदान देते हैं, बल्कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के जरिये स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी पैदा कर सकते हैं। ये निष्कर्ष इस बात पर जोर देते हैं कि कार्बनयुक्त एरोसोल की बेहतर निगरानी, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और उत्सर्जन कम करने के लिए लक्षित रणनीतियों की आवश्यकता है। हिमालय के नाजुक पर्यावरण की रक्षा के लिए हमें वायु प्रदूषण के जलवायु और स्वास्थ्य, दोनों तरह के प्रभावों पर ध्यान देने की जरूरत है।
-डॉ. पुष्पेंद्र राणा, विशेष सचिव एवं निदेशक आपदा प्रबंधन एवं राजस्व